राजस्थान पुरातन अन्यमाख
भेत भिक ०६.००१. / पि १/0 0 १/0 १0 0 १ ण ण ण १ / ५१” १५ ^
परान संपादक -पुरात्चाचायं, पद्मश्री, जन विजय सुनि
[ सम्मान्य संचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान |
टक्छुर -फङ- विरचित
रलपरीक्चादि-सष्ट-्रन्थसंग्रह
चे
५८ २ ( 1 [9 3.8, + पं क (| 20 ४ 2 ४; य
राजस्थान राज्य संस्थापित
राजस्थानप्राच्यवियाप्रतिष्ठान
जोधपुर (राजस्थान)
राजस्थानपरातमन मन्यमासख
राजस्थान राज्यद्वारा प्रकाशित
सामान्यत अगिरः भारतीय तथा चिद्रोपत राजस्यान प्रटेद्रीय पुरावनकाटीन
सरन, प्ाङ्त, मप्श्रशच, राजस्यनिी, गुजराती, हिन्दी भादि भापानिबद्ध
विविध वाद्छय प्ररायिनीः विरिष्टं ग्रन्याद्डी
प्रधान संपादक
युरातचयाचार्य, पद्मश्री, जिन विजय सुनि
[ ओनिर्पै मेवर ओफ जन ओरीपन्ट ससाद, जर्मनी ]
सम्मान्य सदस्य - भाण्डारकर प्राच्यविद्या सदोघन मन्द्र, पूना, गुजरात साहिय
मभा, अदहमद्राब्राद, चिश्वश्वरानन्द वेदि शोध सस्थान, रहोदियारपुर, पाव,
निरत सम्प्ान्यं नियामरु { नरि डायरेक्टर ) ~ भारतीय चिद्ामवरन, यवै,
प्रधान सपादक ~ गुजरातं पुदतच्य मन्दिर ग्रन्यायङी, भारतीय विद्या म्रन्याचटी,
सिंघी चैन म्नन्यमाला, जन माहिदयसन्लोधक अन्था्रठी,-द्रदयाद्रि, इत्यादि ।
। 1
-- यन्थांक ४४ -
ठक्कुर -फेू- विरचित
रलपरीश्चादि-सप्त-मन्थसंग्रह
प्रका्चक
राजस्यानसल्यान्नाचसार
4 प्राच्यविदया [ > [>
सचारूक् -- राजस्थान बाल्यवदया ब्रतघए्ठन
0९८्ध्ण, प्वणिष्ड्ष्या ठट] व््ल्यदा पडपः8, केर्ताणुपाः
विषमाब्द् २
सश 3 राज्यनियमायुसार सर्गोधिकार सुरक्षित । य
गुदर -र्षमीरदे नाएयण चौधरी, निगयतसागर् प्रेव, ०६-२८ करेलमाट छीर वह
भकाशक~ गोपाल नारायण बहरा, उपठचार क़ राजम्धान प्रास्यविदया प्रतिष्ठान, जोधपुर
टङ्कुर -फेरू - विरचित
[ 9 (५ न +
रलपराक्चाद् - सत्र - अन्थसम्ह्
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. समूुपखब्ध-पराचीनतम-पुस्तकाचसार
पुरातत्वाचायं जिनविजय सुनि द्रारा
संशोधित एवं खुपरिष्कृत
सामग्री-संपादनकतां
अगरचन्द तथा भवरखाठ नाहर
प्रकारानकतां
राजस्थान साज्यान्ञाचुसार
संचारखक, राजस्थान म्राच्यविया भ्रतिष्ठन
( डायरेक्टर, राजस्थान ओरिणन्टक रीस्चं इन्स्थीस्यृट )
जोधपुर (राजस्थान)
खिस्तानच्द;
१९६१ /
४
/
विक्रमा्द २०१७ |
राष्ीय शकाब्द १८८३ =
विपयायुक्रम
ट
१ भधान संपादकीय ~ किचित् भासंगिक परऽ १- ४
२ प्रास्ताविरु कथन
अगरयचन्द्र; भवरलखाल नाहटा प ५- ८
३ ठक्घुर फेरूकृत रतरपरीक्षाका परिचय
छे. ड. मोतीचन्द्र एम् ए पीएच्. डी. षू १- ३५
( १) रत्नपरीक्षा सूर भ्रन्थ पृ० १- १६
(२) द्रव्यपरीक्षा ॐ ॐ 99 १७ ३८
(३) धातूत्पत्ति » > ३९-४४
( ४) ज्योतिपसार 9 ॐ) 99 १४०
(५) गणितसार + # > ४१-४
(६) वास्तुसार. >» > , ॐ ७५१०
(७) खरतरगच्छयुगप्रधानचतुःपदिका +> १०४-१०६
(< ) परिशिष्ट ~ ज्योतिषविषयक रफुटपय + १०७-१०८
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प्रधान संपादकीय - किंचित् प्रासंगिक
राजस्थान पुरातन यन्थमालछा के ४४ वें प्रन्थांक रूप मे, ठंकुर् फेर
रचित ७ ग्रन्थो का यह एकत्र सग्रह प्रकट किया जा रहा है ।
टक्कुर फेर के इन ग्रन्थो की छ्खी हई प्राचीन पोथी का पता ठ्गाने का श्रेय
श्री अगर चन्दजी ओर भवे गठ्जी नाहटा को है । इन साहिललोजी बन्धुं की
लगन ने, कठ्कत्ते वेः एः कोने भ पडे इए जैन ग्रन्थो के पिटारे मे से, इस मूल्यवान
निधि को अदर मे लनि का अभिनन्दनीय यद प्राप्त किया है ।
ठक्कर फेर के ये प्रबन्धात्मक प्रन्थकैसे म्वि ओरहन को प्रकादामे ठने
का केसा प्रयत्न किया -इस विषय म नाहटा बन्धुओं ने, अपने प्रस्तावनात्मक वक्तव्य
मे यथेष्ट ज्खिादहै। इससे पटे भी इन्होंने, कुछ पतरम ठेख प्रकट करा कर इस
विषय पर कापी प्रकाश्य डाल्ने का प्रयत्न किया है|
इस संग्रह की प्राचीन पोथी जब इन के देखने मे आई, तो इन की रोधक
युद्धि ने तत्काल उस का विरिष्ट महश्च पि्ठान लिया ओर तुरन्त उस पोथी पर से अपने
हाथ से नकल उतार कर भरे पास देखने के व्यि मेज दिया | भने भी ग्रन्थ के द्रव्य
परीक्षा नामक प्रबन्ध मे वर्णित सर्वथा अज्ञात विषय की उप्न्धि देख कर, इस को
सुप्रसिद्ध संधी जेन प्रन्थमाखा द्वारा प्रकट कर देने की अपनी इच्छा नाहटा बन्धुओं को
व्यक्त की ओर उस असल प्राचीन लिखित पोथी को मेरे पाप मेन देने को ठ्खा।
पर उस समय कल्कत्ते मे सांप्रदायिक मार-पीट की तूफान वाटी हट -चट मच रही थी
इस व्यि तुरन्त वह प्रति मेरे पास न आ सकी । प्रतिका प्रक्ष अवलोकन किये विना
किसी ग्रन्थ कोछछापदेनेके ल्यि मेरी शचि संतुष्ट नहीं रहती, इस च्थिमे उसकी
प्रतीक्षा करता रहा । बाद मै, मेरा खयं जव कलकत्ता जाना इभ तो म उस प्रतिको
देखने मे समथ इआ ओर नाहटा बन्धुओं के सौजन्य से वह प्रति कुछ समयके च्यि
मुत्र मिरु गद । वेब आकरभैने उस पर से अपने निरीक्षण मे प्रतिलिपि करवाई
ओर उसे प्रे मे छपवाने की व्यवस्था की |
बाद मे वैवं छोड कर मेरा अधिक रहना राजखान मे होने व्गा ओर भै मेरे
तखावधान मे प्रस्थापित ओर संचाकित राजस्थान पुरातत्च मन्दिर (अब, राजस्थान प्राच्य
विचा प्रतिष्ठान ) के संगठन ओर संचारुन के कार्थं म अधिक व्यस्त रहने ल्गा, तो
इस का प्रकान स्थगित सा हो गया |
पर इस ग्रन्थ को, इस खूप भे, प्रकट करने -कराने की अभिखाषा नाहटा बन्धुं
को बहत ही उत्कट रदी ओर सञ्च भी ये बहुत प्रेरणा कर्ते षे । तथ ने इसे राजखान
२ रतपरीक्षादि भ्रन्थ संग्रह ~ किंचित् प्रासंगिक
पुरातन ग्रन्थमाला द्वारा प्रकट करने की व्यथा की ओर उसी के फल ख्य, आज यह
म्रन्य भ्रकादामे आ रहा है । नाहा बन्धुर्यो का जो सतते आग्रह न रहता तोरभ इसे
प्रकट कएने म शायद ही समथ होता । अत. इस के सपादन के श्रयोमागी ये वन्धु ई ।
इस सम्रह की प्रेस कोषी से ठे कर ्रन्य को चर्वेमान रूप देन तक के ्ुफ कौरह
सवर सतन ही देखने पडे ओर मापा एव अयीनुसन्धान की दृष्टि से उस के स्मोवन मँ सुतर
वट्त श्रम उठाना पडा । ऽस च्ि ग्रन्थ के प्रादित होने मे अपेक्षा से भी वहत अधिक
समय व्यतीत इ 1
उर् फे मे अपनी ये सव रचनाए् प्राकृत भापा मे. ठिखी हू | पर इस की यष्ट
प्राकृत भाषा, शिष्ट ओर व्याकरण वद्ध न शो कर, एक प्रकार की ` प्राहठेतै-अपभ्रशच की
चरती रैटी वाटी भाषा है जिसे हम न युद्ध प्रात कह सकते है, न शुद्ध अपभरग टी
कह सकने £ । फेरू के इन म्न्य के जो परिपय है वे जोकन्यवहार् की दृष्टि से बहती
उपयोगी ओर अम्यसनीय है ! इस च्ि उस ने अपनी रचना के च्वि प्राहृत भाषा की
बहुत टी सरक शेटी का उपयोग करना पसद् किया ! उस का ठक्ष्य अपने माय को-
परिय के अर्थे को अभिव्यक्त कएना रहा है, इस व्यि व्याकरण के ख्ट नियमो का
अनुसरण करने के च्ि वह प्रयतगान् नहीं दिखाई देता । अपनी रचना के व्य प्राकृत
का प्रसिद्ध गाथा न्द उस ने पसन्द किया ई ओर वह छन्द के नियम का ठीक पान
क्ले कीदषटिसे, कदी हख को दीधे ओर दी को दख रखता है, ओर कहीं कही
द्विव अक्षरको एकाक्षरके रूपमे तो कीं एकाक्षर को द्वित्व के सूपर्मे भी प्रथित कर
देताहै। छन्दकाभगन हो इस परिचार से वह शब्दो का निर्विभक्तिफ रूप तक रख
देतादहै। भन्यकार की इस शैली का ठीफ अव्ययन कते कते हम इस का सोधन
कना पडा दहे । इस च्ि हमारा समय भी इस म बहुत व्यतीतं इथा 1
` केर के इन ग्न्ो मे से चस्तुसार' ओर ९त्परीक्षा' तथा धातत" के कु हिस्से
के सिमा, जर् रन्यो की अन्य को प्रति उपठन्ध नदीं इई, अत उक्त एकमात्र प्रति के
आधार पर दी सव पाठनिर्णय करना पडा। साय मे प्रति के टेक की अञयुद्धियो ने भी
ऊख परिश्रम वटा दिया । ग्रति का लिखने वादा न सस्कृत जानता दै न प्रात 1 उसने
कहीं कहीं अपनी भापारमे जो वाक्य लिखि है उन पर से उसके मापाज्ञान का परितिय
भिर जात्ता हे 1
हमने उप्त के सञ्लोधन म केमर उतना ही श्रयते जिया है जिस से अर्थ्ोध
ठीक दो सके, ओर व्याकरण के नियम के निकट शब्द का रूप रद् सरे । द्रव्यपरा,
रनपरीक्षा ओर घाकत्पत्ति ये तीन प्रवन्व लोकिक शव्द के ऊपर आधात, ओर इन
मके अनेक शब्द पेते है जो सर्वथा अपरिचित से र्गते है ॥ इन शब्दो का ठीक
खूप जानने का कोई अन्य साधन नहीं | अत उन की,खिति चैसी लिखित प्रतिमे
टै यदी ष्टी रखनी आनदयर रही ।
रत्नपरीश्चादि न्थ संश्रह ~ क्रचित् प्रासंगिक ३
८ वस्तुसार एक प्रसिद्ध रचना है । इसका मुद्रण भी पदे हो चुका है ओर
फिर इस की अन्य प्रतियां भी उपक्न्ध होती है | अतः उन के आधार पर यह प्रबन्ध
तो प्रायः टीक शुद्ध कियानजासकादहै। इसकेतो विरिष्टपाठमेदभीदे दिये ह|
फैरूः के इन म्रन्थों मे सब से अधिक महत्व का प्रमथ "द्रव्यपरीक्षा' हे | सू
प्रबन्ध मे, उस ने अपने समय म भारत के भिन भिन्न प्रदेशों ओर प्रान्तों मँ प्रचलित,
सिकं की जो जानकारी किखी है वह स्वैथा अप्रवे है । इस विषय पर प्रकार डालने
वाटी ओर कोई रेसी प्राचीन साहिलिक कृति अभी तक ज्ञात नहीं है । इस म्रन्थ पर
तो भारत के मध्यकाटीन सिक्घों के परिक्ञाता रेसे किसी विरिष्ट विद्वान् को, एक अध्ययन
णं एवं प्रमाणभूत ग्रन्थ लिखना आवदयक है । इस का संपादन काय प्रारंभ करते समय
हमारा उत्साह था, कि हम इस विषय म यथाश्चक्य जानकारी एवं साधनसामग्री प्राप्त
करके, इस के साथ छोटा-बडा मी वैसा कोई निबन्ध टिखिगे; पर समयामाव के कारण
हम वैसा निबन्ध लिखने मे असमथ रहे । हम आशा करते है कि अन इस ग्रन्थ का
यह मूक खरूप प्रकट हो जनि पर, कोई सुयोग्य निष्कविज्ञ विदान् वैसा प्रयत्न करने की
प्रेरणा प्राप्त करगे । ।
केर के (रत्रपरीक्षा' ्रन्थ के विषय म तो प्रसिद्ध विद्वान् डा. मोती चन्दजी ने
एक. अच्छा पस्चियात्मक निबन्ध ल्खिदेनेकीलकृपाकीदहै, जो इसके साथ दिया गया
है | इसके लि हम डक्टर साह के प्रति अपना आभार प्रदरित करते हैँ |
' गणितसार › ओर “ ज्योतिषसार ` ये रचनाएं प्राथमिक अभ्यासियोँ के अध्ययन की
दृष्टि से अच्छी उपयोभी है । गणितस्ार म तो ठक्कर फेर ने अपने समयमे दिही वे
आपसपास के प्रदेश मे व्यवहृत अनेक देद्य शब्दों ओर स्थानिक पदार्थो का भी उदे
किया है जिन पर विष प्रकार डाखा जा सकता है ।
केरू के इस प्रन्थ संग्रह की जो उक्त प्राचीन प्रति उपलग्ध द्भ है वह, जैसा कि
उसके चपि कतौने दो तीन खानों पर निदेश कियादहै, वि, सं. १४०३ ओर
१४०४ वषे के बीच मे छ्िखी गह है । वास्तव मे यह पोथी उक्त संवत् के फाट्गुण ओर
चेत के महिने के बीच मै, डेढ-दो महिने के अन्दर ही टिखी गई है । स्कर फेरू ने
'द्रग्य परीक्षा की स्चना, संवत् १३७५ मे दिष्टी मे अह्ाउदीन बादशाह के राज्य
कालम की थी | अतः रचना समयके वाद २५-३० वषे के भीतर ही यह पोथी
लिखी गह थी जिससे इस की प्राचीनता खतः सिद्ध है।
इस प्रति की कुक पत्रसंख्या ६० है ओर उन मे निग्न तालिका के अनुसार फेर
की इस संग्रह वारी सातो स्चनाएं छिखी गई है ।
ध सत्नपरीक्षादि श्रन्थ संत्रह - किंचित् प्रासंगिक
१ पत्राकं १ से १८ तके उयोतिपसार्
२ १९ से २७ ^ > , द्रन्यपरीक्षा
२ ॐ २८ से ३५ + वास्तुसार
४ ३६४१ ^ रत्तपरीक्षा
` प ॐ ४१. से ४२ ^. ४; धावूपत्ति
६ + ४३४८से ४ 8 युगप्रधान चतुष्पदी
७ + ४५ से ६० ॐ गणितसार
हमने इसत स्र मँ प्रतिसित प्रन्थक्रम का अतुस्रण न करते हुए, प्रथम
रतपरीक्षा, दनव्यपरीक्षा ओर वातूरपत्ति नामक इन ३ रचनाओं को एक साय रवा है,
ओर फिर प्योतिपसार, गणितसार एव वास्तुसार इन २ रचनाओं को एक साय रख
कर, अन्त भ *युग प्रधान चतुष्पदी" रचनाकोदेदिया है| इस से प्रिय का
परिभाजन ठीक सगत हो गया हे ।
इसके साय मूल प्राचीन प्रति जो कलकत्ते के जैन भडार मे प्राप्त हई उसके कुछ
पनेकि व्छाक भी वनाकरदियेजारहे है जिससे पाठकों को प्रति की प्रतिकृति का
दन हो स्के ।
प्योतिप, गणित, वास्तुखालल, रतस ओर मुद्रामिपयकः िजञान पर, इस प्रकार
की विशिष्ट प्न्य रचना कए वाखा ठरुर केरू, सचमुच अपने समय का एक वहत
ही बहृश्रुत गद्रान् ओर अनुभमी शाखज्ञ था | उसकी ये कृतिया हमारे प्राचीन
सादि की बहमल्य निषि हेः ओर इस प्रकार राजस्थान प्राच्यविदयया भतिष्टान
द्रा इन का प्रादित टोना सथा समाद्रणीय होमा ।
चेन शुर १ ३,वि ख २०१७
]
दिनाक-३१, मार्च, १९६१ ~
भारतीय विद्या भयन, वय || छनिजिनविजय
ठद्कुर फेर ओर उनके ग्रन्थों के विषय सें
प्रास्ताविक् कथन
(रेखकः - अगरचन्द, मवरलाल नाहटा )
कलाणा निवासी ठक्कर फेरू का नाम यों तो उन की सुप्रसिद्ध कति वा्तुसार
रकण! ॐ कारण सवै विदित था, परन्तु उन के बह्धयुखी प्रतिभासंपन्न एवं महान्
्र॑थकार होने का अव तक पता नहीं था। १५ वधे पूवै, कठ्कत्ते की श्रीमणि जीवन जैन
लायत्रेरी की सूची मे सारा कौमदी गणित ज्योतिषः नाम से उद्िखित फेष्ट प्र॑थावठी
फी प्रति देखने पर ठक्कर केर की कई नई कृतिर्यौ ज्ञात हृ । इस प्रति की प्राप्ति से
केवर हमने ही नही, पर जिस किंसीने सुना परम आनंदः प्राप्त किया | इन ग्रथ की
उपटरन्ि से ठक्कर फे की गणना, भारतीय साहिल मै, एक अनूढा स्थान प्राप्त करने
वल विद्वानों म की जा सकती है।
ठक्कर फे विक्रम की चदहवीं शती के राजमान्य जेन गृहस्थो मे प्रमुख व्यक्ति
ये | इन्दोनि अपनी कृति्यो म जो परिचय दिया है उससे विदित होता है कि ये कनाणा
निवासी श्रीमा वंदा के धांधिया ( धैधञु ) गोत्रीय श्रेष्ठि काल्य या क्रा के पुत्र
ठक्कर चंद के सुपुत्र थे | इनकी सवै प्रथम स्वना धुगप्रधान चतुष्पदिकाः है जो
संवत् १३४७ मै वाचनाचाथं राजशेखर के समीप, अपने निवास्सखान कनाणा मँ वनी
थी । इन्होने अपनी कृतियो के अंत भे “परम जैन" ओर अपने आप को “जि्ण॑द् पय `
मत्तो लिख कर अपना कटर जैनत्व सूचित किया ह । इन्हौने शस्नपरीक्षा मे अपने
पुत्रका नाम हेमपार छ्खिा दहै, जिसके ल्यि इस प्रय की रचना की है| इनके माई
का नाम अज्ञात है परन्तु भराता ओर पुत्रके लिए द्रव्यप्रीक्षा नामक विरिष्टं प्रथ
की रचना की थी।
दिष्ीपति सुरत्राण अलाउदीन खिट्जी के राज्याधिकारी या मंत्रि्मेडलठ मे होने के
कारण, पीछे से इनका निवास सान अधिकतर दिद्ठी ही गया था । इन्होने द्रव्यपरीक्षा
दिष्टी की टंकसार के अनुभव से तथा शनपरीक्षा प्रथ सम्राट् के र्नागार् कै प्रयक्ष
अनुभव से, एवं गणितसार मे मी दी इई तत्काडीन राजनैतिक गणित प्रश्चावही आदि
से, यह फलित होता है किये अवद्य शादी दरार मे उच्च पदासीन व्यक्ति थे।
संवत् १३८० म दिष्टी से श्रीमा सेठ रयपति ने महातीर्थं रात्रुञ्चय का संघ निकारा
था, जिसमें ठक्कर फेर मी सम्मिलित इए थे ।
१-प. भगवानदासजी जेन ने जयपुर से ““वास्तुसार” ( गुजराती अनुवाद सहित संस्करण } के
साथ “रत्नपरीक्षा” ओर ““्धातोः्पत्ति" का अपू अंश सी प्रकादित किया है ।
२-देखं हमारी “दादा जिन कुशल सूरि" पुसतक \
६ धरास्ताविक कथन
ठक् फेर फी “युगग्रधान चतुष्पटिफा के अतिरिक्त समी कतिर्यो प्रान
मह । भाषा वड़ी सर, प्रवादी ओर अपश्रश या तत्काटीन लोकभापा कै प्रमाव से
प्रमापित रै | म्रन्योक्त कतिपयं वृत्तान्त तःकाटीन मारतीय सक्कृति एव॒ मापा पर
महच््पू् प्रकान डालते ह । इनकी कृति्यो का ससिष्त परिचय इस् प्रकार दै -
१, युगप्रधान चतुष्पदा - यह कृति तत्काटीनं लोकमापा अपय मे २८
नचौपई व एक हृप्पय में रवी गई है | इमं भगवान महावीर से ठगा कर खरतरगच्छ के
युगप्रधान आचार्यो की परपरा की नामायटी निक्द्ध ट । आचार श्री वद्धेमान सूरिके
पटर श्री जिनेश्वर मृरिजी से यट गच्छ खरतर नाम से प्रसिद्र इथ] उनके परग्ती आचार्या
के सब्न्ध भे कतिपय सक्षिप्त रेतिहासिरु वृत्तान्तो का मी निर्देश किया गया है 1 जेसे~
१ श्री जिनेश्वर सूरिजी ने अणहिव्पुर में दुरकभराज के समक्ष ८४ आचार्यो को
जीत कर वसति मा प्रकारित किया ।
२ श्री जिनचद्र मृरिजी ने उपदेगा द्वारा सपति फो रजित किया एर शवेग-
रण्ाला नाम प्रय की रचना की]
३ श्री अभयदेव सूरिजी ने ९ अर्गो पर टीका बनाई एव स्मन पवनाय कीं
प्रतिमा प्रकट की ।
£ श्री जिनग्डम सूरिजी नेनदी, न्हयण, रथ, प्रतिष्ठा, युति कै ताला
रास मादि का रात्रिम किये जाने निषिद्ध फियि।
५ श्री जिनदत्त मरिजी ने उन्ञैन मे ध्यान-वल से योगिनी चक्रं को प्रतिरोध
दिया । शास्तन देयता ने इदे शुग प्रधान पद् धारक पोपित जिया ।
६ शरी जिनचद्र सूरिजी वडे रूपयान यै 1 इन्नि वहत से श्रावं को प्रति-
बोध दिया |
७ ध्री जिनपति सूरिजी ने अजमेर के ब्ुपति ( पूय्वीराज › की सभा मेँ पदप्रभ
को पराजित कर् जयपत्र प्राप्त किया ।
८ ओ जिनेश्वर सूरिजी ने अनेक स्थानों म जिनाक्य एव तदुपरि ध्वज, दण्ड,
"कठा, तोरणादि स्यापित किमि एव १२३ साथु दीक्षित किये ।
इने पद्ध श्री जिनप्रवोध सूरि के पद्रषर श्री जिनचद्र सूरिजी के समय भे
काणा भँ वाचनाचारथ राजननेखर गणि के समीप, सपत् १३४७ के माघ मासरभेः
इ चतुष्पदी की रचना हृई । इसकी एक प्रति दमे जैसलमेर के मडार का म॒वटोकन
करते इ प्रात इई थी, जिमफी नकत ट्मारे पास विमान दे जीर उससे आपद्यक
पाठान्तर मी ल्थि गये दह ।
प्रोस्ताविक कथनं ७
२, रत्नपरीकषा- यह ग्य १३२१ प्राकृत गाथाओं भँ दे | संवत् १२७२ में
दिष्टी मे सम्राद् अ्ाउदीन के शासनम खपुत्र हेमपाक के ल्यि प्रस्तुत भ्रंथ की स्वना
की | पूवं कवि अगस्त्य ओर बुद्ध भट के ग्रथ के अतिरिक्त शादी रलकोडा की अभूति
दवारा अभिरुषित विषय का सुन्दर प्रतिपादन किया हे ।
३, वास्तु्षार-िस्प स्थाप के विषय मेँ प्रस्तुत प्रय प्रामाणिक माना जाता
ह | प॑. भगवानदासजी ने हिन्दी ओर गुजयती अनुवाद सह जयपुर से प्रकारित मी
क्र दिया है| प्रस्त॒त प्रति संवत् १७० की लिखित है ओर मुद्रित संस्करण से
पाठ मेद का प्राच है । इसकी स्वना संवत् १३७२ विजया-दकशषमी को
कन्ाणापुर मे इई ।
४, ज्योतिषस्षार -यह प्रेय संवत् १३७२ मे २४२ प्राक्त गाथां में
रचित है, जिसकी शोक संख्या, यंत्र हुडकिका सह ४७४ होती है । इसमें ज्योतिष
जेसे वैज्ञानिक विषय को बडी कुराक्ता के साथ निरूपण किया हे ।
५, गणितसार कदी -यह प्रय कुरु ३११ गाथाओं मेँ दै। गणित जेसे
शुष्क ओर बुद्धि प्रधान विषय का निरूपण करते इए ग्रन्थकार ने अपनी योग्यता का
अच्छा परिचय दिया है। इस प्रे के परिरीलन से तत्कारीन वस्तुओं के भाव, तौ
नाप इष्यादि सांस्कृतिक, सामाजिक ओर राजनैतिक परिखिति का अच्छा ज्ञान हो
जाता है | वख के नाम, उनके हिसाब) पत्थर, ककड़ी, सोना, चँदी, धान्य, घृत,
तेखादि के हिसाब के साथ साथक्षित्रों का माप, धान्यो्पत्ति, राजकीय कर, मुकाता
दृ्यादि अनेक महघवप्रणै बातों पर प्रकाश डाला गया है | इसके कतिपय प्रश्च देद्य
भाषा कै छष्पयो मे भी डे जो माषाकीय अध्ययन की दृष्टि से मी अपना
वेष्टय रखते. है ।
६, धातोत्यत्ति - प्राक्त कीः ५७ गाथाओं म पीत, ताबा, सीसा प्रभृति
धातुओं के उत्पत्ति विधानादि के साय साथ हिंयुल, सिदुर, दक्षिणावत्तं संख; कपूर, अगर,
चदन, कस्तूरी आदि वस्तुओं का भी विवरण दिया जो कवि के बहृज्न होने का
सूचक हे ।
७, द्रव्यपरीक्षा प्रस्तुत भ्र कवि की समसत रचनाओं म अद्धितीय है ।
भारतीय साहिष्य में पुराने सिकं के संबन्ध मे खतच्र रचना वाखा यही एक प्रय उपन्ध है
% प° भगवानदासजी के प्रकारित वास्तुसार ( गुजराती अडुवादसटित ) के अंत मेँ रलपरीक्षा
(गा०२६से ११९७) छपी हैँ । उसके वीच की ६१ से ११९ त्क की गाथाएं धातोपत्तिकीहै।
पाठभेद भी काफी है । उक्त प्रन्थाजुसार रलपरीक्षा १२० गाथाओं का होता है । पर चातव मे उसमे
बीच की बहुत सी गाथां द्ूट गड दै ।
< श्रास्ताविक फथन
जिस्म फठाओं के मूढ उपादान, धातुजओ की चासनी, धातुशोधन प्रणालिका, भिन्न मिन्न
मुद्रा (सेकडो रकम की ) के नाम, ठकसालस्यान, आकार प्रकार तीक, माप, धातु
कै मिश्रण, राजां के नाम-ठाम आदि समी विपरयो पर १४९ गायारथो मे, प्राचीन
कारुसेले कर् ततकाठीन समय तक की प्राप्तं समी मुदाओ पर् विशिष्ट विवेचन किया
गया है ।
प्रसृत प्रति जिसके कु ६० पत्र है, सयत १४०३१४०४ ल्ली इई
सुन्दर सुवाच्य ओर अच्छी सितिमेरै। किसी सा० भापदेव के पुत्र पुरिडने
अपने छि छली हे । प्रति के दासिये पर “ पत्तनीय प्र” छिव इई ई जिससे माट्म
होता रे कि यह प्रति मूले पारण के ्ञानभडार की रही होगी । फे प्रथावरी की
प्रस्तुत प्रति से “प्रेकापी ” भयरकाने खय अपने हाय से करक पुरातसयाचा्य सुनि
जिनव्रिजयजी को भेजी, जिसे देख कर इन्दोने उस समय रधी जैन भ्रन्यमा द्वा दूस
तुरत प्रकादित कले की इच्छा व्यक्त की । साय म आपने मूर प्रति को भी देखना चाहा 1
पर् कल्कत्ते की तल्काटीन साप्रदायि प्रिपम परिसिति वरा, वह तव उन नदीं भेजी ना
सकी । घादम जव मुनिजी कठकत्ता पारे तव प्रस्तुत प्रति यो ववरई् ठे गये । श्रद्धेय
निजी जेसे विद्वान के त््ाधान मेँ यह अरय रीघ्र प्रकारित टो देसी हमारी उत्कट
श्च्छा रही, पर सिंघी जेन ग्रन्थमाला के अनेकानेक म्न्थो के सपादन काय म मुनिजी
अयन्त व्यस्त रहने के कारण दस्र प्रकाशन कार्थ मे विठ्व दोता रहा |
परर अव यह प्रन्थ, इस रूप मे राजस्थान पुरातन म्रन्थ माल दवाय प्रकारित हो
रदा है, जो इस विपय के जिकगाओं को परम आनन्द दायकः होगा ।
प्रस्तुत सग्रह मे ठक्कर फेड के °रत्नपरीश्वा' श्रन्थ कै पर्चिय सपमे,
घुप्रसिद्ध विद्वान डो मोती चन्दजी ने, हमारी प्रार्थना पर, एक पिस्तृत निगन्ध छि दिया
दै, जो इसमे मुद्रित टो रहा है । हम इतके व्यि ड साद क प्रति अपना हार्दिक
कृतज्ञ भाग प्रफर् करना चाहते है |
अन्त मे हम आचार्य श्री जिनपिजयजी क प्रति अपना मिनश्र ओर सादर भभार्-
भाय प्रदशित करना चाहते है कि इन्दो ने, बहत परिश्रम के साय, इस प्रन्य का यह
सुन्दर ग्रकायन, राजस्थान पुरातन प्रन्थ माठ के एक सुन्दर र्ञके रूप मेँ प्रकट
कर् हमारे चिराभिकपित मनोरथ को स॒फ़ट वनाया ¦
अगरचन्द तथा भंवरलारू नाहटा
1
टक्ुर फेरूृत रलपरीक्लाका परिचय
व्व
लेखक त ड, मोतीचन्द्र, षम्, ए, भ पीएच्. डी,
( क्युरेटर, प्रिन्स अफ वेखल सुजिअम, वब )
। 8
अमरकोरा ( २।१।३-४ ) मेँ पृथ्वी के अइतीस नामो मेँ वहुधा, वसुमती ओर
रलगभौ नाम आए हैँ जिनसे इस देश के रल ओ व्यापार की ओर ध्यान जाता है | ष्टिनी
ने ( नेचुरक दिस्टी ३७।७६ ) मी भारत के इस व्यापार की ओर हारा किया हे ।
इसमे जरा भी संदेह नहीं किं १८ वीं सदी पथ॑त जव तक्र कि, त्राजिल की रत्नो की खाने नदीं
खुरी थी, भारत संसार भर के रतो का एक प्रधान बाजार था । रतो की खरीद विक्री के
बहुत दिनो के अनुभव से मारतीय जौहरियोने रतपरीक्षा खाल का सजन किया । जिसमें
रतो के खरीद, बेच, नाम, जाति, आकार, घनत्व, रंग, गुण, दोष, कीमत तथा
उत्पत्तिखानो का सांगोपांग विवेचन किया गया । बाद मे जब नकटी रत्न बनने ल्गे
तब उन्हं असङी रत्न से विल्ग करने के तरीके भी वतखाए गए । अंतमे रत्नौ ओर
नक्षत्रौ के सम्बन्ध ओर उनके छ्युभ ओर अञ्चुम प्रभावो कीओरभी पाठकों का ध्यान
दिलाया गया ।
रतपरीक्षा का सायद सबसे पहला उदे कौटिल्य के अर्थराख ८ २।१०।२६ )
म हआ है । इस प्रकरणम अनेक तरह के रत, उनके प्रा्चिख्थान तथा गुण ओर
दोष की विवेचना है । कामसूत्र की चौसठ कओं की ताछ्का मे (कामसूत्र,
१।३।१६ ) रूप्य-रल-परीक्षा ओर मणिरागाकर ज्ञान विशेष कडा मानी गई है ।
जयमेगडा दीका के अनुसार रूप्य-रत-परीक्षा के अन्तगेत सिक्तो तथा रत, हीरा, मोती
इत्यादि के युण दोषों की पहचान व्यापारके किए होती थी । म्रणिरागाकर ज्ञान की
कला मे गहनो के जडने के छिए स्फटिक रंगने ओर र के आकरो का ज्ञान आ
जाता था । दिव्यवदान (प्रर) मेंमीइसवात का उषे है कि व्यापारी को
आठ परीक्षाओं मे, जिनमें रतपरीक्षा भी एक डे, निष्णात होना आवद्यक था । पर
इस रत्रपरीक्षा ने किंस युग मे एक शल् का खूप ग्रहण किया इसका टीक् ठीक पतौ
नहीं चरता } कौटिल्य के कोश-परवेदय रत्नपरीक्षा प्रकरण से तो रेसा मादरम पडता है
किमैययुगमे मी किसी न किसी रूपमे रतपरीश्षा शाख का वैज्ञानिक रूपं स्थिर
हो चुका था । रोम ओर भारत के वीच मेँ $सा की आरंभिक सदियों मे जो व्यापार
चरता था उसमे रत्रौ का मी एक विशेष स्थान था । इसलिए यह अनुमान करना
रायद् गल्त न होगा कि भारतीय व्यापारियों को, सो का अच्छा ज्ञान रहा होगा
& 8ककुर- फर -निरचिते
जीर किसी न किसी रूप मे स्दपरीक्ष, खाद की खापना हो चुकी होगी । जो मौ हो,
इसमे ज मी सदेह नदीं कि ईसा की पाचवीं सदी के पहले रतपरक्षा का सृजन
हो चुका था)
यह सम लेना भूल होगा कि रत-परीक्षा शाल केरल ज्रयो की शिक्षा क
ठि ही बना था इसमे शक नही कि, जैसा दिव्यावदान भँ कहा गया दै, व्याप्यो
के पत्र ्रणी ओर दुग्रिय ( दिव्यावदान, प° २६५ २९ ) को ओर् ओर् वियाभो के साय
साथ रतपरीक्षा मी पढ़ना पडा था । हमे इस वात का पता दै कि प्राचीन भारतम
राजा ओर रईस सतो क पारी होते ये । यद आदयक मी था क्यो कि व्यापारियो
के दित्वे री रत्र खरीदते ये जर सग्रह करतेथे । जैसा कि हमे सदिसे पता
चठता है, काव्यकात को मी इत रत्राख्च का ज्ञान होना था ओर वे वद्धा स्तोका
उपयोग खूपको ओर उपमाओ भ करते ये, गो किं रत सम्बन्धी उनके अकार कमी
कमी जतिरजित होकर वास्तविकता से वहत दूर जा पटृचते थे । जेसा किमे
भृच्छफटिक के चौथे सक से पता चरता है, कि जव विदूपफ़ व्तसेना के महल मेँ
घुसा तो उसने च्छे परकोटे के आगन के दाछानो मेँ कारगर को आपस मेँ वैय,
मोती, मूरा पुखराज, नीठम, कर्तन, मानिक ओर् पने के सम्बन्ध मे वातचीत कते
देखा \ मानिक सोने से जडे ( वय्यन्ते ) जा रदे ये, सोने के गहने ण्डे जाद्देये,
शख कटि जा रहै ये, ओर काटने कै किए मूरो सान पर चदढ़ाए् जा रहे थे । उप्यक्त
व्िपरण से इस वात का पता चल जाता है कि श्द्रक को रतपरीक्षा का अच्छा ज्ञान
रदा दोगा । करानि के आच्वे सरग मे सोनारो के वणैन से भी इस वाते का परता
चलता है वि क्मेन्र को उनकी कठा ओर रतान का अच्छा परिचय था} '
रत्परीत्ता राक्र का जितना दी मान था, उतना दी बह शाञ्च कठिन माना
जाता था । इसीलिए एक कुठ रलनपरीक्षफ का समाज म काफि आदर होता था।
रनपरीक्षा कै ग्रय उसका नाम वडे आदर से ठेते है । अगस्तिमतः ( ६७-६८) के
अयुप्ार गुणवान मडल्कि जिस देदा मेँ होता हे, वह धन्य हे] ग्राहक को
उसे घुलाकर आसन देकर तया गध भाखादि से सत्कार करना चाहिए । बुद्धभटर
( १४-१५.) के अनुसार रत्नपरीक्षको को साखक्न एव दुल होना चाहिए ! इसी-
ल्यि उन र्नो के मूल्य ओर मात्रा के जानकार कहा गया दै । देश काट के असार
मूल्य न भने बले तथा शाख से अनभि ङ्ग जौहरियो की विद्वान कदर नही करते ।
व्छुर केषू ( १०६-१०७) का भाव मी कुक देता दी हे। उक्ते अदुतार मडकिकि
1 देखिए, लेठेपिदर जदिया, शी टद कनो, पारी १८९६ 1 भत्र इस मूपा थो स्ने म श्री
पलि के भ्रथ से सदायता ठी द जिघ्र मनै भामार मानता हू 1 श्री श्नि ने अपने इपर महत्वपूषं ग्रथ
भे उपरम्य रत्न शालं को एक जगह इका कर दिया है । । ४
श्तपरीक्चा का परिचय 2
को शाङ्ग, आंखवाला, अनुभवी, देश, काठ ओर भाव का ज्ञाता ओर रत्नो के खूप
का जानकार होना आवद्यक था । हीनांग, नीच जाति, सव्य रहित ओर बदनाम व्यक्ति
जानकार ओर मान्य ्टोने पर भी असङी जौहरी कमी नहीं हो सकता । अगस्तिमत
(६५) नेमी यही भाव प्रकट किष है ।
अगस्िमत ८ ५४--६& ) के अनुसार चतुर जौहरी को म॑डलिन् कहा गया हे ।
यह नाम शायद् इसलिए पडा कि जौहरी अपना काम करते समय मंडल में वैठता था |
यह भी संमव है किं यहां मंड से संडठी यानी समूह का मतल्व हयो | अगस्ति मत
८ ६१-६६ ) के अनुसार जौहरी रत्नौ का मूलय आंकता था । उसे देश मेँ मिलने
आठ खानो तथा विदेशी ओर द्वीपो सेअ इएरतनकाज्ञान होता था। उसे रतं
की जाति, राग रंग, वर्ति, तौर, गुण; आकर, दोष, आव ( छाया ) ओर मूल्य का पता
होता था । वह आकर ( पूर्री मध्यभारत ), प्रदेश, करभीर, मध्यदेदा, सिंह तथा सिंधु
नदी की घाटी मेँ रत्न खरीदता था तथा रन बेचने ओर खरीदने वे के बीच मध्यस्थ
का काम करता था। अगस्िमत (७२ ) क अनुसार वह र्नं विक्रेता से हाथ मिटा-
कर अगुल्यो के इारे से उसे रनक मूल्य का पतादेदेताथा। उसी कै एक क्षेपक
८ १२३-२३ ) के अनुसार १, २, ३, ४ संख्याओं का करमशः तजनी से दूपपी अंगु-
ल्यं को पकडने से बोध होता था । अंगरूठे सहित चारो अंगुल्यां पकड़ने से ५ की
संख्या प्रकट होती थी । कनिष्ठा आदि के तङस्पशे से कमशः ६, ७, ८ ओर ९ की
सैष्याओं का बोध होता था; तथा तज्ञनी से १० का । फिर नखो कै छने से कमः ११,
१२; १३, १४ ओर १५ का बोध होता था । इसके बाद हथेरी छने पर कनिष्टादि से
१६ से १९ तक की सं्याओं का बोध होता था। तजनी आदिकादो, तीन, चार
ओर पांच वार् छने से २० से ५० तक की संस्याओं का बोध होता था | कनिष्ठा
अदिके त्य को ष वार तक छ्ूनेसे६०से९० तक अंकों कीओर इशारा हो
जाता था; तथा आधी तजनी पकड़ने से १००) आधी मध्यमा पकडने से १०००, आधी
अनामिका पकडने से अयुत, आधी कनिष्ठिका से १०००००; अंगूढे से ्रयुत, कटाई
से करोड । मुगक कारम तथा अव मी अंगुलियों की सकरेतिकवं भाषा से जौहरी
अपना व्यापार चरति है ।
प्राचीन साहिय मे मी वद्धा जौहरियों के सम्बन्ध मेँ उष्ेख मिरूते हैँ । दिव्या-
वदान (घ्र० ३) म कहागयादै किं किसी रत्न की कीमत आंकने के किए जौहरी
घुरुये जाते धे | अग्र वे रत्न की टीक् टीकर कीमत नहीं आंक सक्ते ये तो उसका
भूर्य वे एक करोड कह देते ये । बृहत्कथा शछछोकसंग्रह ८ १८, ३६६ ) से पता चरूता है
कि .सानुदस ने पाड्य मथुरा में प्ुच कर वहां का जौहरी बाजार देवा ओर बहां
एक कता ओर क्तरिता को, एक जौहरी से, एक र्ारंकार् का सूय आंकने को कहते
४ उश्ुर-फैरू-षिरचित ॥
घना । सानुदाक्च को उस गहने की ओर ताकते हए देखकर उन्होने समनना करि शायद यह
निगाहदार था। उससे प्रजने प्र उसने गहने की कीमत 'एक करोड वता कर कट दिया करि
येचने ओर खपीदनेगले की मजी से सौदा पट सकता या 1 वे दोर्नो एक दूरे जौहरी
के पास पहुचे जिने का किं गहने की कीमत सारा सप्रार था पर नासमन्न के टिए
उसक्रा मोल एक छृदाम था । सानुदास की जानकार से प्रपन द्योकर राजा ने उसे
अपना रततपरीक्षक नियुक्त कर दिया ।
प्राचीन साहि म॑ अनेक देसे उदे आए है जिनसे पता चट्ता है पि रोके
व्यापार के लिए भारतीय जौहरी दे ओर विदेरा की वरावर् यात्रा करते ये । दिन्या-
वदान (प्र° २२९-२३० ) की एक कानी मेँ वतखाया गया हे कि रत के व्यापारी
मती, वदथ, रख, मूमा, चादौ, सोना, अकीर, जष्ठनिया, ओर दक्षिणावते जख के भ्यापार
के लिए समुद्र यत्रा करते थे । नियीमक प्राय" उरनं सिंहल द्वीप मेँ वनने वले नकटी
र्नो से दोद्गियार कर देता था तया उरन्दे भेदा देदेताथागरिवे खुब समङ्ग कर माठ
खरे । जञाता्ध्म कथा ( १७) ओर उत्तराध्ययन सूत्रकी रीका (३६।७२ ) से मी स्तो फे
दस व्यापार की ओर् सकेत मिकन। है । उत्तराच्यधन दीका मँ एक ईरानी व्यापारी की
कहानी दी गई दैजो ईरान से इष देश मे सोना, चादी, रत ओर मरा ठिपा कर ठाना
चाहता था । अबद्ध चूर्णिं (प° ३४२ ) म रक्व्यापार के लिए एक वनिष् का
पारमकूठ जाने का उठेल हे 1 महाभारत ८ २।२७१२५-२६ ) के अनुसार दक्षिण
समुद्र से इस देश म रत ओर मृगे अते थे । ईसा की प्रारभिक सियो भ तो भारत से
रोम को हीरे, साड, ठोदिताक, अफीक, सार्डोनिक्स, वावागोरी, कराइसप्रेस, जहर मुहरा,
रक्तमणि, हेतरियोदूप, उ्योतिरस, कसौटी पत्यर, लदघुनिया, पर्वलुरीन, जमुनिया, स्फटिक,
व्रिठौर, कोर, नीलम, मानिक जाल, उख्य, गर्निट, तुदमुरी, मोती इत्यादि पहचते थे
( मोतीचन््र, सार्थवाह, प० १२८-१२९ )
-४२;-
प्राचीन स्परीक्षा का क्या खूप रहा रोगा यह तो ठीक टीक नहीं कहा जा
सकता, पर उस सम्बन्ध के जो प्रथ मिले है उनका विवरण नीचे दिया जाता दै ।
१, अर्थनाञ्च-कौटिव्य ने कोग-परेदय रतपरीक्षा ( अर्थराल, २-१०-२९)
मे रतपरी्षा के मन्ध की छ जानकारिया दी है । कोश मे अधिकारी व्यक्छियो
के साह से ही रत्र खरीदे जते थे । पहले प्रकरण भ मोती के उत्पत्ति स्थान, गुण,
दोप तथा आकार इत्यादि का वर्णन हे ! इसके बाद मणि, सौगधिक, वैद्य, पुष्पराग,
इन्नीठ, नदक, खनन्मध्य, सुथकान्त, विमल्क, सस्यकः, जजनमूल, पित्तक्, सुकमक,
ोदितक, अगताड्क, प्योतिरसक, मेलेयक, भदिन्छनफ, कूप, प्रतिकूपै, उुगन्धिकूप,
रललपरीक्चा का परिचय ध्
क्षीरपक, घुक्तिचूर्णक, सिखप्रनालक, चूरुक, शुक्रपुल्क तथा हीरा ओर मृगा ' के नाम
आए है । इनमें से बहुत से रत की ठीक ठीक पहचान भी नदीं हो सकती क्योंकि
वाद के रत्रा उनका उष्छेख तक नहीं करते ।
२, रल्रपरीक्षा-बुद्धभद्न की रतपरी्षा का समय निशित करने के पहठे वराह-
मिहिर की बृहत् संहिता के ८० से ८३ अध्यायो की जानकारी जरूरी हे | इन
अध्यायो मे हीरा, मोती ओर मानिक के बणैन हैँ | पन्ने का वर्णेन तो केवल एक शोक
महै | बुद्धभट्ट की रतपरीक्षा ओर च्रृहतसंहिता के रतप्रकरण की छानवीन क्ररके श्री
फिनो ८ वही प° ७ से) इस नतीजे पर पर्हचते हैँ कि दोनों की रतो की तालिकाओं
तथा हीरे ओर मोती का भाव ङ्गानि की विधि इव्यादि में बड़ी मानता है । इससे यहं
अनुमान लगाया जा सकता है कि दोनो म्रथो ने समान रूप से किसी प्राचीन रन्शाक्च
से अपना मसाखा लिया । गरूड पुराण ने भी बद्धम का नाम हटाकर ६८ से ७०
अध्यायो में रतपरीक्षा ग्रहण कर लिया | बहुत संभव है कि शायद बुद्धभट् का समय
७-८ वीं सदी या इसके पहटे भी टो सकता है ।
३, अगस्तिमत-अगसिमत ओर रतपरीक्षा का विषय एक होते इए भी दोनों
म इतना मेद है कि दोनों एक दी अनुश्चुति की वहत दिनोसे अल्ग इई शाखा जान
पडते हैँ । श्री फिनो ( प° ११) के अनुसार अगस्तिमत का समय बुद्ध के बाद
यानीं छटी सदी के बाद माना जाना चाहिए । चायद उसका ठेखक दक्षिण का
रहनेवाखा जान पडता दै । संमव है कि अगस्तिमत का आधार कोई रेसा रतदाख
रहा हयो जिसकी ख्याति दक्षिण मे बहत दिनों तक थी | प्रथ के अनेक उव से रसा
पता चरता है, कि रत्रशाल्र के प्राचीन सिद्धान्तो को निबाहते इए भी प्र॑थकार् ने
अपने अनुभवो का उषे किया है । अमाग्यवश प्र॑थकार के व्याकरण ओर दी मं
निष्णात न होने से उसके भाव समञ्नने मे बड़ी कठिनाई पड़ती है ।
४. नवर्तपरीक्षा-नवरन्परीक्षा के दो संस्करण मिते है । छोटे संस्करण मं
सोम भूभूजू का नाम तीन जगह मिरुता है जिसके आधार पर यदह माना जा सकता
है कि इसके रचयिता कल्याणी का पश्चिमी चाद्क्य राजा सोमेश्वर ८ ११२८-१ १३८, ई.)
था | इस कथन की सचाई इस बात से भी सिद्ध होती है कि मानसो के कोचः
ध्याये ( मानसोक्छास, भा० १, प° ६४्से) जोतों का वर्णन है, वह सिवाय कुछ
छोटे मोटे पाठभेद के नवरततपरीक्षा जेसा ही है । नवरक्परीक्षा का दूसरा संस्करण
वीकानेर ओर तजोरकी हस्तङिलित प्रियो मेँ मिता है । इसमे धातुगद्, युद्राप्रकार
ओर कृत्रिम रतप्रकार प्रकरण अधिक | संभव दै कि स्पृतिसारोद्धार के सेक
नारायण पंडित ने इन प्रकरणो को अपनी ओर से जोड़ दिया हो ।
उ्कुर-फेरू-विरचित
५. अगस्तीय रतपरीक्षा-अगस्तीय रत्परीक्षा वातय मेँ अगस्ति मत का सार
है| पर विस्तार मँ कीं की नई वते आ गई है । अमाग्यनन इसरा पाठ वहत शष्ट
ओर भद्ध ३1 ,
ए ,)।
उपुक्त प्र्यो के सिवाय रएतमग्रद, अथया रतसमुचय, अयवा समस्तरतपरीक्ता
२२ शोको काणक शो सा ग्रथ ३) व्घुरतपरीक्षामें मी २० शोक है, जिनमें
रतो के युण दोषों का विमरण £ | मणिमाहास्य म रिय पार्वती सवाद के रूपमे ङु
उपरतो की महिमा गाई गद है ।
६, फेर रचित रततपरीक्षा-ण्छुर फेरूर चित रत्री, का कद कारणो
से विशेष महत हे । प्री वात तो यह है कि यह ॒रत्परी्ता प्ररत में दे। टकर
फर के पहले भी शायद प्रान मे रतपरीक्षा पर कोई प्रय रहा हो, पर उप्ता अमी
तक पता नदीं । दुप्तपी वात यह है कि ग्रक्रार श्रीमा जाति मँ उत्पन्न ठद्ुर चद के
पुत्र ग्र फेर का सुल्तान अदाउदीन दिव्जी ( १२९६१३१६) के खनने ओर
टक्सार से निकटतर् सम्बन्ध था 1 उसका खय कहना है कि उसने चरहस्पति, अगस्य ओर
बुद्धमह की रत्परीक्षा्ओं का अध्ययन कफे ओर एक जौहरी की निगाह से अलाउदीन के
खजाने मेँ र्नो को देख कर्, अपने अय की स्वना की( ३-५) उसके इस कथन से
यह धात साफ माद्धम पड जाती है कि कमसेकमईपाकी १२ वींसदी के अतं
वुद्धभट् की रक्परीक्षा, वराटमिदिर के रत्नो पर के अध्याय ओर अगस्िमत, रलशास्र पर्
अधिकारी ग्रथ माने जाते थे ओर उनका उपयोग उप्त युग के जौहरी वरावर करते
रहते थे । जेसा हम आगे चङ कर दे्ेगे, व्चुर फेर ने रतपरीक्षा की प्राचीन
परम्परा की रक्षा करते इए भी तत्काीन मूल्य, नाप, तोक तथा रतो के अनेक नए
सरतो का उदधे किया दै जिनका पता हमे फारसी इतिहास्कारो से मी नदीं चरता ।
1 ) ॥
-ऽ:-
५
1
प्राचीन रत्शा्खो म खानों से निक्लेरतों के सियाय मोती ओर मगा भी
शामिठ & जो वास्त में पत्य नहीं के जा सक्ते । साधारणत जयाहरात के लिए
रज्ञ ओर मणि ओर कमी कमी उपक शन्द का व्यवहार किया गया है ¡ सख्त
सादिल भे रत शब्द् का व्यवहार कीमनी वस्तु ओर कीमती जवाहरात के ल्प हुआ
६ 1 वरहमिदिर ( चर° स० ८०।२ ) के भुसार् रत शब्द का व्यवहार हाथी, धोद़ा
खी इवादि के छि गुणपरक दै, र्परीक्षा में इसका ग्ययहार केगट कचनादि रनौ के
हिप इमा ₹ । मणि शन्द का व्यवह्यर कीमती र्ता के टि दभा हे पर बहूधा यह
द्द् मनिया, गुरिया अयना मनक लिए भी भाया हे । ॥
1
रेलपरीश्चा का परिचथं ए
वेदौ मे रत शाब्द का प्रयोग कीमती वस्तु ओर खजानों कँ अर्थम इभा है
ऋगवेद म तीन जगह ( फिनो, पण १५) सप्त रतो का उख है । मणि का अर्थं
ऋग्वेद मे तावीज की तरह पहननेषाले रत से दै ८ छऋष्ेद, १।३।८; अ०-वे०
१।२९२; २।४।१ इयादि ) मणि तामे मेँ पियोकर गले मेँ पहनी जाती थी ( वाजसनेयी
सं० २०1७; तैत्तिरीयसं ३।४।२।१ ) इसमे भी संदेह नहीं कि वैदिक आर्यो को मोती
काभीज्ञान था। मोती ( छृरान) का उपयोग शगार ऊ लिए होता था ( ऋगवेद,
२।२५।४; १०।६८}१; अथववेद ४।१०।१-३ )
सुम्यवखित रतरशाखो के अनुसार नव रत मे पांच महारतं ओर चार उपरतं
है । वज्र, मुक्ता, माणिक्य, नीक ओर मरकत महारत्न है । गोमेद, पुष्पराग, वैद्ये
( रहसनिया ) ओर प्रवा उपरत है । मानिक ओर नीरम के कई मेद गिनाए गए
है । वराहमिहिर ( ८२।१ ) तथा बुद्ध ( ११४) के अनुसार मानिक के चार भेद
यथा-प्रयराग, सौगंधि, कुरर्विद ओर स्फटिक हैँ । अगस्तिमत ( १७३ ) के अनुसार
मानिक के तीन मेद् है; यथा-पृद्रगः सोगंधिक; ऊुरुविंद । नवरतपरीक्षा
८ १०९-११०) मेँ इनके सिवाय नील्मधि मी आ गया है। अगस्तीय रत्नपरीक्षा में
(४६ से) मानिक का एक नाम मांसर्पिडमी है। ठक्कर फेर के अनुसार (५६)
मानिक के साधारण नाम माणिक्य ओर चुनी, अव भी मानिकके येदहीदो नाम
सर्वसाधारण में प्रचलित है । मानिक के निन्नलिखित मेद गिनाए गए है ~ पद्मराय
( पद्मराग ), सौगंधिय ( सैगेधिकर ), नीरगेध, कुरुविन्द भर जायुणिय |
रतपरीक्षाओं म नीलम के तीन मेद गिनाए गए ह~ नीर साधारण नीलम कैं
लिए व्यवहृत इआ है तथा इन्द्रनीठ ओर महानीक उसकी कीमती किस्म थीं।
स्कर फे ने (८१) नीलम की केवर एक किस्म मर्हिदनील ८ महेन्द्रनीरु)
वेतखाया हे |
प्राचीन रतपरीक्षाओं म पने के मरकत ओर ताक नाम आए । प्र ठ्कररं
पैर (७२ ) ने पन्ने के निम्नठिखित भेद दिए है - गरुडोदार, कीडउटी, वासउती,
मूराउनी, ओर धूलिमराई ।
उपयुक्त नव रतो की तालिका प्रायः सव रत॑शाखो मे आती हे प्र अगस्िमतं
( २२५२९ ) मँ स्फटिक ओर प्रभ जोड़कर उनकी संख्या ग्यारह कर दी गई हे |
बुद्धमद्र ने उस तालिका मे पांच निग्रछिखित रत्र जोड दिए हैँ यथा शेप ( णण्फ़ड )
कर्केतन ("8०१७ } मीष्म, पुरक (&०७४ ) सुधिराक्ष ( व्वण्लाव्य ) शोष का
ही अरबी जन् रूपान्तर दै । यह पत्थर मारत ओर यमन से अता था । इसके वहत से
रंग होते ह जिनमे सफेद ओर काठः प्रधान हे । भारत में इस पत्थर का पहनना अशुभ
८ उ्कर- कैर -विरचितं
माना जाता धरा मीप्प कोई सफेद रग का पत्यर होता या । घुद्धभद. ८-२१२-७९ )
के अनुसार कषायकं पिलाहट ठि इए खट्एा का पत्थर ह्येता था जो शुक्तिरपतर
के अनुसार स्फटिक. का एक मेद मात्र था । सोमठक़ नीठमायठ सफेद पत्थर था ओर
कुरु कर्कैतन के किस कां नीला पत्थर था। ।
वराहमिहिर की रतो की तालिका मे वाद नाम गिनार गए परणए्कदी स्त
फी अनेक किस्म देखते हुए उनकी सख्या कम कर दी जा सकती है } चपर दिकान्त
स्फटिक का ही एक मेद है, महानीठ ओर इन्द्रनीक नीटम है, तथा सौगधिक ओर
पद्मराग मानिक के ही मेद् है । इस तरह रतो की सख्या घट कर उन्नी हो जाती है
यथा स्फटिक कै सहित दस रत, कर्केनन, पुलकः रुधिराक्ष तथा विषकक, राजमणि,
शख, ब्रह्मणि, प्योतिरस ओर सस्यक । प्योतिरस ओर सस्यक का उव अर्था
(२।११।२९ ममी इआरहै। राख से शायद यहा दक्षिणावर्तं जख का अनुमान
किया जा सकता है । ज्योतिरस शायद जेस्पर या हेषियोटप था ।
उपथुक्त रतौ के सिवाय, फिरोजा ( पेरोज, पीरोज ) लाजवदै ओर चघुन यानी
लहघुनिया या वेद्यै के नाम मी आए है ¡ रत्सग्रह । ( १९ › भे मपतारगभे ( रूप-
सु्ारग, सुसक्ग्े, सुप्ारगख, पालि-मसारगछ, मुसारगछ ) को दूध पानी अलग
करने वाटा, श्यामरग का, चमकीरा तथा दुष्ट दोपो का अपहनत्त कहा गया दै । शाब्द
कसपद्ुम ने इसे इन्दनीकमणि कहा है जो ठीक नदीं | महामारत ( २।४७१४ ) मे
मगदत्त द्वारा युधिष्ठिर को अमसार का वना पात्र ठेने का उ्ेख है जिसकी पहचान
शायद मसारगभे से की जा सकती हे | मसारगभे की पहचान चीनी रसुन-चे-बू यानी
जमुनिया से की जाती है, पर अदमसार् यश्व भी हो सकता है । क्यो कि आघाम का
पदोषी वमी यय के लष प्रसिद्ध ३ै।
ठु फेरुकृन रतपरीत्ता ( १४-१५) मे नवर यथा पद्रशग, सुक्ता,
विहम्, मरकन, पुखराज, हीरा, इन्दनीक, गोमेद ओर वैद्यं गिनाए है । इनके सिवाय
हसणिया ( ९२--९३ ) फठह ८ स्फटिक, ९५९६ ) कर्केतन ( ९८) भीस्म
(भीम्म) ९९) नाम आए है । ठर फे ने लाल, अकीफ ओर् पिरोजा को पारसी
क 0 हे ( १७३ ), इस तरह ठर फे के अनुसार रतो की सद्या सोज्ह
ठती ई ।
प्र वभैरताकर के रचयिता ग्योतिरीश्चर ठ्कुर ( आरमिक १४ वीं सदी के
समय म गता दे करि १८ रत्न ओर् ३२ उपरत माने जातेये ( वणैर्नाकर, प्र २१,
४१, शी घनीतिढुमार चटर्जी द्वा सपादित, कलकत्ता १९४० ) । रत की तालिका
भ गोमेद, गरुदोदरार, मरकत, सुकुलता, मांसखड, पञ्मराग, हीर, रेुज, मारसिस,,सोग-
रक्परीश्चा का परिचय ९
धिक चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, 'प्रवाट, राजावर्त, कषाय ओर इन्द्रनीट के नाम आए है |
इस तालिका म रतपरीक्षा के महारतो मे गोमेद, मरकत, युक्ता, हीरा, परग, इन्द्र-
नीट, प्रवा ओर सूर्यकान्त है । मांसखड, सौगंधिक, ( शायद चुनरी ), तो पग्रराग
या मानिकके ही मेद है । इसी तरह चन्द्रकान्त, सूथैकान्त ओर कषाय स्फटिक के
मेद है । मारासेस जिसका सम्बन्ध रोष (०४२) से हो सकता है; तथा ङाजवर्द
को गणना रतो मे किस प्रकार की गई यह कहना सम्भव नहीं |
, उपमणि्यो की तालिका व्णैर्ाकर मँ दो जगह आई है [ ¶० २१, ४१ |
इनमें [ १] करू्म, [२] महाकूर्म, [३] अदित, [ ९ ] स्यावगं (सं) घ, [५]
व्योमराग, [ ६ ] कीटपक्ष, [ ७ ] कुरू [ शर्म ] विद, [ ८ ] सूथमा (ना) छ, [ ९ |
हरि (री). तसार, [ १०] जीवि (जीवित), [ ११] यवयाति ( यवजाति);
[ १२] दिखि (खी ) निल, [ १३ ] वंदपत्र, [ १४] धू ( चू) छिमरकत, [ १५ |
भस्मांग, [ १६ ] जंबुकान्त, [ १७] स्फटिक, [ १८ ] कर्कैतर, [ १९ ] पारिपात्न;
[२० ] नन्दक, [२१] अच (तु) नक, [२२] लोहितकः [२३] रैयेयकः
[२४] छक्तिचूणे, [२५] पुख्कः [ २६ ] तख (व्य) क) [२७ | श्यकम्रीव
[२८ ] गुरुत (ड) पक्ष [२९] पीतराग, [३०] वणेरस (सर ) [३१ |
कपपूरक, [ ३२. ] काच ।
उपमणियों की उपयुक्त तालिका म कुछ मणियो पर ध्यान दिलाना आवदयक
, है । इसमे क्रर्म ओर महाकूर्म तो मणियो की श्रेणी मे नहीं आते । कुष की खपडियों
का व्यापार बहत पुराना है ओर इसका उषे पेरिस मे अनेक वार हआ है. ८ साफ,
पेरिस आफ दि एरीथियन सी, प्र १२ इत्यादि ) अहिछत्रक का उद्ेख हमारा ध्यान
कौटिस्य ८ २।१।२९ ) के आदिच्छत्रक रतन की ओर ठे जाता दै । धूलिमरकत से यहां
रायद पने के खड से मतख्व है ओर इस तरह वह ठक्कर फेरू की धूलिपराई भी शायद
खड हयो । भस्मांग से यहां रायद भीष्म से मतल्व है । जंबुकान्त से शायद जमुनियां
का मतलब है । अंजन, पुरुक, नंदक ओर छक्तिचूर्णैक के नाम भी अथशा मँ आए
है | कर्कैतर से यहां कर्तन का तथा खोहितक से लोहितांक का मतछ्व है | तुत्थक
से हमारा ध्यान कौषिल्य के तुत्थोद्भत चांदी की ओर खींच जाता है ( १२।१४।३२ ) ।
काच से काच मणि की ओर इशारा दै।
सन् १४२१ मे छिखित प्थ्वीचन्द्र चरित्र ( प्राचीन गुजर कान्य संग्रह पु
९५, बडोदा, १९२०) म रतं ओर उपरतो की निम्न टिखित तालिका दी गई है-
पश्मराग, पुष्पराग ( पुखराज › माणिक, सीधछिया, गरुडोद्वार, मणि, मरकत, कर्कैतन,
वज्र, वेद, चन्द्रकान्त, सू्ैकान्त, जलकान्त, रिवकान्त, चन्द्रपमम, साकर प्रम, प्रभनाथ,
अरोक, वीतरोक, अपराजित, गंगोदक, मसारगष्ट, हंसगभ, पुलक, सौगंधिक, सुभग,
ब्
श्य उदुर- फेरू- विरचित
वेदय ओर पसं से शह र्नो की उत्पत्ति इई । नयरएल प्रीना (< से) दैयका
नाम वन्न दिया गयारै। व्राघुर को हराने के लिए इन्द्र ने उससे उसके इारीरदान
का वर् मागा | ताह्मण वेपधारी इन्द्र की प्रार्थना खीकार् कर लेने प्र् यट जान करकि
उसफा शरीर अमेव है, इन्द्र मे उसे मलक पर वन्न से प्रहार किया । उसके, दारीर से
तरह तरह के रत्न निकले । दे, नाग, सिद्ध, यक्ष, राक्ष ओर त्रिनयने तो ,बह रन
जाल ग्रहण कर लिया, वाकी र्न पृथ्वी पर् कैठ गए ।
उक्छुर फेर (६-१९ ) ी रत्नोपत्ति सम्यन्वी असुत का खूप भी वुद्धभ्र वारी
जन्रुति जैसा ही दै । एक दिन अहुर वलि इन्द्रोक को जीतने गया । वहा देमातओं
ने उमते यक्ग-पद्य वननेकी प्रार्थनां की जिते उसने खीकार कर लिया | उसकी
हयो से हीरे, दातो से मोती, लह से माणिक, पित्त से पना, आर्खो से नीटम, हृत्
रस से वैद, मजा से कर्केतन, नर्खो से ठदघुनिया, मेद से टिक, मास से मूगा,
वमद से पुखगज तथा वीय से भीष्म पैदा हए । अषुर वल के दारीर से निक्ठे र्नो
मेतेसू्यने परग, चन्द्र ने मोती, मगल ने मृगा, बुद्ध ने पना, ब्रहस्पति ने
पुखराज, शुक ने रीरा, इनि ने नीठम, राट मे गोमेद ओर कैतुने वैद्यं प्रण फर
लिए जीर इसीलिषए इन र्नो को धारण करने वाटे उपर्युक्त ग्रहो से पीडा नदीं पते ।
चोखे रले छद्धिदायक ओर सदोप रल दरिद्रता देने वले होते है ।
पर रनौ की उत्पत्ति के सम्बन्ध मेँ उपयुक्त मत दी प्रचलित नहीं था, इसका
निराकरण वराहमिदिर ( ८०।३) ने कर दिया है} उनके अनुप्ार एक मत से रन
दैयवट से उत्पन्न हए, दूस का कहना है करि दघीचि से कठ इस मतके है कि उनकी
उत्पत्ति पत्थरो के खभव्वैचिन्य से दै । उक्छुर् केर ( १२) के अनुसार भी कुछ
खोगरेसेये जिनका मतयाकि रन पष्नीके विकार है} जसे सोना, चादी, तावा
आदि धातुर्दैवैसे री र्न मी।
एकः दूसरे विश्वास के अनुसार मनुष्य, सर्प तथा भटक के सरमे पणिष्टोती थी
( अगस्तिमत, ६३-६७ ) मराहमिहिर, ( ८५५) के अनुसार सर्पमणि गेहरे नीलि एग
की ओर् वड़ी चमकदार होत्री थी |
(२ ) आकर-र्नों की खान को आकर कदा गया है 1 बरारहमिदिर ८ ८०-१७ )
कै अनुपरार नदी, खान ओर छिटफुट मि्ने की जगह आकर हे । बुद्धभह ( १० ) ने
आकरो मे समुद्र, नदी, प्त ओर जगल गिनाए ह ।
(३) बण, छाया -प्राचीन प्रथो भेरर्नोकेराको छया कट्या गयाहै। पर
वाद के शा्खमे वर्णक टि छाया शब्द का व्यवद्टार इ ई । वहुधा ज्राल्चकार
सनौ को छाया की उपम जानी पहचानी वस्तु्भो से देते है । ॥
\
रलपरीक्ा का परिचय १३
(४) जाति-र्नसाखो मे इस रब्द ` का तीन अर्थो में प्रयोग हज हे । यथा
असली रत्न, रत्न की किंस ओर जाति । अंतिम विश्वास के असार रत्नो मेँ मी जातिमेद
होता था । यह विश्वा शायद पदे प्रहछ हीरे तक ही सीमित था । इसके अनुसार
ब्राह्मण को सफेद हीरा, क्षत्रिय को छर, वैरय को पीठा ओर श्ुद्रको काटा दीरा
पहनने का विधान था । बाद मँ यह विश्वस्त ओर रत्नों के सम्बन्ध मेँ भी
प्रचलित हो गया ।
(५) गुण, दोष-रनो के सम्बन्ध मेँ इन शब्दो का प्रयोग उनकी शुद्धता ओर
चमत्कार ठेकर हआ है । पिके अर्थ मेँ वे रन के गुण ओर् दोष परक हैँ । दूसरे
अर्थमेवेरत्नके बुरे ओर मठे प्रभाव के चोतक है। र
रत्नौ कै गुण निश्नलिखित दै-महत्ता ( भारीपन ) गुरुत्व, गौरव ८ घनत्व )
काटिन्य, लिग्धता, राग-रंग, आव्र ( अविस्; युति काति, प्रभाव ) ओर खच्छता ।
(६ ) एल-समी र्नो के फर की विवेचना की गई है । अच्छे र्न खास्थ्य,
दीधजीवन, धन ओर गौरव देने वके, सष, जंगरी जानवर, पानी, आग, बिजङी, चोट,
बिमारी इत्यादि से सक्ति देनेवाठे तथा मत्री कायम रखने वके माने गए दहै । उसी
तरह खराब रत्न दुख देनेवारे मने गए हैँ ।
यह ध्यान देने योग्य बातहै, कि र्नो के बीमारी अच्छा करनेके गुणों का रत
साख मे उष्छेख नदीं दै । रतो के फलों की जांच पडतारु से यह भी पता चठ्ता है
वि उनके लिखने मेँ दिमागी कसरत को अधिक प्रश्रय दिया गया है । पर इसमे सदेह
नहीं कि शाक्लकारो ने एत-फक के सम्बन्ध मे टोकविश्वासो की भी चचां कर दी दै।
हीरे का गभेस्लावक फल ओर पने का सर्पविष को रहना इसी कोटि के विश्रास है ।
(७) रतौ कै मूद्य-उनके तौ ओर् प्रमाण प्र अश्रित होते थे । प्राचीन प्रथो मे
रतो का मूल्य ` रूपकों ओर काषापणों मेँ निधीौरित किया गया है। यह पता
नहीं चरता कि रतौ का मू्य सोना अथवा चांदी के सिक्तो मँ निघौरित होता था
पर काषापणके उष्ेव से इनका दाम चांदीके सिक्तो दीम मादम पडता है ।
अगस्िमत के एक क्षेपक ( १२ ) से पता चख्तादैकि गोमेद ओर मगो का दाम
चांदी के सिक में होता था, तथा वैद्य ओर मानिक का सोने के सिक्रो म । ठक्ुरफेर्
( १३७) ने वड हीरे, मोती, मानिक ओर पे का मूल्य खर्णैटको्मे बतलाया रहै |
आधे मासे से चार मासे तक के लाट, छहसुनिया, इन्द्रनीर ओर फियेजा के दाम भी
ख्णसुद्राओं मे होते ये ८ १२१-१२२ ) एक टकम १० से १०० तक चढने वासे
{यदं यह वात उछेखनीय है कि दिव्य रारीर का रत्नों मँ परिणत द्योजाने का विश्वास वैदिक है
(जे° आर० एस १८९४, प° ५५८-८३० ) इरानिरयो का भी ङ एेसा ही विश्वास था
(जे आर° एस १८९५, प° २०२-२०३ )
१४ उष्छर-केरू-विरचित
मोतियो का दाम रुष्य यको भे होता था ( १२४-१२६) । उसी तरह एक सती मे १
से २ यान चढमै वले हीरे कामूल्य मी चादीकेटको म कल्य गया रै ( १२७,२८ )।
गोमेद, स्फटिक, मीष्म, कर्यीतन, पुखराज, वैडय-इन स्वके मूल्य मी द्रम मे
होते थे ( १३० )।
मानसोष्ठास ( १, ४५७-४६४ ) भे रत्र तोलने छी तुखा का सुद्र वर्णन है |
उसे त॒खपात्र कासे के यने षटोते थे | उनमें चार छेद होते ये । जिनसे डोरिया पिरोई
जाती थी! काते की दाही १२ मगुठ की योती थी] जिस्क्रे दोनो घगठ मुद्रिका
होतीं थीं । दाडी के ठी वीचोवीच पाच अगु का काटा होता था। जिसका एक
अगु छेद मे फसा दिया जाता था ] कटे क दोनो जर तोरण की आकृति वनाई जाती
यी | जिसके सिर पर कुडखी दोती थी । उसी मेँ डोरी ल्गती थी । तराजू. साधने कै दिए
एक कल्ज तौर का माल एक पडे मे ओर पानी दूसरे पठ्डे मे भरा जाता था} जव
काटा तोरण के दीक वीच चैठ जाता यातो तराजू सध गई मानी जाती थी।
(८ ) विजाति-स शब्द से कृत्रिम र्नो का तया कीमती र्नो की तरद दिखने
वलि उपर्नो से अभिप्राय है । देसे नकी रन भारत ओर सिंह मेँ बहुतायत से
वनते ये । नवरःन परीक्षा ( १७५४-१८२ ) के अवुपसार सम माग अञे इख ओर
सिदूर को सच प्रपूता गाय के दृघ मे सान कर फिर उसे वृण से वाध कर वास्मे
भर करः मि के वरतन म चाय के साय पका कर फिर उसे निकार कर धीमी भाच
पर रख देते थे, किर उते तेल म बोरते ये । इससे वास के मीतर नक मूरा वन जाता
या] इन्द्रनील वनाने के लिए एक कुप्ये म एक पठ नीक का चरणे ओर दो पठ शख
का वणं भिकारर खुद हिलति ये । पिर पूर्योक्त विधि से नकी इन्रनीठ वना लेते थे ।
नकी मतत वनाने के ठिषएु मजीठ, दुर ओर नीक सममाग मे केकर उसे शीशे की
कु्पी भ खुब मिति थे फिर उनके खे अल्ग करके उन आग भ पकाया जाता
था । मानिक शष के चूण ओर हु के मेक से उपञुक्त विधि से वनता था |
1 ष्ठ ~
इस प्रकरण मँ रन-परीकषा्ओ के आधार प्र॒ उनम आए रो के उपयक भाठ
विरेषता्ओं की जाच पताल करके यह तठाने का प्रयत श्रिया गया,दै कि उर
फे ने अपनी रत्नपरीक्ना मे कटा तर प्राचीनता का उपयोग किया है ओर कहां उसने
एन सम्बन्धी अप्रने अनुभय का 1
दीरा~रीरा सो मे स्ग्रष्ठ माना जाता है । उसकी विशेषता यह है कि बह सव
रनों को काट सकता रै उसे कोई रन नदीं काट सकला । प्राय" सव शालो के अनु-
सार हीरे की उत्पत्ति अघठुखछं की हयो से इई । उसका नाम वन्न इसछ्एु पडा'किं
इनदर घरे वन्नाहत होने पर् दही वह निकाला
॥
श्तरपरीक्ा का परिचय -१५
प्रधान रनशास्र दीरेकी खाने आठ या दस मानते हैँ । पर कौटिल्य ( अनुवाद,
० ७८ ) मे हीरे की खानौ के कुछ दूसरे दी नाम हैँ । यथा, सभाराषटूक ( विदभे या
वरार में ) मध्यम राष्टूक ( कोसङ यानी दक्षिण कोसल मेँ ) कादमक ( रायद अङक )
[ हैदराबाद की गोल्कुडा की खान | इन्द्रयानक ( कर्टिग, ओडीपा ) की तो पहचान
टीकाकारो ने की है! कारमक की पहचान टीकाकर ने बनारसी हीरे से की दै! जिससे
बनारस का दरे तराशोका अहा होने की ओर संकेत ह्यो सकता है | श्रीकटनक हीरा
बेदोत्कट पर्वैत भें मिटता था । श्रीकटनक का ठीक पता नहीं चरता पर शायद् इससे,
धनकटक ८ धरणीकोट ) जो प्राचीन अमरावती का नाम था, बोध होता है । अगर यह
पहचान ठीक है तो यहां कृष्णानदी की धाटी मेँ मिल्नेवटे दरो की ओर संकेत हो
सकत। दै । मणिमन्तक दरा मणिमत् अथवा मणिम॑त पर्व॑त के पास पाया जाता था।
इस मणिमत् पर्वत की पहचान श्रीपार्जिटर ने ८ मार्कण्डेय पुराण, प्र० ३७० ) में
कर्मी के दक्षिण की पहाडियों से की हे । यहां अब ही मिलनेका पता नहीं चरता ।
रलशास्नो मे दी गई हीरे की खानों का पता निभ्नलिखित तालिका से चरु जाएगा-
बुद्धमद्र वराहमिहिर अगस्िमत मानसोषटास अगस्तीय रत्न-संग्रह ठक्कर फेर
रत्नपरीक्षा ।
सुराष्टू ह | 3 ध हमत
हिमाख्य ४ 8 व हिमवतः
मातग ,.,| वंग मातग मगध मातग ।
पौड् |~ ५1 4 ८ .... |पंडरः (पौड्ः)
वेण्यातट व्रेणातट | वेणु । वैरागर ~ आरब | वेणुः
सुपार | ,..| ... । सपार + | सौपारक
यहां यह् निश्चित कर लेना कठिन है कि उपयुक्त यंत्र मे कितने भौगोिक नाम
वास्तनिकता लिए इए हैँ ओर कितने काल्पनिक हैँ । पर इसमे संदेह नहीं की यंत्रं
खानों ओर बाजारों के नाम मिल गर् ह । यह भी संभव दहै कि वहुत सी प्राचीन खनं
समाप्त हो गई हो ओर उनकी खुदाई बहत प्राचीन काल्मे वंद कर दी गई हो|
खर्ट यानी आधुनिक सौराष्ट भर हीरे की किसी खान का पता नदीं चलता पर यह संमव
दे कि यहां से र्न वाहर मेजे जाते हौ । यहां एक उदेखनीय वात यह है विं प्राचीन साहिव्य
म जैसे महानिदेस ओर वघुदेवदण्डी मेँ पुरा एक वद्र का नाममी आयाहैजो
रायद् सोमनाथ पटरन हो । यही बात सुपीरक यानी वम्बई के पास सोपारा वंद्रगाह
के वारम मी कही जा सकती हे। आर्द्र की जातकमालामें तो इस वैदर में रत्नों
खाए जने का उख मी है | दिमाढ्य में हीरे का होना तो उस अनुश्रति का योतक
दे जिसके अनुसार मेर, हिमाख्य ओर समुद्र रलो के आकर मने गए हैँ । यह बात
शद उष्ुर-फेर-विरयित
ठीकदैङ्गि शिमग के पास कुछ हीरे म्ये पर हिमाय्यमे हीरेकीखान होनेका
पता नही चलता ] मातग से यहा किम भ्रेदा से तात्य है इसा मी दीक पता नहीं
चठता । श्री पिनो (१० २६ ) चाटुक्यरान मगठीर कै एक टेख के आधार पर
मातो का निवास स्यान गोलकुडा का प्रदेश स्थिर कते है । टरििण ( बृहत्कथाकोशच
७५।१-२ ) के अनुकार मातग पाड्य देदा तया उसके उत्तर मँ पवेत की प्रधि प्रर
रते थे | शायद यहा सेठपम जिले के चीरे प॑त म्रेणी से मतठ्व दहै, पर यद्या हीरे
का पता नहीं चटा रै । पौण्ड् देदा से माव्दह, कोसी के प्रू पर्निया जलिका कुछ भाग
तथा दीनाजपुर ओर राजदाी जिठे के ड माग का बोध होता रै] तया पौण्डूयधेन
से योरा जिखे के महास्थान से मतयव्र ६ । गायद कर्टिग के हीरे से कडपा, वेठारी,
करन, कृष्णा, गोदायपै इत्यादि के तया सभय्पुर के पास त्राह्मणी, सक, तथा दक्षिणी
* कोय नदिर्यो से मिख्ने बलि हीरे से रै । जागीर युग की णोखरा की हीरे की खान
मी इस वात वी पुष्टी करती ६ै । जागीर ने खय अपने राप्य के द्वे वै के विपरण
( तज, उप्रेजी अनुवाद, मा० १, २१६) मेँ इस वात का छे क्ियारैकि
बिहार के सूवेदार इव्राहीम खने खोखर को फतह करे वा के हीरे फी खान पर कन्जा
कर लिया | हीरे व्य की एक नदी से निकठते ये । इसमे सदेह नहीं कि कोसठ से
यहा दक्षिण कोसल से मतख्व है । जिस पहचान आघुनिक महाकोसच से दै । शायद
वैरागर ओर वेणातट या वेणु के हीरे कौसठ ही के अन्तीत भा जति । वेणा नदी
जो आज कठ की वेन गगा है चादा जिले से होकर वहती रै ओर उसी पर सित
वैरागढ़ भे हीरे मिते ह । मानसोछठास के वैरांगर ( स० वन्राकर ) की पहचान इसी
ैरागढ़ से ठीक उतर जाती दे { शायद यही सान चीनी यात्रर्योका कोर्स भौर टमी
का कौस रहा हो । अगस्तीय रत्नपरीक्षा मे आए मगघ से भी शायद छोटा नागपुर
की खाना का वोध होता ३ ।
रतश मेँ हीरे के अनेक रग वताद् गए ह । इनके अनुसार घुर का दीगर ल,
दिमाल्य का तपरैखा, मातग का पीठा, पुदट् का मूरा, कर्टिगका सुनहरा, कोसल का सिरीस
के श्ल के रगवाढा वेणा, का चन्द्र की तरह सफेद, तथा सुपारा का सफेद होता था ।
व्कुर फेर (२२) ने हीरे का रग तमे, सफेद नीका, मल्मेा, हरताक की तरह
पीटा, तया सिरीस के ्रक जैसा वतटाया है } ये रग खान-परक थे । हरे के वर्णो की
जोर मी ध्यान आट करिया गया हे । सफेद हीरा ताद्मण, खार त्रिय, पीठा चैडय
ओर काला यद पदनने का अधिका या । प्र राजा को चारो वर्णं के दरे पहनने का
अगिकार था 1 प्र वाद् के लेखकों ने सफेद, ऊय, पीले ओर करे हीरे को ही मदाः
ध ओर श्रू जाति मँ वाट दिया है । उक्वुर् फेरू (२६) मी ङ्स
श मे सफेद चोखा दी मा्वी अर्थात मालवे का कहरखाता था |
रलपरीक्चा का परिचय १७.
जिनके घरों मे निर्धष हीरे होते है उनकी विघ्, अकार मृष्यु ओर चत्रुभय से.रक्षा
होती दै । छठ ओर पीले हीरे पहनने से राजा को विजयश्री हाथ लगती थी । पुरुष
लपक्पते हीरे म भूत, प्रेत, वृक्ष; मंदिर, इन््रघलुष इष्यादि देख सक्ते थे (३०) ।
हीरे का आरभिक खूप. अव्पहला होता था ओर हीरे के इसी आकार को रत-
शाखो भे. सबसे अच्छा माना है} प्राचीन रनशछो के अनुसार अच्छे हीरे मेदः
या अष्ट कोण, बारह धाराएं, आठ दल, पार्थ याञंग कटे गर् है| हीरे की चोरी को
कोटि, तल को विभाजित करने वाकी रेखा को अग्र, चोरी की उठान क्रो उत्तेग, तथा
नुकीी विभाजक रेखाओं को तीक्ष्ण कहते थे । तौर मँ कम, खच्छ, शुद्ध ओर निर्मक
ओर भास्कर-ये हीरे के गुण माने गए हैँ । उर फेरू (२४) ने हीरे के आठ गुण कदे
है सम एकक, उच्च कोणी, तीक्षण धारा, पानी ८ वारितक ), अमल, उज्वल, अदोष
ओर टघुतोक । 4
रलशाखों मे हीरे के अनेक दोष मी उषिखित हैँ } जिनमे दटटी चोटी या पल, एक
जगह दो कोण, दक दीनता, बतख्ता, दख्दीनता, चपटापन, छेबोदरपन, मारीपन,
बुखघुकापना, ओर कातिहीनता मुख्य है । दक्छुर फेर (२५) ने नौ दोष यथा-
काकपद, विदुर ८ छींटा ) रेखा, मेापन, विकट, एक शगता, वलैकता, जोका आकार,
तथा दीन अथवा अधिक कोण बतलाया है । उसके अनुसार ८२१-३२ ) अयन्त
चोखी तीखी धारा पुत्रार्थी लियो के ठिए् हानिकर थी । पर इसके विपरीत चिपट,
मलिन ओर तिकोना हीर रमणियों को इसलिए सुखः कर होता था कि पुत्ररत की
जननी होनेसे वे अपने को प्रथम रत्न मानती थी, मला फिर उनका सदोष रत क्या
कर् सकता थां |
: हीरे का मूट्य प्राचीन रनशाखो मेँ तौर के आधार पर निश्चित किया जाता था।
इस सम्बन्ध.म दो मतथे एक बुद्धमदर ओर वराहमिहिर का ओर दूसरा अगस्िमत
की परी व्यवस्था मँ तैल तंडुढ ओर सषप ( १ तंहुक = ८ सषैप ) मँ थी तथा
मूर्यं रूपकों मे । हीरे की सबसे अधिक तैर वीस तंडक ओर दाम -दो . लाख रूपक,
निश्चित की गई थी । तोक.के इस कमम हर घटाव या चद़ाव द्यो इकाू्यो के बरावर
होता था। २० तंडुककेषीरेकादाम दो लख था ओर एक तंडुकके हीरे का एक
हजार 1 देखने म तो यह हिसाव सीधा साधा माट्म पडता है, पर श्री. फिनोने हिसाव्र
खगा कर वतखाया है करि २० तंडइरु यानी चार केरट के हीरे का दाम इस रीति सै वहत
अधिक वैठ जाता है|
अगस्तिमत के अनुसार तौस्य ओर स्थौल्य के आधार पर पिंडसे -दीरे का दाम
निशित किथा जाता था । पिंड का माप १ यव खौल्य ओर १ तैडुक तौल्य मान लिया
गया ह | इस तरद एक पिंडके हीरे कादाम ५०;दोका ५० गुणा 9; .चार्का.
३
१८ उ्ुर-फेर- विरचित
५० गुणा १२; पांच का ५० गुणा १६* * “इस तरह वदते वदते २० पिंड का
दाम ३८०० पटुच जाता है । पर इस मूल्याकन भे एक दी घनल के हीरे जतिर्है
उनकै हक्क हयेन पर उनका दाम वढ़ जातां था तया भागी होने पर घट जाता था।
इस तरह एक रीरा एक पिंड ऊ धनत्व का होते इए मी १।४ हल्के होने पर उसका
दाम भटारह गुना दता था, १।२ ह्के हनि पर छती गुना तथा ३।४ हके द्टोने
पुर् वह्वर गुणा द्यो जाता था । इसी तरह एक दीरा एक पिंड का घनत ह्येते इए मी
मापी द्ये तो उसा दाम १।४ मारी होने पर आधा टो जाएगा इत्यादि । श्री पिनो की
रय मे अगस्तिमत का ही मूल्याकन वास्तविकं मादम पडता हे |
ठकुर करून हीरे का मूल्याकन अल्ग न देकर मोती, मानिक ओर् पतने के साय
दिया दहै! प्ररे का मूलस्य नि्धीरण करते समय उसे अगस्िमत का ध्यान अवद्य
रा शोगा } उसके अनुसार (३३ ) सम्पिंड दरे का मारी होने पर कम दाम ओर
फार तथा हल्के होने पर उ्यादा दाम होता था ।
अलाउदीन कै समय जौदरिरयो की तौठ का वणन वकर फे ने इस तरह से
करिया दै-
ए ~ १ ससो (8
६ ससो - १ तेडुठ
। २त्डुठ ~ १जौ
१६ त॑डुक या ६ गुजा (स्ती) - १ मसा ,
ध्माता ~ १ टक 4
राक के उपर्युक्त तीक म कई वातं उछेखनीय ह । श्री नेत्सन राइट ८ दि कोयन्स
एड मेदागोजी णाप दि सुख्तान्त् आफ देदरी, प० ३९१ से) ने अपनी खोज से
य सिद्ध करने का प्रयलन किया है कि घुलतान युगक्रे टाक मेँ ९६ रत्तिया योती थी ।
रत्ती का वजन १०८ भ्रेन मान॒ कर उन्ोनि टाक की तौठ १७२ परेन नि्धीरित
कीरे पर ठ्छुर फेरू के दिघावसे तो २४ र्त्वी १ टाक, यानी १७२.८ मेन
के वराबर् हई यानी एक रत्ती का वजन करीव ६.३५ प्रेन के करीव इभा । अव यहा
प्रश्न उठता है कि गुजा से यहा साधारण युजा काही अर्थं दै अथा यद कोई तौल
थी जिसका वजन आधुनिकः स्तीते करीव करीव पाचयुना अधिक था |
उकुर फे ( १११) ने खयं इस वात को खीकार किया है कि तका मूल्य
चघा इभा न होकर अपनी नजर पर् अयल्वरित छता ह, फिर भी अलाउदीन के समय
र्नो केजो दाम ये उनकी तौठ क साय उसने वैन क्या दै ओर यह भी बताया
ह फी चार् एन यानी दीगर, मोती, मानिक जीर पने का दाम सोनिके स्के खगाया
रलपरीक्षा का परिचय १९
जाता था) इन रलो की बड़ी से बडी तौर एक टंक ओर छोटी तौल एक गुंजा मान
सी गई है । पर एक टंक म १० से १०० तक चदनेवाठे मोती तथा एक गुंजा मेँ १
से १२ थान तक चदृनेवाछे दीरे का मूल्य चांदी के दाक म ह्येता था। उपरक्त रनों
के तक ओर मूल्य दो यत्रो म समन्नाए गए ई -
कीमती रतन सम्बन्धी य॑त्र ~
ना [११२ [२४ [६० [८ > = १२ १ [० [१ र
हीरा [५ [१२|२०[३०[५०[७५|११०|१९०|२४०|३२०|४००|६००|१४००|२८००|५६००|११२००
171 11 | 11111111 1
मोती |०॥|१ [२ |४ |८ |१५।२५ |४० |६० |८४ |११४|१६०|३९० १२००२०००
मानिकं। |५ |८ ।१२।१८|२६|४० |९६० |८५ |१२०|१९०|२२०|४२० |८०० |१४००|२४००
पन्ना |०।|०॥|१ |१॥|२ |२ [४ | | |८ (१० १३ [१८ २७ ४० ९० ०।|०१|१ १॥२ |३ [४ ५ |६ ८ १० १३ (१८ (२७ [४० [६०
उपयुक्त यत्र की जांच से करई वातो का पता क्गता है । सनसे परी बात तो
यह है किं अल्ाउदीन के काठ मे ओर युगो की तरह हीरे की कीमत सब रत्नो से
अधिक थी । दीरा जेसे जेसे तौर मे बढता जाता था उसी अनुपात में सकी कीमत
बदृती जाती थी । बारह रत्ती तक तो उसका दाम ऋमश्चः बढता था पर उसके बाद
हर तीन रत्ती के वजन पर उसका दाम दुगना हो जाता था । अगर चांदी ओर सोने
का अनुपात १०: १ मानचियाजायतो एक र्टाक के हीरे का मूल्य १,२००००
चादी के टंक कै बरावर ्टोता था। इसके विपरीत एक टंक के मोती का मूल्य
२००० ओर मानिक का २४०० सुव्णैयेकाथा | पनेकादाम तो बहत ही कम
यानी एक टंक के पनेकादाम ६० सुवणं टका था।
छोटे मोती ओर दीय के तोर ओर दाम का यत्र
५9० ©
111 २०।२५३ ०|४० ५०,६ ०-७०|७०-१००| --| -
रुप्यथक्र॒ = [५०|४०|३०|२०।१५।१२]१०|८ | द मी
वज्रयुजा १२३ | ४।५ | ६/७ |८ |९ १० ११ १२
रुप्य टक [३५।२६।२०।१६।१३।१०|८ [७ |६ ५ |४ ३
उपयुक्त यंत्र से यह् पता चर्ता है कि मोती ओर् दरे जितने अधिक एक टाक मे
चदते ये उतना ही उनका दाम् कम द्योता जाता था ओर इसीकिए् उनका दाम सोने
के टकोमेन ल्गाया जाकर चांदी कै को मे लगाया जाता था।
रत्र शाखो के अनुसार नकडी हीरा खोह, पुखराज, गोमेद्, स्फटिक, वैद्यं ओर शीशे
से वनता था! ठ्कुर फेर ( २७) ने भी इन्दीं वस्तुओं को नकटी हीरा बनाने कै काम
मे र्नेका उदेव किया है । नकडी हीरे की पहचान अम्क तथा दूसरे पत्थयों के काटने
की शक्ति से होती थी! उक्र केरू (४८ ) के अनुसार नकी हीरा वजन मे भारी,
जल्दी विंधनेवाख, पतटी धार वाला तथा सरल्ताघ्रचैक धिस जनेवादय होता था |
कः
४ उक्कुर-फेरू-बिरचित
मोती - महारो मे मोती का नम्बर दूसरा है 1 मारती्यो को शायद इस रतरका
वैत प्राचीनसाल से परता था । मोनी को जिसे वैदिक साहिलं मे कृशेन कठा गयो हैः
पव्रसे पत्म उेख %गरेद (*९।२५।४,१०।६८।१.) मे आता है । अय्ववेद मे वाधः
आकारा, विजठी, प्रकाश तया सुवण, शख ओर मोती से रक्षा की प्रार्थना की
गई हे । शख ओर मोती राक्षसो, राक्षसियों ओर वीमारियो से रक्षा करने वाटे माने जाति
ये } उनकी उत्पत्ति आकारा, समुद्र, सोना तया वृत्र से मानी गई है ।
रलगाल के अटुप्ार मेतीके आढ स्रोत - यथा सीप, रख, वाद, मकर ओर सर
कासिर, सृअर की दाढ, हाथी का कुभस्थठ तथा वापस की पोर माने गए है| यह
निशधाप्त मी धा कि खाती की वृदं सीपियो मे पडकर मोती हो जातीं थीं । सहुरदल के
दातो से भी मोती वनने का उदेव अता दै ।
मोती के उत्पत्ति सम्वन्धी उपृधुक्त निग्चासो की जाच पृडताक से पता चलता हं
वि अयर्ववेद वाटी अनुश्रति से उनका खासा सम्बन्ध दै । उसके इत्रत भानने से
अघर वाटी भनुश्रुति की ओर् ध्यान जाता दै । इस तरह हम देख सप्ते ह कि
मोती सम्बन्वी प्राचीन विश्वासो की जड वैदिक युग तक पटच जाती है । ।
, व्छुर फेड ने भी मोती के उत्पत्तिस्थान, रत्नशाल्नो की ही तरह वदे ई । उस्र
अुपार शखजन्य मोती छेटे, सफेद तथा खड होते ह ओर उनम मगर का आयास
होता है । मच्छ से उत्पनन मोती काल[, गोरु तथा हरका ्टोता है ओर उसके पहनने से
शत्रु ओर भूत प्ररतो से रक्षा होती दै । वास मे पैदा मोती गुजे के इतने वदे तथा राज
देनेमलि होते टै 1 सूअर की दाद से पैदा मोती गोठ चिकना ओर सालु के फल इतना
वड़ा टोता दै । उसको पहननेवाका अजेय ह्ये जाता है । साप से निकटढा मोती नीठा
तया इलायची इतना वड़ा होता है । उपक्रे पहनने से सर्पोपद्रव, विप, तथा बिजली से
रक्षा होती है 1 वादठ में पैदा मोती तो देयता पृध्वी पर आनि ही नही देते, गिरने के
पिले दी उरन्द रोक स्ति ह। चिन्तामणि मोती वह है जो वस्सते पाणी की एक वृद
हना से सख कर मोती हो जाय । सीप के मोती छोटे ओर मूल्यवान ते दै।
रनचालो म मोती के आके की सत्या भिन भिन दी इई है । एक अनुश्रति के
अनुत्ार आठ आकर ई तो दृस्तरी के अनुसार चार । अर्थान (२।११।२९) के
अदुर् ताम्रपर्णीं से निककनेगले मोती ताप्रपणिकः) पाड्यकयाट से पाल्यकवाटकः, पासा
से पारक्य, कूठ से कौलेय, चूर्णं से रोण, महेन से महन, कारदेम से कार्मिक,
स्रोतसि से प्रीतसीय, हद से हीय ओर दिमयत् से हैमयतीय ।
उपयुक्त तालिका मे ताम्रपणिक जर् पाव्यकपाटक तो निय मनार की खाद के
मोती येः चोतक है ताम्परण से यहा ताम्रपणीं नदौ का ताप माना गया है] पाडवगाट
मयुर रै जया मोती का व्यापार सू चरता था] पाश से जायद फारम का मतडब
रश्तपरीश्चा का परिचय २९
है । चूर्ण को. टीकाकार् ने केरल मेँ सुचिरिके पास एक गांव माना है । यह गाव शायद
तामिरु साह्य का मुचिरि ओर पेरिष्ठस ( शाफ़, वहि, प° २०५) का मुजिरिस्र था
जिसकी पहचान क्रैगनोर भ मुपिरिको$ से की जाती है! मुजिरिस ईसा की आररभिक
सदियों मे एक बड़ा बदर था ओर बहुत संभव है कि यहां मोती आने से किसी नदी कै
नाम के आधार प्र मोती का चैर्णेय नाम पड़ गया हयो । टीका के अनुसार कौलेय मोती
का नाम सिंहल की किसी कू नदी के नाम पर पड़ा, पर विचार करने से यह
बात ठीक नहीं माद्धूम पड़ती । कू से पेरिप्ठस (५९. ) के कोल्वि तथा शिरप्पदिकारम्
(प्रु २०२) कै कौरकैसेबोधष्योतादहैजो मोतियोके लिए प्रसिद्ध था पेरिष्छस
के समय मै वह पाड्य देरा का एक् प्रसिद्ध वेदरगाह था। पर ताम्रटि्ती नदी द्वारा
वद्र के भर जाने पर बद्रगाह वहां से पांच मील दूर हटकर् कायक मे पटच गया ।
महिन्दक, कादेमक, हादीय ओर स्नौतसीय का ठीक पता नहीं चरता | टीकाकार के
अनुसार कार्दम ईरान ओर स्रोतसी वभैर देश मे नदियां ओर हद ब्र देश मे दह था
इन स्कैतो मे जोभी तथ्य ह्यो प्र यहां दीकाकार का पारस की खाडी ओर बैर देश
से मोती आने की ओर् संकेत अवदय है । |
हिमालय तो सबरलनोका घर मानाद्ी जाता था। वराह मिहिर ८१।२ के
अनुसार सिंहल, पररोक; घुराष्् , ताम्रपर्णी, पाधवास, कौकेरवाट, पांड्यवाट ओर् हिमाख्य
म मोती होते थे ।
सिहङ ~ मनार की खाडी मोती के लिए प्रसिद्ध है । यह खाडी ६५ से १५० मील
चोडी हिन्द महासागर की एक बाह है मोती के सीप सिंह के उत्तर पश्चिमीतट
से सट कर तथा तूतीकोरिन के आसपास मिर्ते हैँ । मोतियोँ के इस स्रोत का ऽदेव
ष्िनी ( ९।५४-८ ), पेरिषएस ८ ३५,३६,५६,५९ ), मार्कोपोको (८ दि बुक आफ सेर
मार्कोफोखो, भा०२, प्र०२६७, २६८ ) फ्रायर जईनस ( मीरावििया डिस॒क्रिष्टा,
हक्ट्येत सोपाइटी, १८६२, १०६२ ) लिनशोटेन ८ दि वोयज अफ लिनिशोटेन,
हक्छ्येत सोसादटी, १८८४; मा०२ १०१३३-१३५ ) इत्यादि कते हैँ ।
प्ररीक -इसी को शायद ठकुर् फैरू ने रामावल्ेक कहा है । इस प्रदेशा का टीक
ठीक पता नदीं चक्ता पर यह ध्यान देने योग्य वात है कि मध्यकाट मेँ अर भोगो
किक पेमू को ब्रह्मदेश कहते थे । वरमा के समुद्रतट से कुछ दूर मेगुई दीप समूह के
समुद्र मँ अन मी मोती मिल्तेहैँ। रामासेपेगू की पहचान की जा सकती है। यहां
सरग लोग मोती निकालते हैँ । घुराष्ट् कछ के रनक दखिन मे, नवानगर के समुद्र तट
के अगे जोधावंदर के पास्त, सगरा से कछ की खाडी म पिंडरा तक, आजद, चोक,
कर्टुवार ओर नीरा के द्वीपो के आसपास मी मोती भिर्ते है ( सी° एफ० कुंज ओर
सी° एच ० स्खविन्पन, दि बुक अफ पर, प्र०. १३२, ठंडन १९०८ ) !
२ उछ्कर-फेरू-चिरचित
ताम्रपर्णी - जैसा हम ऊपर कह आए है यया ताम्रपर्णी से मनार् की खाडी से मतखव
है । ताम्रपर्णी नदी के मुहाने पर परह कोरके वैदरगाह पर, वाद मेँ उसके भरजाने से
उसके दकिन पाच मीठ पर्, कायक यदरगाह हो गया ।
पांल्यवाट - इससे शायद मथुरे का मत्व है जहा मोती,का सुत व्यापार
चलता या । शिलप्पदिकारम् ( १०२०७) के अनुसार वहा के जौहरी वाजार मेँ चन्दा-
शुर, अगार्क ओर अणिरुत्तु किस्म के मोती विकते ये ।
कौबिरवाट ~ इसका ठीक पता तो नहीं चठ्ता पर सभव ह कि यहां वीर्यौ की सुप्रसिद्ध
राजधानी कवेरीपद्धीनम् अथवा पुर से मत्व हो । छिर्प्पदिकारम. (१० ११०-१११)
कै अनुसार यहा मोतीसाजं रहते थे ओर वे ठेव मोती विकते ये |
पारद्यववासर - इससे फारस की खाड़ी से मतव्व ई] यहा मोती वहुत प्राचीन काल
से मिते है । इसका उदेव, मेगास्थनीज, चेरंस के इसिडोर, नियर्गस, तथा सल्मी मे
क्षिया है । टास्मी के अनुसार मोती के सीप टाइोप द्वीपे ( भधुनिफ़ बहरैन ) मिठ्ते
थे । पेरिस (३५) के अनुसार कठैई ८ मरत कै उत्तर पश्चिम दैमानियत द्वीप समूह्
भ कद्दातो ) मे मोती कै सीप मिलते ये ! नवीं सदी मे मादी ने उस्षका वर्णन किया है
पारी रेनो, भेमायर घुर ठँ द” १८५९ । इ्नवतूता ८ गिन्स, इव्नववूता ) ने इसका
उदेल किया दे 1 वर्थिमा ने ( दि टूषिदस आफ लोदीविको वार्थिमा, पृ ९५, ठ्डन,
१८६३ ) इन की यत्रा म पारस की खादी के मेतिर्यो का वर्णेन क्या है ।
लिन्शोटन ओर ताव्भिये ने मी हरुज, वसया ओर वहैरैन के मोती के व्यापार का
आख देखा वणन दिया है 1
अगस्तिमत ( १०९-१११) ओर मानसोघ्ठास ८ १, ४३४) के अनुार
सिंह, आद्वाटी, वतर ओर पारसीक से मोती अति ये ] सिहर ओर फारस कातो
हम वर्णन कर् चुके है। खादी से यहा अरर के दकिन तट ओर
वरैर से खाठ सागर से मिक्नेवल मोती के सीप से तात्पयै माद्धम पडता है । अर मं
अदन से म्केत तक के वद्यो म मोती के गोताखोर मिक्ते जो अपना व्यापार
सोकोता के द्वौ, पमी अफीका ओर जजीवार तक चरति ह । छठ सागर मँ अकावा
की खादी से वावेक मदेव तक् मोती के सीप परिकते हे ८ कुज, वही, प° १४२ ) ।
ठक्रुर पेरू के अनुसार ( ४९.) मोती रामायटोद, घव्वर, सिंह कातार, पारस,
कैसिय ओर समुटतट से आते ये ! उपरक्त तलि कुछ यञ्च मे रुन गरो की तालिकाओं
से भित्र है| रामावलोई से जैसा दम प्ले कह आए है, शायद मेरु के द्रप समूह
से यवा मरू से मतय हो 1 वन्वर से टाठ सागर के अग्रौकी तट से मतद्दे है । यहा
चैर सेनो से तात्पर्य नीर नदी ओर लाल सागर के वीच रहनेगाठे दनाकरिठ तथा सोमा
ओर गह से है । कान्तार से यहा रेणिसतान मे अभिप्राय ई ! महानिरिस (खा प्रता द्वारा
रलपरीश्चा का परिचय २३
संपादित, परण १५४-५५ ) मे मर् कन्तार् किसी प्रदेश का नाम है जो शायद बेरेनिके
से सिकंदरिया तक के माग का चोतक था। यह भी संभव है कि ठक्कर फे का मत्व
यहां कांतार से अरब के दकिन पूर्वी समुद्र तट सेहो जहां के मोतिर्यो के वारेभें
हम ऊपर कह आए हैँ । अगर हमारा अनुमान ठीक है तो यहां कतार से अगस्िमत के
आवाी ओर -मानसोष्टास्र के आवाट से मतलब है । केसिय से यहां निश्चय इन्नबत्ता
( गिन्स, इव्नवतूता, प° १२१; प° ३५२ ) के बदर कैस से मतल्व है जिसे उसने
मूढ से सीराफ के साथमे मिला दिया है । ( वास्तव मे यह बदर सीराफ़ से ७० मीष्ठ
दकिन भ है ) | सीराफ ८ आनुधिक तहीरी के पास ) पतन कै बाद, १३ वीं सदीमें
उनका सारा व्यापार कैस चरा आया । करीब १३०० कै केस का व्यापार हुरसुज
उठ आया । कैस के गोताखोरों द्वारा मोती निकालने का आंखो देखा वर्णन इन्नवतूता
नेकियाहै। जैसे, बाद मे घल कर ओर आज तक बसरा के मोती प्रसिद्ध है उसी
तरह शायद चौदहवीं खदी मेँ कैस के मोती प्रसिद्ध ये।
इन्नबत्ता के शब्दौ म - हम खुंुवाङ से केस राहर को गए । जिसे सीराफ भी कहते
है । सीराफके रोग भठेधरके ओर ईरानी नस्छकै है । उसमे एक अरब कबीटा
मोतियों के लिए गोताखोरी का काम करता था । मोती के सीप सीराफ् ओर बहरेन के
बीच नदी की तरह शांत समुद्र मे होते हैँ । अप्रेल ओर मई के महीनों म यहां फास,
बहरेन ओर कतीफ के व्यापारियों ओर गोताखोरो से र्दी नवे आती है ॥ |
बुद्धभट ने केव सफेद मोतियौ का वर्णन किया है । अगस्तिमत के अनुसार मोती
मह्वभङई ८ मधुर ) पीठे ओर सफेद होते है । मानसोषास मे नीले मोती का भी उदेव
है; तथा रनंग्रह मे लाल मोतीका } वक्र फेरूने भी प्रायः मोती के इन्दी रगो
का वर्णन किया है।
रनशाल्रो के अनुसार गोल, सफेद, निर्मल, खच्छ, स्निग्ध, ओर मायी मोती अच्छे
होते है । शच्छे मोतीं के बारे मेँ ठकुर् फेरू (५१) का मी यही मत है।
रलनराल्ञो के अनुसार मोती के आकार दोष-अधेख्प, तिकोनापन, करापार््ं जर
त्रिदृत्त ( तीनगांठ ); बनावट कै दोष-श्युक्तिपाश्चं ( सीप से गाव ) मल्सयाक्ष ( मछढी
के आंख का दाग ), िस्फोटप्रणे ( चिटक ), बदुआहट ( प॑कपरणै शकैर ), रूखापनः; तथा
रंग के दोष ~-पीलापन, गदङापन, कास्यवर्ण, ताम्राभ ओर जठर माने गए है | मोती के
प्रायः यही दोष ठक्रुर फेरूने भी गिनाएहैं।. इन दोषों से मोती का मूल्य की
घट जाता था |
हम दहीरेके प्रकरणम देख आए है कि वकर फेर ने मोतियो के तौ ओर दाम
काक्या हिसाब रखा था | प्राचीन रनशाखो मे इस सम्बन्ध मेँ दो मत मिकते है-एक
तो बुद्धभह ओर वराहमिषिर का. ओर दूसरा अगसि का । पहले सिद्धान्त म गुंजा
२४ उक्र-फेरू- विरचित
अथवा कृष्णठ की तौढ दै | माप पाच गुरजो के वरात्रर होता था ओर ' शाण "चार् प्राप
कै ] दाम रूपरू अथया .कार्पापण मेँ टगाया, गया ३ । सवसे व्डी तौठ णक याण
मरान ;छी गई, है ओर कीमत ५३०० रूप । तोक मे हर एक माप वढने पर् दाम
दुयना दयो जाता या | दूसरे सिद्धान्त मं तौल युजा, मजटी जर कलन में निर्धीरिति
हे । एकं कठ्ज चारी गुर्जो के थमा चौती मजी के वरायर माना गया दै | युजा
की तो करीग आधा केरेट तथा कठज करीव सादे वाईस केरेट के है । मोती की भारी
से मारी तीक दो कठज मानकर् उनकी कीमत ११७११७६३ (%) मानी गई, दै । तौठ पर
दाम् किसर आधार पर चटता था, इसका पिवरण ठीक तरह से समञ्च मेँ नदीं अता ।
सय रनद्यासरो के अनुसार सिंह मे नकी मोती पारे.के मेक से बनते थे |
नकली मोती जाचने के छिए् मोती, पानी तेढ खीर नमक के धौ मे एक' रात रख
दिया जाता था । दूसरे दिन उसे एक सफेद कपडे मेँ धान की भूसी के साय रगडते
ये । एसा करने से नकली मोती का रग उतर जाता था पर असी मोती ओैर मी
चमरकने ठगतान्था । ।
मानिफ- अचश्ुति के अनुस्तार पद्मराग की उत्पत्ति ` अयुखल के रक्त से इई ।
मानिक फे नामों मे पदूमराग, सोगविक, कुरविद, माणिक्य, नीखगधि ओर माप्तखड
मुख्य € बद्धम के कुरूपिदज, घुगधिकोत्य, स्फटिक प्रसूत , तया वराहमिहिर के
रुविंदमव, सौगधिभव तया स्फटिक का शाव्दिक भरं जसे,गधक से उत्पन्न, ईगुर से
उत्पन्न, स्फटिक से उरपन्न लिया जाय अयना नहीं इसमें सदेह है । यह नहीं कहा जा
सकता कि रनपरीश्चाकार को जिप्तसे दोनो शास्रकारों ने मसाव्ग लिया है गधक, ईगुर
ओर स्फटिक से मानिक्र की उत्पत्ति के किसी रासायनिक गरक्रिया का ज्ञान या अथगा नहीं ।
भ्राय सव शाो के अनुसार सत्रसे अच्छा निक छ्का मे रापणगगा नदी कै
किनारे मिठता था । कुछ हल्के दर्ज के मानिक कञ्पुर, अघ्र तथा तुबर मे मिकतेये
(बुद्धभदट, ११४ वराहमिहिर ८२।१, मानसोछास, १।४७३-७४) व्र फेर
(५५ ) के अनुसार मानिक सिंह मेँ रामागगा नदी के तट पर; कल्शपुर ओर
तुबर देश मेँ मिलते ये । ॥ , नि ।
रावणर्गेगा - ठर फेर की रांमागमा शायद रावणगगा हीं हे | यहा हम पावो
का ध्यान इन्नवतूता की सिंह याना की ओर दिटाना चादते हँ । अपनी -यात्रा मेँ वह'
कुनकार , पचा जहा मानिक ॒मिरते ये, ( गिन्त, इव्नववता, १० २५६५७ ) वहु
नगर एक नदी पर धित था जो दो पाड के वीच बहती थी । इन्नववूता के अनु-
साट् ( मौवी मुदम्मदहसेन, गेख इव्नवतूता का सफरनामा । ¶० ३३८३९ ठहोर
१८९८ ) इस शर मे नाण क्रिस्म के यात्निक मिख्ते ये । उनम से कुछ तो नदी से
निरते थे ओर कुछ जमीन खोदकर । इन्नववता के वर्भन से यह मी पता चरता दै
रलपरीक्षा का पर्चिय (-५ ।
कि याकूत शब्द का व्यवहार माणिक ओर नील्म तथा दूसरे रंगीन रत्नो कै, लिए मी
होता था । सौ फनम से ऊची मालियत कै पत्थर राजा खयं रख छेता-था । मा्कोपोलो
८ यूल, दि लुक आफ सर मा्कोपोको, २, १५४ ) ने भी सिंह के मानिक ओर दूसरे
कीमती पत्यसे का उख किया है । तावर्िये ( टरावेल्स, भा० २, प° १०१-१०२)
के अनुसार भी मध्यधिहल के पहाडी इरकेकी एक नदी से मानिक ओर दूसरे रन
मिलते ये । बरसात मे यह नदी बहत बढ जाती थी । पानी कमदहो जने परलोग
इसमे मानिक इव्यादि की खोज करते थे ।
उपयुक्त उद्धरणो से राबणगंगा अथवा रामागगा की वास्तविकता सिद्ध हो जाती है।
सर ए० ठेनैट कै अनुसार इव्नवतूता का ुनकार या कनकार गंपोा था जिसका दूसरा
नाम गगाश्रीपुर या गंगेडी था। पर गिन्स के अनुसार छुनकार की पदचान करर्नगे
( कुरूनगर ) से कीजा सकती है जो इन्नवत्ता क समय सिंह के राजाओं की
राजधानी थी | ( गिन्स, इव्नवतूता, पर० ३६५ नोट ६ )
क (का) पुर - कलशपुर ~ प्राचीन रलनशासरो मे मानिक का एक, प्रा्िखान कठपुर
दिया है । यह पाठ ठीक है अथवा नहीं यह तो कहना संभव नही, पर खोटे मानिक
का वणैन करते इए बुद्धमट़ ( १२९- १२१ ) ने कल्डपुर का उष्छेख किया है । अगर
कलपुर ( मानसोष्ठास-काकपुर ) पाठ टीक है तो शायद उसका मिलान तामिल काव्य
पषटिनप्पाठे के काट्गम् से किया जा सकता हैँ जिसे श्री नीख्क॑ठशास्ली कडारम् अथवा
आधुनिक केदा मानते हैँ ( नीलक॑ठशाखी, दिष्टी आफ श्रीविजय, प° २६, मद्रास
१९४६ ) पर केदा मेँ मानिक कैसे पहुचे यह प्रश्न विचारणीय रहै । संभवदहै कि
स्याम ओर वमी के मानिक यहां बिकने के लिए पहुचते हो ओर बाजार के नामसेदी
उत्पत्तिस्थल का नाम पड गयाद्ये | कक्रापुर् की पहचान चछ्गोर के इस्थमस पर
सित कर्मरंण सेश्रीख्ेवी ने की है ( वही, प ८१) । अगर यह पहचान ठीक है तो
कलशपुर् मेँ शायद भानिक का व्यापार ह्येता रहा होगा ।
अंध ~ आंध्देडा मँ मानिक मिलने का ओर दूसरा उद्व नदीं मिलता ।
तुबर - मार्कंडेय पुराण ( पार्जिटर का अनुवाद, प° ३४२ ) के तुबर, जेसा श्री
पार्जिटर् का अनुमान है, शायद विध्यपाद पर रहनेवाठी एक जंगङी जाति के कोग थे
पर तुर देदा की सिति का टीक् पता नीं चरुता । विध्य मेँ मानिक मिखने का भी
पता नहीं दै)
राखो म मानिक के वहत से रंग कहे गण् है जिनमे चटकीला ( पश्चाग )
पीतरक्त ( कुरूविंद् ) ओर नीरर्कत ८ सोगंधिक ) मुख्य है । प्राचीन र्नराल्ञौ के अनुसार
सव तरह के मानिक एक दी खान मेँ मिलते ये । बुद्धभट् के अनुसार सिंहल की नदी
ष्ट
२८ रक्कुर-फेरू-निरचित
हेम ऊपर देव आए ह कि इन्नवत्ता सिंहल के नीटम ओर उसके प्राततिस्यान का
भिस तर आदौ देखा हाक वणन करता ३ । चशोटेन (मा० २, ¶० १४०) के
भुसार पेगू का नीलम भी अच्छा होता था, जो शायद मोग की मानिक की खान
से निकलता था । ( तायर्नियेर, २, प° १०१, १०२ )। कल्पुर ओर करटिग के नीख्म
से श्चायद् वर्मा जर खाम के नीम से मतठ्र दहो जो कर्टिग ओर केदा के वाज मे
जाकर धिक्ते ये |
रलो मे नीलमके दसं या ग्पारह रग कटे गर् ह| शरेतनीचाम नीलम
ब्राह्मण, रक्तनीाम क्षत्रिय, पीतनीलाम वैद्य, तया धननीड शूद्र मान! गया है । ठ्करुर
केर के सुपार नीठम के नौ सा हेते ये यया-नीठ, मेव, मोरकटी, भलसीका
पठ, गित्कभका रक, भरपरपखी, कृष्ण, स्यामल जर् कोकितप्रीवाम ।
स्ना के अवुप्ार नीकम के पाचगुण है, यया ~ गुरतता, सिनग्धता, ाबव्यताः
पार्थस्जनता ओर तृणप्रादित्व । ठ्छरुर फेर के अनुसार ये गुण ॒रहै-युरता, छएरंगता,
सुश्वक्णता, कोमल्ता ओर् पुरजनता ।
रशा के अनुसार नीलम के छ दोप है यथा-अभ्रक ( धूमिठ ) कर्कैर या
सागर (रेता ) , त्रास ( द्रा ), भिन्न ( चटका), मृदा या मृत्तिका गर्भे ( मीत्
मिद्री होमा) ओर पापण ( दीर म पत्यर होना) ठक्ुर फेर (८३ ) के अनुसार
नीठ्मकेनौ दोषदः यया- अभ्रक, मदि (मदा), सर्करगभ, सत्रास, जठर,
पयरीला, समल) सागार (मिद्रीमर) ओर विषण ।
नीठम कां दाम मानिक की तरह च्गाया जाता था | टकर फे के समयमें
नीलम् के दाम के वारे मं हम ऊपर् कह आए है ।
पनना-( मरकत, तक्ष्य ) की उत्पत्ति थघुर व के उस पित्त से मानी गई दै जिसे
गरुड ने पृथ्वी पर गिराया । प्राचीन रत्नशा्ख मे पने की खानों का वर्णन अस्पष्ट
है 1 बुद्धमट ( १५० ) के अनुसार जव गरुड़ ने अघर बल का पित्त गिराया तो वह
व्ेएख्य छोड़कर, रेगिस्तान के समीप, समुद्र के किनारे के पा एक पवत पर गिरकर
एकत चना गया । यह मी कहा गया हे ( १४९ ) की वहा तुरुष्फ के गृक्ष होते ये ।
अगतिमत ( २८७ ) के अनुसार बह सुप्रसिद्ध पर्वत समुद्र के किनारे के पास
वको के देम स्थित था । अगखीय रनपरीकषा ( ७५) के जचुतार पने की दो
खाने थीं एक तरुष्क देश मे जौर दूसरी मगध म । उड्र कड ने (७३) मरकत के
उपपत्ति स्थान अवलिद, मट्याचल, बभर देश्च ओर उदधितीर माने है ।
एकत के उपर्युक्त आकर की जाच पड़ताठ से एक वात स्पट हो जाती है कि
भराय पम शाखकार पत्रे की खान वर्मर दे के रेगिस्तान मे, समुद्र तीर कै निकट, मानते
ह! यालमी यग से केकर मव्यका तकं प्रय॒ सव विपरण मित मे विगेष॒ कर कल
रलपरीक्चा का परिचय २९
सागर के पास सित जर्बर पर्वत की पने की खान का उदेव करते है । इस खान
का उदेव ष्ठिनी, कासमास ईंडिको प्टायस्टस ८ करीब ५४५ ई० ) मासुदी ओर नवीं
सदी के दूसरे अरब यात्री करते हैँ । अक ईदिसी के अनुसार मध्य नीर पर -अखान
से छु दूर एक परैत के पाद पर पने की खान है । यह खान शहर से वहत दूर
एक रेगिस्तान मेँ है । इस पने की खान की, दुनिया की ओर कोई दृस्ती खान सुका-
नखा नहीं कर सकती । अपने फायदे ओर नियात कै छि यहां काफी आदमी काम
करते हैँ ८ पी०ए०जोवर, अर शद्रिसी, १, १०३६ ), यहां यह मी उष्छेलनीय बात है
कि अखान से एक सहने की राह पर मरकता नामक एक दहर था जहां हव्छाके
डाङ सागरबाले किनारे पर् खित जलेग के व्यापारी रहते ये । यह संभव हो सकता है
वि संस्कृत मरकत का नाम शायद इसी रार से पडा हो पर संस्कृतं मरकत की
युप्पत्ति यूनानी स्मरण्दो्त से की जाती है । ग्रह यूनानी र्द असीरी बक; हित
बारिकेत या बरकत, रापी बोकौ का खूपांतर है । अरबी जुम्युरुद शायद यूनानी से
निकरा हो ( लाउफर, सानो इरानिका, १० ५१९ ) चिथशोटेन ( २, ५, १४०)
के अनुसार भी भारत मे बहत कम पन्ने मिक्ते थे | यहां पने की काफी मांग थी
ओर वे मिस्न के काहि से अति ये।
अवरिंद- इस देश का नाम ओर कहीं नहीं मिक्ता । पर यहां हम पेरिष्ठस
(७ ) के अवलितेसत की ओर ध्यान दिखाना चाहते हैँ जिसकी पहचान बाबेल म॑देव के
जल विभाजक से ७९ मीर दूर जेलासे की जातीरहै । खाडी के उत्तर मे अबलिति
गांव मेँ प्राचीन अवलितेप का रूप बच गया है ! बत समव है किं अविद मी इसी
अवल्तिस-अवछ्ित का रूप हो । यहां पना तो नदीं मिल्ता पर संमव है किजैगके
व्यापारी मिन्नी पना इसत देश मै लते रहे हो ओर उसी के आधार पर अवर्टिद्-अवलित
पने का एक स्रोत मान ल्या गया हो|
मरयाचङ - यह दक्षिण मारत का मल्याचर तो हो नदीं सक्रता । शायद ठक्कर
फेर का उदेदय यहां गेवे जवैरसे दो जहां बुद्धमह के अनुसार तुरुष्क यानी
रुगु होता था | वैर ओर उदधि तीर का संकेत मी छार सागर की ओर
इरारा करता है |
मगध -अगस्तीय रलनपरीक्षामे, मगध मे मीपनने की खान मानी गई है।
मच्ेट (रेकाडस् आफ दि जियालोजिकल सरवै ्ओंफ इंडिया, मा० ७ प्र ४३२) के
अनुसार विहार के हजारीबाग न्विमे पने की एक खान थी ।
रलश्ख मे पनेकी चार से आठ छया मानी गई है । अगस्िमत के अनुसार
महामरकत मे अपने पास की वस्तुओं को रंगीन कर देने की शक्ति होती धी | मरकत
३० उद्र केङू-विरदित
सदन ओर ,ामठिक रग फे होते ये । सदन का रग सेगरार जसा ओर दूसरेका
शुकपख, दिर पुष्प भौर वतीया जैसा होता था ।
रत्या मे फे के पाच गुण यया -खब्छ, गुर, सुरणं क्िग्ध ओर् अरजस्क
( धूलिरहित ) द । व्क्छुर फेर के अनुसार (७६ )' अच्छी छाया, घुठक्षणता, अनेक-
रूपता, धुता ओर वर्णीव्यता पन्ने के पाच गुण है । ॥
रत्रा कै अनुपार् इवठता, जढ्एता ( कातिदीनता) ' मलिनता, रूपता,
सपापाणता, करता ओर विस्फोट पन्ने के दोप ह । ये दी दोप वक्छुद् फेर ने गिनार
ह । केम शाखा की जगह सरजनस्कता आ गई है 1
घुद्धम्र के अनुसार मकनी पन्ना शीश्चा, पुत्रिका जर म्ातक से वनता था |
दृसरे नाने मे मजीट, नीक ओर ई शुर भी उपयोग मँ ए जति धे ।
उपरत ।
रतशार्खो म उपरो का वडी सरसी तीर पर उदेव इ है । पाच महा-
रतौ के विपरीत व्क्छुर फे ने विद्म, मृगा, छ्हसनिया, वैद्य, सफटिफ, पुल्राज,
कर्कैतन ओर भीप का उ्टेब कियादहै।
विहुम-अर्थसाल् ( सप्रिजी अनुवाद प° ७६) के अनुसार मृगा आल्कद
जीर विनणै से आताथा । यहा आल्फद से मिनन के सिदरिया के यदरगाह से
मत्यि 1 टीका के अतुप्तार विपर्णं यनन द्वीपके पापस्त कासपुद्र दै । अगर यह
ठीके तो यदा विमरणसे मूप्य सागर से तार्थ दोना चाहिए । बुद्धमद
(४९२५२ ) के भनुप्ार मृणा शकैवल, सम्डासक, देवक ओर रामक से थते
ये । यहा रामफ़ से श्चायद् रोम का मतल हो सकता हे । अगस्तिमत के एक क्षेपक
(१०) मे कहा गया कि हेमकद पर्वत की एक खारी श्रीठमे मूगा पाया जाता
था । ठक्ठुर फे के भनुसार् ( ९० ) मूरा कविर, विन्ध्याचक, चीन, मदाचीन, समुद्र
ओर् नेपा भ पैदा होता था |
पेरि्टपत ( २८) ३९, ४९, ५६) के अनुसार भूमघ्य सागर का खाल मूरा
बादुनारिकम, वेरिगाजा ( भर्कच्छ ) ओर मुजिरिस फे वद्रगाछ मे आता था । ष्ठिनी
(२२।११) के भलुपार मूर का मारत मे अच्छा दाम था । आज की तरह उस समय
मी मगा सित्तठी, कोका जीर सानिया, नेपद्स के पास ठेगहार्म ओर जेनेवा,
काराछोनिया, बलेर द्वीप तथा य्यूनिस्त अल्जीरिया ओर मोको के सदर तट पर
मिता था । ठा सागर ओर भख. समुदरतट के मूरो काले दोते थे ।
अगल्तिमत के देक पर्वत के पास एक खाप वीक मे मूणा मिलने के उल्ल
से भी यायद् जड सागर अथवा फारत की खादी के मूर से मतल्व हो सकता है ।
रलपंरीश्चा का परिचय ३९
श्री लाउफर के अनुसार ८ सादनो ईनिका; ए० ५२४-२५ ) चीनी प्रथो मे ईरान
म सूरा पदा होने के उष्ेख है । पघुकुन के अनुसार मगा फारस, सिंहर ओर चीन
के दक्षिण समुद्र से आताथा । तांग इतिदृत्त से पता चक्ताह किं फारस की
प्रवाल दिर तीन फुट से ऊंची नहीं होती थीं । इसमे संदेह नदीं कि फारस के मूर
एदिया मे सब जगह पटुचते ये । काश्मीर के मगो का वणैन जो एक चीनी इतिहास
कारनेकियादहै, वह फारसी मंगादही रहा होगा । मार्कोपोढो (भा० २,१०.३२)
के अनुसार तिव्बतमे मये कीबडी मांग थी ओर उसका काफी दाम होता था। म॑गे
लियां गले मे' पहनती थीं अथवा मूतियों मे जडे जतेथे | कार्मीरमं मृगे इट्टी से
पटंचते थे ओर वहां उनकी काफी खपत थी ८ मार्कोपोखो; १, प्र १५९ ).। ताव-
नये (मा०२, प° १३६) के अनुसार आसाम ओर भूटानमे मरो की काफी
मांग धी | |
, करावेर-यदां दक्षिण के काविरी पद्ीनम् के वंद्रगाह से मतर्व ठो सकता है ।
शायद् यह मरा बाहर से उतरता हो । विध्याचर मँ मरा भिना कोरी कल्पना माम
पडती है ।
चीन, महाचीन-क्गता है
केटन से मतख्व दहो । समव है
कति हयो ।
समुद्र-स्ससे भूमध्य सागर, फारस की खाडी ओर लाल सगरके मृगो से
मतख्व माद्धम पडता है ।
नेपाल-जेसा हम ऊपर देख आए् है तिव्वत ओर कामीर की तरह नेपाक में
मीमूमेकीवडीमांग थी । हो सकता है कि नेपाठी व्यापारियों द्वारा मरा खाए जने
पर नेपाक उसका एक उत्पत्ति स्थान मान ल्या गया हो ।
लहसनिया-नीले, पीले, खाक ओर सफेद रंग की ठहसनिया उक्र फेर
( ९२-९२ › के अनुसार सिंह द्वीप से आती थी । इसे बिडाखक्ष अथवा विह्ी के
आंख जेसी रंगवाढी भी कहा गया है । उसमे सूत पडने से उसे कोई कोई पुककित
भी कहते थे |
वैडये-सवै श्री गर्व, सौीन््र मोहन उङ्क ओर फिनो की राय है कि वैद्य
का व्णैन ठहसनिया से बहत कुक मिरुता है । बुद्धमट (२००) नेभी वैदूयैको
वी की आंख के शक्छ का कहाहै।
पाणिनि ४।३।८४ के अनुसार वैद ( वैद्यं ) का नाम स्थान वाचक है । पतं-
जटि के अनुसार विदूर मे य प्रय ठगाकर् उसे स्थान वाचक मानना ठीक नर्ही; क्योकि
चीन ओर महाचीन से यहां कमश्चः चीन देर ओर
वि चीनी व्यापारी इसदेश म बाहर से भगा
देर टक्कर -फेरू-विरचित
चैद्य विदूर म नदं होता, वह तो वाख्वायमे होता है ओर विदूर म कमाया जाता
है । प्र शायद बाठ्वाय शाब्द विदूर म परिणत हो गया हो ओर इसीलिए उम य
प्र्ययच्गण गयाद्धो | ईप्करे माने यह हुए कि विदूर इन्द वाख्वाय का एक दूसरा
खूप । उस पर् एक मतद कि विदूर वाट्वाय नहीं हो सकता, दूसरा मत है कि
जिस तरह भ्यापारी वाराणसी को जित्वपी कहते ये उसी सरह वैय्याकरण वाच्वाय
को विदूर ।
उपयुक्त केयन से यह वात साफदो जाती हैकिवेद्रूयै वालराय पर्ैतमे
मिक्ता था जीर विदृर् मै कमाया ओर वेचा जाता था | यह परयत दक्षिण मारते
था । बुद्धमद्ट ( १९९) के अनुसार विदूर पर्वत दो रामयो की सीमा पर सित था।
पहला देज कोग है जिसकी पहचान आधुनिक सेठम, कोयव,.तित्देी ओर दूर्
के ङ्छमागसेकीलाती है दूसरे देका नार् वाटि, चारिक या तोख्क आता
है, जिते श्री पिनो चोठक मानते है जिसकी पल्वान चोल्मटठ से की जा सकती
है । इसी आधार पर् श्री फिनो ने वाल्वाय क पहचान चीरे पर्वत सेकीहि। यह
वात उद्टेखनीय है कि सेम जिले म स्फटिकं ओर कोरड वह्तायत से मिलते है ।
उक्करुर फे ( ९४ ) का कुवियग रोग का व्रिगडा रूप है । समुद्र का उषे
कोप कसना दै । उच्छुर् फे ने ल्हसनेया ओर वैद्य अल्ग अल्ग रत मने हैं ।
सभव दहै कि देदामेद से एक ही रत के दोनाम पड गए हो ।
सूदिक
प्राचीन रनशार्वो के अनुसार स्पटक के दो मेद यानी सूर्यकात ओर चन्द्रकात
माने गए है 1 उ्कछरुर् फे (९६ ) नेमी यही माना है पर अगस्िमत के क्षेपक मे
स्फटिके मेदो मँ जठकात ओर सगर्भ मी माने गए है | प्रयवीचन््र चरित
(प्र० ९५) म मी जलकात ओर हस्म का उदे है । सूर्यैकात से आग, चन्द्रकान्त
से अशतवर्पा, जट्नात से पानी चिकना तथा हसगभे सेविषका ना माना
जाता या। ^
चुद्धभद्र के अनुसार स्फटिक वेर नदी, विव्यपर्यत, यन देशा, चीन ओर्
नेपाठ मे होता या 1 मानसोष्ासर के छसार ये स्थान ङ्का, ताघी नदी, रिध्याचठ
जीर दिमाट्य ये ] उच्छुर के के अनुर् नेपा, करमीर्, चीनः कावेरी नदी, जमुना
सौर विध्याचठ से स्फटिक आना था 1
पुं श्छज
पुरान की उत्पचि अद यल स्चमडे से मानी गई दै । इसको दाम
उद्सनिया जेता होता था । बुद्धमह के जचुर पुखर दिमाख्य मे, अगसिमत के
नुप सिह जीर कदस्य (*) मे तयांननमरड क अजुर सिंहठ ओर् कर
भ
रलपरीक्चा का परिचय ३३
महता था। सक्ुर फे ने हिमाव्य को ही पुखराज का उद्गम स्थान माना हे
पर यह बात प्रसिद्ध है कि सिंहल ` अपने पीले पुखराज के लिए प्रसिद्ध है ।
कर्वैतन-कर्कैतन के उत्पत्ति खान का किसी रतान मे उष्छेल नहीं है ।
पर ठक्छुर फेर ने पवणुष्पट्ठान देच म इसकी उत्ति कदी है । यहां श्रायद दो
जगहों से मतक्ब है पवण ओर उप्पद्ान । पवण से संमव है शायद अफगानिस्तान में
गजनी के पास पवीन से मतल्व हो ओर उप्पट्वान से परि-अफगानिस्तान से । अगर
हमारी पहचान ठीक है तो यहां परवान से शायद वहां कर्कैतन के व्यापार से मतख्व
हो । उष्पट्ान से रूस मे उराठं पर्वैत मे एकाटेरिन बग ओर टाकोवाजा की कर्कैतन
की खानों से मतलब हो ( जी० एफ०, हबेटे स्मिथ, जेम स्येन्स, प° २३६, कंडन
१९२३ ) । यह भी संभव है कि उपपट्वान मे पटन शाब्द छिपा हो । इन्नवतूता ने
( २६३-६४ ) फटन को चो मेडल का एक बडा बंदर माना है पर इस बदर की
टीक पहान नहीं ह्यो सकती । संभव है कि इससे कावेरी पद्रीनम् अथवा नागपद्टीनम्
का बोध होता हो । अगर यह पहचान ठीक है तो शायद सिंहर का कर्कैतन यहां
. अता हो ।
ठक्ुर फेरूः के अनुसार इसका रंग तांबे अथवा पके इए महए की तरह
अथवा नीलम होता था ।
भीष्म-व्क्छुर फेरू ने मीष्म का उत्पत्ति स्थान हिमालय माना है । यह रगे
सफेद तथा बिजङी ओर आग से रक्षा करनेवाखा माना गया है ।
गोमेद-र्तराखो मे इसका विबरण कम आया है । अगस्तिमत के क्षेपक में
( ४-५) गोमेद को खच्छ, गुरु, लिग्ध ओर गोमूत्रके रंग का कहा गया है|
अगस्तीय रलपरीक्षा ( ८२-८६ ) मे गोमेद को गाय के मेद् अथवा गोमून्न कै रग का
कहा गया है | उसका ईग धव ओर पिंजर् मी होता था। ठक्रुर फैरू ( १००) ने
इसका रंग गहरा काट, सफेद ओर पीटा माना दै ।
ओर किसी रतरराख मे गोमेद के उप्पत्तिस्थान का पता नहीं चलता | प्र
सक्र फेरू ने इसका ` स्नोत, सिरिनायङ्कुरुपरेवग देस तथा नर्मदा नदी माना दै।
सिरिनायकुलपरे मे कौन सा नाम छिपा इजा है यह तो टीक नहीं कहा जा सकता पर
गोंडा से मघुरीपटनं के रासते मँ पुंगच के अने नगुर्पाद पडता था जिसे ताव-
निये ने नगेरपर कहा है ( तावर्निये, १, प्र० १७३ › संमब है कि नायङ्ुकुपर यही
स्थानहो] वगदेससे शायद वंगारुका बोधो सकता, बहुत संभवदहै कि
१४ वीं सदी म सिंह से गोमेद वहां जाता रहा हो
३४ उदुर-केरू-विरचित
\, पारसीरत् , , ।
टक्कर फेर ने ( १०३ ) खाल, अकीक ओर पिरोजा को पारसी सतर माना है ।
$सका यह अर्थं इञ कियेरत्र यातो फारस मे होते थे अथवा उनका व्यापार फारस
ओर अस्व के व्यापारी कृसे थे ।
लाङ-आग की तरह लाट~यह रत्न वदखसाण देदा यानी वदख्रा से आता
था । मा्कोपोलो ( भा० १, प° १४९५० ) के अनुसार वदख्या के वास मानिक
प्रसिद्धये । वे सिग्रान के एक पहाड से खोद कर निकाले जाति थे ओर उन परर वहा
के शापक फा ररा अधिकार शेता था । गाठ की खान व्षु नदी के दाहिने किनारे
पर हराकाश्म जिले म शिगनान के सीमा पर सित (बुड, ए जनीं टुं अक्स)
भूमिका १० २३ )
अकीक-सक्छुर फेर ने इसे पालि रंग का कहा है जीर इतकी उत्पत्ति जमण
देश यानी असव भ यमन देशा माना है 1 यमन देश के अकीक का उषे इव्नवैतर्
( ११९७१२४८) ने क्रिया रै ( केरा, तेक्सत् रेकातीफ़ अ एक्सत्ेम ओरिया,
९ प° २५६) ओर इसे कई वीमारियो की ओषधि मानी है । आज दिन मी यमनी
अकीकं वव मं परसिद्ध ह । इसका दाम उक्छुर फेर के अनुसार बहुत कम होता था ।
फिरोजा-वक्कुर फेर के अनुसार नीलाम्ड रग का फिरोजा नी्ावर ओर
मुवासीर की खाना से भाता था । निसावर से यहा फारस के निदापुर् से मतल्व ई |
तामनिये (२) प° १०३-०४) के अनुसार पिरोजा फारस भँ दो खानों से पाया
जाता था। पुरानी खान मशद से तीन दिन के रास्ते प॒र निदापुर के आसपास थी
शर नई मश्चद से पाच दिन के रास्ते पर थी । मुवासीर सै यहा ईराक के मोघुख या
भरौसिठ से वोष होता है । ठ्गता है फारसी फिरोजा यहा व्यापार के व्ि आता था ।
भाज दिन मी मोर मे पिरोजे का व्यापार टता इ ।
जच, ठ्टसनिया, इन््नीक ओर फिरोजे का दाम उक्र फेरू के अनुसार तौ
सेसोनेके टको भे होता था । निम्रलिसित यत्र से यह वात साफ हो जाती ह -
= ६६६६
</:|3|:| |>: |< रा ति २ ३ इ;[ ४
{ अज 9 ध | ६ ९ १५ | क | ३४ | ५>
स्दषणी | ० | १॥। | भा द | ११ | १८ | दथा | इजा
४, 1
इन्द्रनील | ० गा | नो | १ २ ५ ८ १५
वेरोजा ०॥ ०] ०॥॥ १ द् ५५ ८ १५
उपयक यत्र के अध्ययन से पता चर जाता है कि लाल इ्यादि की कीमत
दूसरे मारतो के मुकाविठे म काफी कम थी)
1
रलपरीक्षा का परिचय २५
उपसंहार
प्राचीन रलशाखो के आधार पर हमने उपर यह दिखटने का प्रयत्न किया है
कि रतरा प्राचीन भारत मे एक विज्ञान माना जता था। उस विज्ञान मे बहत सी
बातें तो अनुश्रुति पर अवलंवित थीं पर इसमे संदेह नदीं की समय समय पर सरां
के ठेखक अपने अनुभवो काभी संकलन कर देतेथे | ठक्कर फेरू ने भी अपनी
^ रल्रपरीक्षा' मे प्राचीन प्रथो का सहारा ठेते इए मी चोदहवीं सदी कै रत व्यवसाय
पर काफी प्रकारा डाला है । ठक्कुर फेरूः के प्रथ की महत्ता इसल्ि ओर मी बढ जाती
है किं रत सम्बन्धी इतनी बाते सुस्तान युग के किसी फारसी अथवा भारतीय अथकार
ने नहीं दी है । कुह रतौ के उत्पत्ति खान मी, दक्कुर फेरु मे १४ वींसदीकै रतो के
आयातं नियोत देख कर निश्चित किए है । रत्नो की तौर ओर दाम मी उसने समया-
नुसार र्खे है; प्राचीन राल्ञौ के आधार पर नहीं । पारसी रतो का विवरण तो ठक्कर
कफेू का अपना ही है; पद्मराग कै प्राचीन मेद तो उसने गिनाए दी है पर चुनी नाम
का मी उसने प्रयोग किया है जिसका व्यवहार आज दिनि भी जौहरी करते हैँ । उसी
सरह घटिया कालि मानिक के छिए देशी शब्द चिप्पड्या का: व्यवहार किया गया है ।
हीरे के लिए फार इाब्द भी आजकल प्रचलित है। लगता, है उस समय मालवा हीरे के
व्यवसाय के रिप प्रसिद्ध था; क्योकि ठक्छुर पेरूने चोखे हीरके छिए् माख्वी
शब्द व्यवहार किया है । पन्ने के बारे म तो उसने बहत सी नई बते कही है । कुछ
ेसा व्मता है कि उककुर केर के समय मे नई ओर् पुरानी खान के पन्न मँ मेद हो
चुका था ओर इसीलिए उसने पो के तत्काखीन प्रचित नाम गरुडोद्गार, कीडडउटी
वासवती, मूगडनी ओर धूलिमराई दिए हैँ । इन सब बातों के आधार पर यह कहा जा
सकता है कि टक्कर फेरू रतौ के सचे पारखी थे । उन्न देख समन्न कर दी रतो के
वणेन लिखि है केवल परंपरागत सिद्धान्तो के आधार पर दही नहीं |
ह-अ अह
1
असुक्रम
१. रल्नपरीक्षा । प. १-१६
२, द्रव्यपरीक्षा % १७-३८
३, धातूसत्तिः 9 ३९४४
भ्रीमालवंदीय - ट्र -फेरूविरचिता
प्राकरुत माषाबद्धा
रत्नपरीक्षा
श
सयलगुणाण निवासं नमि सव्वन्नं तिहुयणपयासं ।
संखेवि परप्पहियं रयणपरिक्खा भणामि अहं ॥ १॥
सिरिमाल्कुटत्तसो द्र चंदो जिणिद्पयभत्तो ।
तस्संगरहो फेरू जंपद् रयणाण माहप्पं ॥ २॥
पुच्वि रयणपरिष्खा सरमिति -अगत्थ - बुभ ।
विहिया तं दद्ुणं तह बुद्धी मंडीयं च ॥ ३॥
अद्यवदीणकछिकाट - चक्बद्धिस्स कोसमञ्स्त्थं ।
रयणायर् व्व रयणुच्चयं च नियदिष्टिए दद्रु ॥ ४॥
पञ्चक्खं अणुभूयं मंडछिय - परिक्णखियं च सत्थायं (द्) । .
नारं रयणसरूवं पत्तेय भणामि सब्वेसि ॥ ५॥
खोए भणति एवं आसी बरूदाणवो महाबर्वं ।
सो पत्तो अन्नदिणि सग्गे इदस्स जिणणल्थं ॥ ६ ॥
तहिं . पतथि सुरेहिं जन्ने अम्हाण तुं पसू होह ।
तेण पसन्ने -मणियं भविओहं कुणसु नियकनल्ं ॥ ७॥
सो पसु बहिर सुरेहिं तस्स सरीरस्स अवयवा य |
संजाया वर रयणा सिरिनिटया सुरपिया रम्मा ॥ < ॥
अयिथिस्स जाय हीरय मुत्तिय दंता सहिर माणिक ।
मरगयमणि पित्ताओ नयणाञ इन्दनीले य ॥ ९॥
वद्डल्नो य रसाओ वसाउ कक्छेयगं समूप्पन्नं |
ल्हुसणीओ य नहाओं फडिय मेयार संजायं ॥ १० ॥
उङ्घरकेरूपिरचिता-
समपिंड सुण निम्मर गुरुवुष्टा हीणपिड रहुुह् ।
फार रहुतुह्ट वजा वहमु सम समा सुटो ॥ ३३ ॥
वजं रुह फरह सिरं वित्थरचरणं तिरोवरिं काडं ।
जो जडइ अह जाव तस्स धुवं वद् वहु दोसं ॥ ३४॥
जस्स फरहाण मज्छे बुद्धो बुडो हति भिन्न वन्नं ।
कागपय रत्तविदू त वज होड पुत्तह्रं ॥ ३५ ॥
वज्ेण स्वि रयणा वेह पावंति हीरए हीरा ।
कुरुविदौ पुण वेइ नीलस्स न अन्नरयणस्स ॥ ३६॥
अयसार कच्च फछिहा गोमेयग पुंसराय वेडजा ।
एयाउ क्रंडवजना ऊुणंति जे हंति कल्छुसरा ॥ २३७ ॥
बरूडाण इय परिक्खा गुरु विन्नाया य सुहमधारां य ।
साणायं सह् घसिया दुह् घसिया रयण जादमवा ॥ ३८ ॥
॥ इति वज्रपरीक्षा ॥
अथ सुत्ताहटं -
गयकुम १ संखमञ्े २ मच्छसुहे ३ वस £ कोरदाढे य ५।
सप्पसिरे ६ तह मेहे ७ सिप्पटडे ८ युत्तिया हंति ॥ ३९॥
मद्व(प)ह पीय र्ता इय उत्तिम अघुाय मञ्क्त्था ।
वल्यमख्यपमाणा गयंदजा हंति रजकरा ॥ ४० ॥
दाहिणवत्ते सखे महासमुदे य कलना हति । '
खु सेया अरुणपहा नरदुखहा मंगरावासा ॥ ४१ ॥
मच्छे य साम वद्य र्टूतुखा विमरूदिद्टिसंजणया ।
अरि -चोर -भूय - सादृणि - मयनासा हंति रिदिकरा ॥४२॥
गुजसमा मदपहा हवति कच्छ वन सव्व भूमीसु ।
रज्करा दुक्खहरा सुपवित्ता वंसउ्टरणा ॥ ४२ ॥
रलपरीश्चा ५
सूबरदादे वद्र धियवन्ना तह य सालषख्वु्ा ।
चिट्रति जस्स पसे इदेण न जिप्पए सोवि ॥ ४४ ॥
सप्पस्स नीर निम्मर कंकोटीफलसमाण ठछच्छिकरा ।
छट - च्छिद - अहि - उवदव - विसवाही - विज्ञु नासयरा ॥४५॥
मेहे रवितेयसमा सुराण कीटंत कहव निवडंति |
गिण्ंति अंतराटे अपत्त धरणीयलरे देवा ॥ ४६॥
वायं छिजद कोवि हु जरबिदू जखहरंमि वरिसंते ।
सु वि मुत्ताह[ल]टच्छी भणेति चितामणी विरसा ॥ ४७ ॥
एए हंति अवेहा अस्॒या पूयमाण रिदधिकरा ।
लोए बहुमाहप्पा र्हं बह्मा य सिपिभवा ॥ ४८ ॥
रामावटोड वव्वरि सिंघ कंतारि पारसीए य ।
केसिय देसेसु तहा उवहितडे सिप्पिजा हंति ॥ ४९॥
सव्वेखु आगरेखु य सिप्पउड साइरिक्ख जल्जोषए ।
जायति मुत्तियाईं सव्वालकारजणयादं ॥ ५० ॥
तारं वदरं अमर सुसणिद्ं कोमलं गुरं छ गुणा |
रह कटिण रुक्ख करडा विवन्न सह विदु छह दौसा ॥ ५१ ॥
ससिकिरणसमं सगुणं दीहं इक्मि कटुसियं हवद् ।
तस्स य खडंस हीणं मुष्टं निबरछिए अदं ॥ ५२॥
अहरूव पंकपूरिय असार विप्फोड मच्छनयणसमं ।
करयामं गंदिजुयं गुरं पि वदं पि रटुमुष्टं ॥ ५३॥
पीयद्ध. अयट् तिहा सखद छट खरड जह जुग्गं ।
सदसे य द॒संसं इयराणं दिट्रए म॒ष्टं ॥ ५४ ॥
॥ इति सुत्ताहरुपरीक्षा ॥,
टक्ुरकेरूविरचिता -
अथ पद्यरागमणिर्वथा-
रामा ग॑गनई तडि सिधि कटसउरि तवरे देसे ।
माणिक्राणुप्यत्ती विह विह पुण दोस युण वन्ना ॥ ५५॥
पटमित्थ पडमरायं सोगधिय नीख्गध कुरुविदं ।
जामुणिय पच जाई चुन्निय माणिक्र नामेहि ॥ ५६॥
सूरः व्व किरणपसरा सुसणिद. कोमलं च अग्गिनिहा ।
जं कणयसमं कटिया अक्खीणा परठमरायं सा ॥ ५७ ॥
किय कुम कसुंभय कोट - सारिस - चकोर - अक्खिसमं ।
दाडिमवीजनिहे ज तमित्य सोगंधिया नेया ॥ ५८ ॥
कमटारूत्तय - विहुम - हियुटुयसमो य किचि नीटामो }
खस्ञोयकंतिसरिसो इय वन्ने नीख्गंधो य ॥ ५९ ॥
पटम तह साव गंधयसमप्पहं रंगवहुर कुरविदा ।
पुण सत्तासं रहुयं सजलं च इय सष्टाव गुणं ॥ ६० ॥
जाय्णिया विन्नेया जंबू कणवीररत्तपुप्फसमा ।
मुष्टस्संतरमेयं वीसं पनरस दस छ तिग विसुवा ॥ ६१ ॥
सुच्छायं सुणि किरणाभं कोमरुं च र॑गि्टं ।
सुर्यं समं महतं माणिक्छ हव अद्धयुणं ॥ ६२॥
गयछायं जड धूमं भिन्नं ल्ट्सणं सककरं कटिणं ।
विपयं सुक्खं च तहा अड दोसा भणिय माणिक ॥ ६३ ॥
गुणपुदुन्न जहूत्तं माणकं दोसवजियं अमल ।
जो धरद् तस्स रज्नं पुत्तं अत्थं हवद् सूणं ॥ ६४ ॥
गुणसहिय पडमरायं धरिए नरनाह आवया टख्ड् ।
सदोसेण उवच न ससयं इत्थ जाणेह् ॥ ६५ ॥
अगुण विवन्नच्छायं व्टसण जुं थड्यं च खम्ग च ।
ध धरिय सुदेसमद्रं नरं कुणड ॥ ६६ ॥
रलपरी्ला
कर -चरण -वयण ~ नयणं सुपउमरायं पदस्स जणयंती ।
तो वह पडमरायं परमिणि सुयपरमजणणत्थं ॥ ६७ ॥
अहवद्ट उडवद्री तिरीयव्द्र य जा हवई चुन्नी ।
सा अहमृत्तिम मगश्छिम क्रुडा एण सब्वव्ट्री य ॥ ६८ ॥
जो मणि बहिप्पएसे सच किरणं जहि गयधूमं ।
५,
सा इदकंति नेया चदो व्व सुहावहा सघणा ॥ ६९॥
साणाद्र पउमरायं जो किजदह् अंगुटी छिविय कसिणा ।
तं च पहार सगन्भा चिष्पिडिया हवई सा चु्ची ॥ ७० ॥
॥ इति माणिक्यपरीक्षा समन्ता ॥
अथ मरकतमणियंथा -
वलिद् मख्यपव्वय वव्वरदेसे य उवहितीरे य ।
गरूडस्स उरे कंठे हवंति मरगय महामणिणो ॥ ७१ ॥
गरूडोदगार पटमा कीडउदी दुय तद्य बास्षउती ।
मूगडनी य चडउत्थी धूछिमराष्े य पण जाह ॥ ७२॥
गरुडोदगार रम्मा नीटखमर कोमला य विसहरणा ।
कीडउदि सुहम णिद्धा कसिणा हेमाभकंतिष्टा ॥ ७३ ॥
वासवह य सरूक्खा नीर हरिय कीरपच्छसम णिद्धा ।
मूगउनी पुण कडिणा कसिणा हरिया ससणेहा ॥ ७४॥
धूरूमराद गख्या तह कटिणा नीटकच्च सारिच्छा |
मरद्ध वीस विसोवा दसद तह पच दुचि कमा ॥ ७५॥
रुक्ख विफोडा पाहण मर ककर जठर सल्नरस तह य ।
इय सत्त दोस मरगथमणीण ताणं एर वोच्छं ॥ ७६ ॥
रुक्खा य वाहिकरणी विप्फोडा सत्थघायसंजणणी । -
मिण बहिरंधयारी पाहाणी बंघुनासयरी ॥ ७७॥
रफेसूपिरचिता-
कक्कर सहिय अरन्त जठरा जाणेह सच्च दोसगिहं ।
सल्लरसा मामिचरू मरगदइदोसाइं ताण फट ॥ ७८ ॥
सुच्छायं खुसणिदं अणेरुयं तह् हुं च वन्न
पंच गुणं विसहरणं मरगय मसरा टच्छिकरं ॥ ७९॥
सूराभिमुहं ठवियं कर उयरे मरगयंमि चितिजा ।
विष्ुरइ जस्स छाया पुन्नपवित्ता धुरीणा सा ॥ ८० ॥
॥ इति मरकतमणिपरीक्चा समता ॥
अथ इन्द्रनीरम्-
सिषख्दीव समुन्भव महिदनीखा य चड सुवन्ना य ।
छ दोस पंच गुणाहि य तहेव नव छाय जाणेह् ॥ ८१॥
सियनील्भं विप्पं नीलारूण खत्तिय वियाणाहि ।
पीयाभनीरु वदसं षणणीटं हवइ् त सुदं ॥ ८२॥
अन्भय मंदि सकर गन्भा सत्तास जठर पाहणिया ।
समल सगार विवन्ना इय नीले होति नव दोसा ॥ <३॥
अन्भय दोस धणक्खय सकक्र वाहिड मंदिए कुरे ।
पाहणिए असिधायं भिन्नविवन्ने य सिहभयं ॥ ८४ ॥
सत्तासे बधुवहं समर सगारे य जठर मित्तखयं ।
नव दोसाणि फलणि य महिदनीरस्स भणियाई् ॥ ८५ ॥
' शुरुय तह य सुगं सुसणिदं कोमर सरंजणयं ।
इय पच गुणं नीरं धरति मणि कोव पस्मंति ॥ ८६ ॥
नीर घण मोरकंठ य अख्सी गिरिकन्नकुघुमसकासाः।
। , अलिपखकसिण सामर कोडरूगीवाभ नव छाया ॥ ८७ ॥
‡ हीरय। चुन्निय माणिक मरगय नीट च पंच रयणमयं |
इय धरिए् ज पुन्न हद न तं कोडिदाणेण ॥ ८८ ॥,
1 इति इन्द्रनीखुमहापंचसयणुचयं,॥ „^.
` रलपरीक्षा
अह विह्ुम व्हसणिययं वदुज्ो फटिह पुसराओ य ।
कृक्छेयग भीसम्मो भणियं इय सत्त रयणाणं ॥ ८९ ॥
विहुमं जहा-
कावेर विं्चपव्बद् चीण महाचीण उवहि नयपाठे ।
वह्टीरूवं जाय पवाल्यं कंदनारमयं ॥ ९० ॥
[ पाठन्तर-बष्टीरूवं कच्छ(त्थोवि पवालय होई उयहिमज्छम्मि |
वहुसत्त कटिण कोमरु जह नालं सव्बससणेहं ॥ ५० |
बहुरंगं सुसणिद सपसन्नं तह य कोमलं विमल ।
घणवन्न वन्नरत्तं भूमिय पयं विदुमं परमं ॥ ९१॥ छ ॥
द्हसणियञो जहा
नीटुजर पीयारुण छाया केतीड परइ जस्संमे ।
तं व्हसणियं पहाणं सिंघख्दीवार संभूर्यं ॥ ९२॥
इक्ोवि य व्हसणियञ अदोस अड चुक्खओ विराख्क्खो ।
नवगहर्यण समगुणो भणति तं सपुलियं केवि ॥ ९२ ॥
वडृडज जहा-
कुविर्यगय देसोवहि वदृड्रनगेसु हव वदृडजं ।
वसदलामभं नीट वीरिय - संताण - पोसयरं ॥ ९४ ॥
[ पाठान्तर स्यणायरस्स मज्छे इविथगयं नाम जणवो तत्थ |
व्दृडरनगे जाय वज वंसपत्ताभं ॥ ५१ |
फठिहं जहा-
नयवाल कासमीरे चीणे कावेरि जउणनदतीरे ।
विक्गिरि हति एखिहं अद्निम्मख्दप्पणु व्व सियं ॥ ९५ ॥
[ पाटान्तर-नयवाछे कसमीरे चीणे कावेरि जउणनहहकूले ।
विंञ्चनगे उप्पज्नई फरिहं अदनिम्मरं सेय ।॥ ५४ |
रविकंताओ अम्गी ससिकंताओ च्ररेड अमिय जलं ।
रविर्क॑त - च॑द्कंते दुनि, वि फएटिदहाउ जायति ॥ ९६ ॥
ग्
१० उक्करफतेरूविरचिता
[ पाठन्तर-उप्पतीो अग्गी ससिर्कतियो श्वरेह अमियजलं ।
रवित-चदूरकते दुन्नि वि फटिहाओ जायति ॥ ५५ |]
पुंसरायं जदहा-
वहुषीय कणयवन्नो समणिद्धो पुरा हिम्वते ।
जायद् जो धरद्र सया तस्स गुरू वद् सुपसन्नो ॥ ९७ ॥
[ पाठान्तर-पअहुपीय रहिखण्णो ससिणेहो होई पंसरागो य ।
भीसमरु विण चंदसमो दुन्नि वि जायति हिमवते ॥ ५६ |]
कक्रेयणं जहा-
पवणुप्पट्ण देसे जाय ककेयणं सुखाणीओ ।
तंवय सुप्र महूवय नीलाम सदिढ सुसणिदधं ॥ ९८ ॥ छ ॥
[ पाडान्तर-पयणुत्थटाणदेसे जायद् ककय खपाणिभो ।
तंबय सुपकमहुय चय नीरामं सुदि सुसणेदं ॥ ५२ 1
भीसमं जदा-
भीसमु दिणचंदसमो प॑ंडुरओ हेमवंतसंभूभ ।
जो धर् तस्स न हवद पाएणं अगि - वि्लुभयं ॥ ९९ ॥
॥ इति रयणसप्तकं ॥
सिरिनायक्ुल परेवग देसे तह नब्बुया नर्दूमञ्छे ।
गोमेय इंदगोवं सुसणिद्धं पंडुरं पीयं ॥ १००॥
[ पाठान्तर-सिरिनायङ्खपरेवमदेसे सह जम्भरनरईमन्ते ।
गोमेय इदमो सुसणेहं पंडर पीयं 1 ५३ ]
गणसहिया मरूरहिया मंगल्जणया य रच्छिआवासा ।
विग्बहरा देवपिया स्यणा सव्वे वि सपहाया ॥ १०१॥
खत्तिय वलन पवाखय तिन्नि वि रयणाणि भि्नजाईणि ।
वन्नवि जाद्विसेसो सेसा पुण भिन्नजादमओ ॥ १०२॥
इय सत्थुत्तर(सतुत्तम) रयणा भणिय भणामित्य पारसीरयणा ।
अश्र सजुत्ता खर अकीया य पेरुला ॥ १०३॥
)
रलपरीक्ता ११
[ पाटान्तर-इय सस्थुत्तयरन्ना भणिय भणामित्थ पारसी र्यणा ।
वण्णाग्र संजुत्ता अनने जे धाउशंनाया ॥ ५७ |
अइतेय -अगििवन्चं टं वंदंखसाण देसंमि ।
जमणदेसे यकीकं रह मुष्टं पिष्टुसमरंगं ॥ १०४ ॥
[ पाठान्तर-अडइतेय अग्गीवण्णं कारं वदक्खसाए देसम्मि ।
यमणदेसे यकीकं लहु टं पिह्टु्मरंगं ॥ ५८ |
नीटमट पेरूजं देसे नीसावरे मुवासीरे ।
उप्पल खाणीओ दिद्टिस्स गुणावह भणियं ॥ १०५॥
[ पाठडान्तर-नीरनिहं पेरुज्ं देसे नीप्ावरे गुवासीरे ।
उप्ज्ञर् खाणीभ दिद्टिस् गुणाव भणियं ॥ ५९ |
॥ इति वजादिसवैरलानां स्थानक्ञातिखरूपाणि समासः ¢) ॥
अथेतेषामेव मूल्यानि वक्ष्यते जथागाहा । पुनः भावानुसारेण
जथा- |
जे सत्थ - दिद्टिकुंसला अणुभूया देस - काल - माच्च ।
जाणिय रयणसरूवा मंडछिया ते भणिजति ॥ १०६॥
हीणंग अंतजादं कक्खण - सत्तुञ्चया फुडकरंका ।
अय जाणमाणया विहं मडलिया ते न कर्दृयावि ॥ १०७॥
मंडछिय रयण दहु परोप्परं मेिऊण करसच्न ।
जपति ताम मुष्टं जाम सहासम्मयं होड ॥ १०८ ॥
धणिओ अमुणियसष्टो हीणहियं मणडइ् तस्स नह दोसो ।
मंडखिय अखियमुष्टं कणति जे ते न नंदति ॥ १०९॥
अहमस्स अहियय्॒टं उत्तमरयणस्त हीणस॒टं च ।
जे मयलोहवस्ाओ कुणंति ते कुद्धिया होंति ॥ ११०॥
रयणाण दिद मुष्टं निरु वद्धं न होड करयावि ।
तहवि समयाणुसारे ज वह्द तं भणामि अहं ॥ १११॥
१२ उद्घुरफेरूविरचिता
तिहु रादइएहिं सरिसम छि सरिसम तंटुखो य विउण जो ।
सोखस जवेहि छि गजि मास तेहि चहु टको ॥ ११२॥
एगाई जाव [वां]रस तिग बुद्धी जाम गुंज चडवीसं ।
चड रयणाणं मं तोखीण सुवन्नटकेहिं ॥ ११३ ॥
पच टुवालस वीत्ता तीसा पतन्नास पचसयरी य ।
दसहिय चरस सयं दौ चाल ति सय वीसा य ॥ ११६॥
चारि सय तह य छद् सय चउदृस् सय उवरि विडणविर॑ण जा |
इकार सहस दुगसय युष्टमिणं इक हीरस्स ॥ ११५॥
अद्ध इग दु चड अद्य पनरस पणवीस यार सही य |
चुटसीडद चरदसुत्तर सयं च कमसो य सद्टिसयं ॥ ११६॥
तिनि सय सद्धिं समहिय सत्त सथा तहय वारस सया य ।
दो सहस कृणय टका सत्तियसुष्टं वियाणेहिं ॥ ११७ ॥
दो पच अद्र वारस अङ्ार छवीसा य [याट्] सद्र य ।
पंचासी वीसा सड सट सयं दुसय वीसा य ॥ ११८]
चड सय वीसा अड सय चउदस चरवीस पिह पिद सयाणि ।
शजाद [मास १] टंकं उत्तिम माणिक सुष्टु वरं ॥ ११९ ॥
पायद्धः एग दिवटं दु ति चड पण छच्च अड दह् तेर । --
ठार सगवीस चत्ता सदष्टं महामरगयमणीणं ॥ १२० ॥
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अस्यार्थ एव पत्रप्राटजत्रणाह ॥ छ ॥
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4० 9 १२| १५ ८ | २१ | ५.
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भस्य यत्रय धर्थ गाद ११२ उपरे गाद १२० जाव जाणनीय ॥ छ ॥
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८[५५। २५| ४०| ६० ः ११४।९६०| ३६०] ७००।१२००
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६८ |9 | १३। १८ | २७
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रलपरीश्चा
अद्मासाय अहियं मासय अद जाम चर मासं ।
तोरीण हेमटंकिदिं स्ट कमेण सुरयणाणं ॥ १२१॥
एगं दुसढ छ नवगं पनरस चउवीस तहयं चरतीसं ।
पन्नास ङाटस॒द्टं परणं एयार ल्हसणिययं ॥ १२२॥
पा अद्र परण एगं दु पच अद्टैव तह्य पन्नरसं ।
इय दद [नीर] मुष्टं तेव पेरोजयस्स पुणो ॥ १२३ ॥1
अस्यार्थं ज॑त्रे जथा-
~~~ । -----~- ~~~
-~----- ~--------~ 1 ~~ ----- । -------~--- | ~~~
~ ~~~ ---~---~---~ ! ~~ | ~ न | ज अक,
- ~ --~~~ ~~~ ~~~ -~ ~~~ ~~ | ~~~
सिरि बद्धं गुण अद्ध पायं अणुसार पाय करडं च ।
टंकिष्ठि जे त॒रुती मुत्ताहर तं भणामि अहं ॥ १२४ ॥
दस वारस पन्चरसा वीसं पणवीस तीस चाटीसा ।
पन्नार(स? सत्तर सयं चति टंकिकि तह मुष्टं ॥ १२५॥
पन्नासं चाटीसं तीसं वीसं च तहय पन्नरसं ।
वारस दस इ पण तिय इय सुट रुप्परंकेहिं ॥ १२६ ॥1
इति मुनत्ताहटं ।
अथ वज्र जथा -
एगादइ जाम बारस तरति गुंजिद्धि वलन ताणमिमं |
५ 9
मं मंडरिएहिं जं भणियं तं भणिस्सामि ॥ १२७॥
१४ रक्कुरफेरूपिरयिता
पणतीसं छव्वीसं वीसं सोस तेरस[य] दसेवा |
अहं च एग ऊणा जा तिय कमि रुप्पट्काय ॥ १२८ ॥ छ ॥
अस्यार्थ जत्रेणाह -
मोवी | ,,
टक 4 9२
१५
२०
† सद्धित प्रतिमे ९२३ चीं गाथाका पाट भिन्न रूपमे मिलता है जर उसके
नीचे येचरूप कोष्ठक दिया गया हे उसकी रुगणना भी भिन्न प्रकारकी है । गाथा
ओर कोष्ठक निन्न पकार ह -
[द्ध ति छद ] दह तेरस सोरप् वावीस तीष टंफाई ।
लारस्स यट एयं पेरुं हंदनीरु समं ॥ १२३२
अस्यार्थ यजकरेणाह
रलरपरीश्चां १४५
† सुदित प्रतिमे १२४, १२५, १२६ इन ३ गाथाओंकरे स्थानपर पाटमेदवाी
भिन्न गाथाणं है तथा उनके नीचे य॑च्ररूपसे जो कोष्ठक दिये हैँ उनमें कादि भी
भिन्न गिनती बताते है । गाथा ओर कोष्ठक निच प्रकार ह -
बारस चउदस सोखस वीसाई दसदहिययं च जाव सयं ।
टकिक्कि जे त॒टंती य॒त्ताहल ताण युद्टमिमं ॥ १२४)
चालीस पणतीसं तीसं चउवीस सोढसिक्ारं ।
अद्र छ इगेग हीणं जाव दुकमि रुप्प टंकाणं ॥ १२५
एगाह जाव बारस चडति गंजिकि वज्ञ ताणमिमं । ।
वीसाय सोल तेरस गारस नव इगूण जाव दुगं ॥ १२६; ४
98508300 ८० । ९.० | १००
६० | ७०
~ | ९६ | ९९१ | ८ | ६ | ५|४ | ३ | २
नयमम
९६१३|११|९|८|७|६|५|४| य|
अद चुक्ख निम्मा जे नेयं सव्वाण ताण मुष मिमं |
नह इयर रयणगाणं कणयद्धं विहुमे स्ट ॥ १२९॥
गोमेय फिह भीसम ककेयण पुंसराय बेडुजे ।
एयाण खुं द्म्मिहि जषिच्छ कजाणुसारेण ॥ १३० ॥ छ ॥
=>
[ पाटभेद-अई चुक् निम्मला जे नेय सवाण ताण यु्टमिमं ।
सदोसे सयमंसं भमालए युष्टं दसमसं ॥ २७
गोमेय फलिह भीसम ककेयग पुस्सराय वहृडजे ।
उकं पण छ टका कणयद्ध विहुसे युधं ॥ २८
॥। इति सर्वेषां मूस्यानि समाप्तानि ॥ |
%
अस्या पुनर्यत्रकैणाह--
मोती रंक भरति| १२ | १४ | १६ | २० | २३० | ० | ०
रूप्य सरंकण | ८० | २५ | २०
हीरा गजा | १ | २ | ३ | 8 | ष् | द |
रूप्य रकण | २०
१६ उक्कुरफेरूपिरचितां
सिरि धंधकुले आसी कन्नाणपुरम्मि सिद कालिय ।
तस्ुव ठद्कुः चंदो फेर तस्सेव अंगरुहो ॥ १३१ ॥
तेणिह स्यणपरिक््खा विहिया नियतणय हेमपाखकषए ।
कैर ुणि शण ससि वरिसे ( १२७२ )
अष्छावदी विजयरजम्मि ॥ १३२ ॥
=
[ पाठमेद-तेणय रयणपरकिपा रध्या संखेवि टििय परए 1
कर युणि गुण ससि बरिसे ष्टाबदीणस्स रजम्मि ॥ १२६ ]
॥ इति परमजेन श्रीच॑द्रंगज खर फरू विरचिता
संक्षिप्रलपरीक्षा समाघ्ता ॥
~~~
१ पाठान्तर - करूषिरचिते सकोप्यरतपरीक्षा समाघ्त. ॥
ठक्कुर फरू विरचिता
प्राक्त भषावद्धा
द्रव्यपरीक्षा
-----+
ॐ नमो कमङ्वासिणी देवी ।
कमखसण कमलकरा छणससिवयणा सुकमल्दट्नयणा |
# ^ [ [भ १
संजुत्तनवनिहाणा नमिवि महारच्छि रिटिकरा ॥ १॥
जे नाणा मुदाइं सिरि टिष्धिय रकसार कजदिए ।
अणयुभूय करिवि पत्तिड वन्हि मुहे जह पयाउ धियं ॥ २॥
तं भणड करसनदण चंदसुम फिरपणुभाय तणयत्थे ।
तिह् युष्टु ठ दन्वो नामं ठामं सुणंति जहा ॥ ३॥
पटमं चिय चासणियं, वीयद् कणगाईइ रुप्प सोहणियं ।
तदए भणामि मृष्ट, चरत्थए सव्व मदाद् ॥ ४ ॥ दारं ॥
चासणियं जहा -
सक्र पलासकटं गोमय आरन्नगा अजा असि |
कमि तिय इगे गि भाय एग दहिय तं रक्खं ॥ ५॥
छाणिय सेर सवायं वंधि गहं वंकनाछि धमि मदं ।
धव अंगार सवा मणि सोहिय उत्तर चासणियं ॥ ६ ॥
तं पुणरवि सोहिजदइ पण तोला रक्ख वंधिरण गहं |
ता हवद सह् दूरं अइ निम्मर चासणिय रुप्य ॥ ७ ॥
- ॥ इति सवे चासनिका मूरुसोधनविधिः ॥
सीसस्स अमरु पत्तं करेवि र्ट खंड त॒छिबि सोहिजा ।
५ रुप्प सयटं सीसं गच्छेद खरडि महे ॥८॥ - }`
१८
उक्ुरप्षिस्विर्चिता
सय तोरामञ्छेणं वारह् जव सीसए हवद् रुप्पं ।
पच्छा पुण पुण सोहिय तहावि निकणं न कडयावि ॥ ९॥
॥ इति नागचासनिका ॥
रुूप्पस्स वीस मासा छर्टक नागं च दद् सोहिला ।
जं जायद्र ते विसुवा एवं हर रुप्प चासणियं ॥ १० ॥
॥ इति रुप्पचासनिका ॥
नाणय उह ह्रजय रीणी चछलिय टंक दस गहरं ।
पनरह गुण सीसेणं सोहिय नीसरड अं रुप्प ॥ ११॥
तस्सा पाडि्न् रुप्पं सीसस्स जं रहद सेसं ।
तं चासणिय सरुवं अन्नं जं खरडि मच्छि हवे ॥ १२॥
नीच माणयाओ कमेण चउ दुं जव किंचि हीणहिया ।
संगहदइ खरडि रुप्पं अवस्स चासणिय समयंमि ॥ १३ ॥
हरजय चासणिय दुगं दह दह टंकस्स मेलि गहि अद्ध ।
पउण ठु जवतरेखु ह दु जर्वतरि वाहुडद्र नृणं ॥ १४ ॥
1 इति द्रव्यचासनिका ॥
चास्णिय जव दहग्युण जि टंक मासा हवंति तस्छुवरे । `
अग्गिस्स मुत्ति दीयद्र टकप्पड् ञे जवा होति ॥ १५॥
तं सय भञ्ज रुप्पं तहच्छमाणर्स पूरणे जतं ।
तबअदहियस्स पुण जय सष्टाही सा. भणिजेदर ॥ १६॥
॥ इति सद्छाहिकाविधिः ॥ ह,
सामन्नेण सुवन्नो वारहि वन्नीय भित्ति कणओं य ।
पंच जव हीण चिप्पं पिजरि वनी य पंच ते ॥ १७॥
सिय खडिय 'छटूण कटर सम मिर्सिय चन्न सा सखोीयं ।
भेरगय कणय चिप्यय करेवि तेण सह पदयव्वं ॥ १८॥
द्रव्यपरीश्चा
तिहु अग्गिक् सखोणी सत्ति सटूणीहि खज्छए चिप्पं ।
इछारसीय वन्नी इकारस जव भवे सुकसं ॥ १९॥
सय तोट कणय पद्रए जं घट् सा सद्टणियं चिप्पे ।
. चिप्पे दहम्गि प्के जं घट्ट तं च कायरियं ॥ २०॥
चिप्पस्स तिन्नि मासा पत्त करिवि भित्ति कृणय सह् पद्रए ।
स तिहार जञ षट भित्तीओ पढम चासणियं ॥ २९ ॥
पच्छा ति अगि पके पुणो वि तिय मास भित्ति सह पद्रए ।
तेरह विसुव जवस्स य इय अंतर वीय चासणिए ॥ २२॥
प्रपन्न दहगि प[इ?]ए भित्ति समं हवद् तदय चासणियं ।
टकाण चक्टीयं गहिजई य कणय चसणियं ॥ २३॥
॥ इति सुवण्णशोधना चासनिका च ॥
मेखगइई् रुप्य विस्वा दृह् तेरह सोर ठार उणवीसा ।
पच उण चण तिउणं विणं सम सीसयं दिजा ॥ २४॥
सयर् कुद्व्वं गच्छद् खरडितरि रद सेस रुप्पवरं ।
तं पुण दिव सीसइ सोहिय हद वीस विसुव धुवं ॥ २५॥
॥ इति रुप्पसोधना ॥
तुछिय सदूणीयाओ अड गुणीय खरडि रुप्पस्स ।
वद्वि मेि पिडिय करिज् कोमं स चुन्न सहा ॥ २६॥
तत्तो करेवि कुद्धिय धमिज षटटेद् तरय अंसुमरं ।
हवद् दुभामिस्स दरं तस्सा अडय कुला ॥ २७॥
नीसरइ सय रुप्पं सीसं तंबं च जाइ खरडि महे ।
सा खरडि पुण धमिजह पिह पिह नीसरहि दुनेवि ॥ २८॥
काइरिय पुणो एवं कीरडइ तस्साड तंब सह कणयं ।
नीसरइ तस्स चिप्यं हद सीसं खरडि मञ्स्ञाओ ॥ २९॥
॥ इति भिश्रदर श्षोधना ॥
१९
२०
शकुर्फेरपिरन्चिता
कजषिय मपि शूरिय तोपाल नियार्यस्स खहम कणं ।
सोहग्ग फक सजिय दसंस जय कटिय हवद् दं ॥ ३० ॥
॥ इति कणचू्ण शोधना ॥
च भाय अमल तंवय वर पित्त सोल भाय सह् कदियं ।
इय रीसं कायव्वं रुप्पस्स विसोव करणत्ये ॥ ३१ ॥
वीस विसोवा रुप्पं मासा वीसाड जं जि कड्िजा ।
तित्तिय मासा रीसं दिल हव ते विसोव कसं ॥ ३२॥
॥ इति रुप्पवनमालिका ॥
अद् क्ख रुप्प तंवय कमि पनरह सड सड चड रीस ।
इय भाय वैनियत्ये सोटस च कंणय घडणत्थे ॥ ३३ ॥
जारिस वन्नी कीरदई तित्तिय दु जवहिय भित्ति कण य ।
सेस दु जवृण रीस एवं तोलिक्क वद् परं ॥ ३९४ ॥
रीस सम रुणय पटमं गाछिवि पुण थोव कणय सह् कदियं |
पुण सेस सहा वद्धि ता हवद् जहिच्छ वनाम } ३५ ॥
अथवा -
राम कर भाय सुलभं तारं यणि सत्त भाय सह् कटियं ।
एयं सर्यस रीसं सुचन्न वन्नरस हरण बरं ॥ ३६ ॥
सेयारीस विमायं धुर कणय करवि एग एगणं ।
तुष्टि दिन रीसं कमेण पाऊण हद् वन्न ॥ ३७ ॥
॥ इति कनकवनमाछिका ॥
जवि सीरसेहि मास चहु मासिहि ठं तोलओ तिरणो।
सोहि जवेहि वन्नी वारहि वन्नी महाकणञ ॥ ३८ ॥
वन्न तुदेण हय भित्ति सुवन्नस्त अग्घ सह रुणियं ।
वारस भागे पत्त जहिच्छमाणस्स तं. मुष्टं ॥ ३९ ॥
1
द्रव्यपरीक्चा २१
नाणा वन्नी कणो नाणा तुद्धेण जाम गाछिल्ा ।
केरिस वन्नी जायडइ अह एरिस वन्नि किं तुष्टो ॥ ४० ॥
जसु वन्नी जं तुष्टो सो तस्सरिसो युणेवि करि पिंडं |
` तद्धि विहत्ते वन्नं इच्छा वन्नी हरे तुष्टं ॥ ४१ ॥
॥ इति खण विवहारं ॥
उग्धाड मूसि दुग सड पडिय सओ ठक मूसि उदेसो ।
आवद खए गच्छइ हरज तह रीण व्हरे य ॥ ४२॥
केयणि घडणु जाख्णि सहस्सि तोटेहि रुप्पु चउमासा ।
कृण सवार मास टकट्र सहस्सि दम्मेहिं ॥ ४३ ॥
॥ इति हास्यं ॥
चहु सय ठत्तरि कणो चहु सय बत्तीस कणय टंकी य ।
तेवननि सड रुप्पर सद्धिं टकड नाणड ति वनने ॥ ४४ ॥
तोजिकस्स सद्टूणी दम्मिहि वत्तीसि चड ह कायरियं ।
रुप्पस्स खरडि सीसय पमाणि छह टंक दृम्मिक्े ॥ ४५॥
सीसस्स मखी सीसस्स अद्ए तह य उरर खरडि पुणो ।
लोहि. खोह कच्छर इय अग्धं तेर वासद्रे ॥ ४६ ॥
रुप्पय कणय ति धाडय इय तिय सुदाण मुद्ध दम्मेहिं ।
वन्निय तुष्ट पमाणे सेस दु धाञय रकेण ॥ ~७ ॥
नाणा मुद्ाण कए जारिस्ु टंको पमाणिओ होइ ।
रकेण तेण मुहं गणियव्वं सयर मुदाणं ॥ ४८ ॥
भणिसु हव नाणवदट्ं दम्मित्तिहि जाम दत्तियं मुदं ।
इय अग्घ पमाणेणं इत्तिय भुदाण कं मुष्टं ॥ ४९ ॥
रासि तिगाइई गुणियं मञ्छ्िमि हरिङण भार जं ट्ट |
तं ताण मंद मुष्टं न संसयं भणडू फेरु तति ॥ ५० ॥
॥ इति मोल्यम् ॥
1 उक्करफैरूविरचिता
अथ सुद्धा यथा- , ",
¦ सवा इगवन्न दम्मिहिं पुत्तङिया खीमरखीय चरते ।
तोला इद कजानिय वावनि आदनिय इगवन्ने 1 ५१॥
रीणी जे मुदा ख्ग स तिहा गुणचासि तोरुओ तेवि ।
स्कडयार रवा खुराजमी सड प॑चासे ॥ ५२॥
वाटि पाउ ओवम रप्प मया तिन्नि होंति तिहु वे ।
¦ सहु सड असी चत्ता तोर इको य त्रावन्नो ॥ ५३॥
सिरि देवगिरिड वच्चो सिघणु वुद्धेण मासम, इच्छे ।
\, सतरह् विवा सङा रुप्पड ताराय मासद्धो ॥,५४ ॥
अन्नं जं जि करारियि खदा ग नरहडाइ रीणीय ।
तहं सरु दिष्टि सुद्ध अहवा चासणिय अग्गे 1 ५५॥
॥ इति रूप्यसुदवा ॥
१
4 ॥ तो धश
खीमटखी ° 31
कजानी ० धर
अदनी ० ५१
रीणीखुद्धा ० ४९
श्चाई् ० ४८॥
सखुराजमी ० ५०॥
चाणि जिय
प्रति पर्
श्द्ण्या १
न्या
धन्वा
सीघणसुद्ा 5०४
ताख म॒र० ॥ 5०२
१ रीणी ख्दिया र्ग नरदडादि
॥ करारी पते चषि अथवा
~~~
चासनी श्रमणे मूल्य ।
द्रव्यपरीक्षा ` ३
कृणय मय सीयरामं दुविहं संजोय तह विओयं च |
दृह वन्नी दस मासा अभन्नणीया सपूयवरा ॥ ५६ ॥
चकडिय तह सिरोहिय अद्री वन्नी सवा चर म्मासा ।
तष्ठे कुमर पुणेवं अद्री वन्न धुवं जाण ॥ ५७ ॥
परमाभिहाण मुदा वारह् वन्नी य तस्स कणो य ।
तुषेण रंकु इको सत्त जवा सोर विसुवसा ॥ ५८ ॥
देवभिरी हेमच्छं सवादसी सिघणी महादेवी ।
ठटाणकर लखोहकुडी अद्री वाणकर परण दसी ॥ ५९॥
खग्गधर चुक्खरामा सडइनवी केसरी य छह सड ।
सत्त जव दसी वन्नी कडलादेवी वियाणाहि ॥ ६० ॥
ञे अनि अच्छु बहुविह् थरेहि तह मष्ट वं नजेई ।
चउमासा दीनारो जहिच्छ वन्नी णुसारि फटो ॥ ६१ ॥
॥ इति खणमुद्धा ॥
{
3 १० सीताराम मासा १० |
१ संयोगी १ वियोगी
वानी ८ चडउकडीया ४। |
वा. ८ सिरोहिया ४।
वा. ८ कुमर तिहुणगिरि मासा ७। |
वा. १२ पदमा रं १ जव ७.५०॥०
~+ ~9 ~~~
३
आक देवगिरी सुद्धा स्वणमय ¦
वानी विडरपरमाणे
१० सिघण
१० महादेवी
८ सणाकर
८ लखोदकुण्डी
९॥ रामवाण
९॥ खद्ध धर. चोपीराम
दे॥ केसरी
१० ज ७ कौल्देवी
० दीनार मा. ४
|
उखक्ुरफरूविरचिता
वाणारसीय मदा पडमा नामेण इकि सय मच्छ |
तिच्नेव धाठ वटे तोट सइतीस जाणेह ॥ ६२ ॥ , ~
पच जव हीण वारह् वन्नी कण य टक इगयाल ।
छत्तीस अमर रुप्पं तंवं चरतीस टंकेवं* ॥ ६३॥
4
ˆ ° पद्मा १०० मध्यै घातु ३ेट्क ९१ `
ट ४१ सोनावानी १९ जच १९ चीपा ।
र ३द रूपा चोपा नवाती विश्वा २०
र ३९ ताम्ा चोपा अमर प्रधान
इक्ि पठमस्स मञ्ज्ञे रुप्य कणय तंव मासओकिक्ो ।
सत्त दृह पच जव कमि सुन्न चड पनर विसुवहिया ॥ ६४॥
इथ एगि परम तुटो मणि ७ जव विदुवंस सोर टेक ईगो।
जाणेह् तस्स यष्टो जद्थल उणसद्धिं अह सद्र" ॥ ६५ ॥
५
` ° पद्मा ९ संतीर्य रं १ जव ७५०॥'
मासा ९ज ७5० रूपा चोखा ॥
मासा १ ज १० ऽ४६॥॥ ९ कनरु चोखा. ॥
मासा ९ज ५।॥ ०५४ तावा नि्मङ |
भगवा तिधाउ संमव पमा सम॒ विविहसद्धा य ।
भगवंदसणिय नामे कारिय जियसत्त रायस्स ॥ ६६ ॥
भगवा नानाविध मोल्य सुद्रा १९
तोल्ये मासा ४ जव ७ भगवत नामे
जितसच चप कारित ॥
खद विदं कोरं मासा नव वुद्धि तिनि धाऊ य ।
तेवं दिवडमासं सेस कणय रुप्प अद्ध ॥ ६७ ॥
परण ति ठंका सुद्ध इमस्स सेसाण कमिण पारणं ।
जा पाय टकञओ हद् इकारस सुद ठि समा ॥ ६< ॥
क
पिखाई कोर सुद्धा ११ तोच्ये ।
मासा ९ मूल्ये खका ऽ>॥ 5+॥ ऽ>। ५२
¦ 5२।॥ ऽ१॥ ऽ ९। ऽ? 5०] 5०] 5०]
देव्यपरीष्चां २५
माहोवयस्स मुदा व॒ष्टो इकस्स सड चउमासा ।
संजोय तिनि धाऊ पिह पिह नामेहि तं भणिमो ॥ ६९॥
रव कृणय गुज च च तंव गुणवीस वीरवंभो य॑ ।
ख चउवीस जदरथर हीरावंभस्स वावीसं ` ॥ ७० ॥
तबु अटाइ मासा रुप्पु सुवन्नो य इक ईको य ।
तियखोयवभ मुद्ध छत्तीसं ` विविह भोजस्स ॥ ७१॥
7 (५
२७ वीरवरमु मासा ठघातु
० सोनड ० रपड जावा |
० रातीध ० राती रा. १९
क
२२ हदीरावरु मासा वघात ¦
० ०्सोनड रूपड तावा ¦
० ०्रा.३॥ रा.२॥ १९॥ |
~~-~~~--~~~~~ '~-^~^~~-~-~^~^.~~~-~~-^~. "~~~.
१०
~
३६ जिलोकवसरमु १ मासाध॥ सा
०माश्सोनमाश्सूपौमा२॥ ए
~~~
११
° भोज नाना तौख्य विविध मूल्य
° ठधातु समव 1 _
व्ह तिय कमि धाऊ रुप्प कणय गुंज अट पण अहं ।
तलु भव १ सतर १० वीसं २० मुष्टे चालीस तीस वीस धुरं ` ॥७२॥
१२
~^
वारम्भ मासा सोना सूषा
७० १ ध रा.८ र.
१ ध रा.५ रा.५
० १९ ८ रा.३॥ रा.२॥
तावा
स. १९
या. १७
रा.२०
॥ इति रिधाचुमिधितसुद्धाः ॥.
२६ क्ुरफैरुविरचिता
अथ दिधातुसुदाः -
जे तोखा जे मासा जि टंक उष्टविय सयर सदेहि ।
ते सयमज्खे रुप्पड जाणिजहु सेस तवो य ॥ ७२३ ॥
खुरसाण देस संभव चिन्हक्खर पारसीय तुरुकीय ।
तंबय रुप्प ड धाऊ इमेहि नामेहि जाणेह ॥ ७४ ॥
भभद् य एगरिप्पी सिकंदरी कुरुट्टुकी पलाहउरी ।
सम्मोसीय गामी पेरि जमारी मसूद्रीया ॥ ७५ ॥
सय मुद् मज्ज रुप्पड ति चउतिदु इगेग दुदु इग दु तोला ।
सुन० ति ३ सुन०छ६ दु २ सवापणष]
छ ६ दु २ सटनव ९॥ पणदुड १ मासा ॥ ७६ ॥
चरतीसं तेवीसं चरउतीसिगयारु असी सदट्टं कमे।
इगयारु सत्तयारुं पणपन्न ऽडयाल टंकिक्े'* ॥ ७७॥
॥ इति खुरसाणीसुद्वाः । विवरं जत्रेणाह-
---~~----~~ कोद मा
| 2४ भामह सुद्धा १०० मध्येस्पा तो मा ०
२३ इगटीपी १०० मध्येरूपा तो मार
३४ सिकन्द्री १०० मध्ये रूपा २ मा०
४१ ऊुख्ट्ुकी १०० मध्ये रूपा २ माद
८० पराहौरी १०० मध्ये रूपा १ मा
६० समोसी १०० मध्ये रूपा १ माधा
४९ लखगामीं १०० मध्ये रूपा २ मादे
४७ पेरी १०० मध्ये रूपा ग मा'२
| प जमाटी १०० मध्ये रूपा ९ मा
४८ मसूदी करारी १०० मध्ये रूपा २ मा ९॥
अवदुद्टी तह ऊुतुरी ति सवापण दुमासिया स्ट ।
| 4 ख {1
सद्धिं असी तह रुपपं दुं दु जव चउ सोर बिवकम्मे** ।॥७८॥
ट
------------------------------------------------------~~---~~~
° अवदुह्टी १ मासा५। मध्ये रूपा जच २5४ प्र० ६०
० छृतुटी १ मासा २ मध्ये रूपा जव २॥] _ भर० ८०
अ ८
` ॥ इति,अटनारीसुद्ाः ॥
५
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७ 6 6 © ७ © £
दव्यपरीश्चा २७
विषम नरिद भणिमो गोजिग्गा अरणतीस तोर सुवा ।
दउराहा पणवीसं सवा समे अद्भुठ चड मुष्टे ॥ ७९ ॥
भीमाहा छव्वीसं तोखा मासु चारि टंकिके ।
चोरी मोरी तोला पणवीसं मुद्ध चारि सवा ॥ ८० ॥
करड तह कम्मरूवी कालटाकच्चरि य छक करि मुषे ।
सय मञ्छि अह्रमासा सतरह तोला य खलु रुप्यं ` ॥ ८१ ॥
॥ इति विक्रमाकेमुद्राः ॥ `
१५
"^-^ ^~ ~~~.
भासार
गोजिगा १०० मध्ये रूपा तोला २९ परति ३॥ |
दउराहा १०० मध्ये रूपा तोला २८५ मासा३ प्रति ४
भीमादा १०० मध्ये कूपा तोखा रद मासा०॥ प्रति ४ |
चोरी मोरी १०० मध्ये सूपातोखा २५ मासा० प्रति ४,
करड , १०० म्रध्ये सूपा तोखा १७ मासा८ प्रति ६,
करम्मरूपी १०० मध्ये रूपा तोखा १७ मासा ८ परति ६ |
कालाकचारि १०० मध्ये रूपा तोला १७ मसा < प्रति ६ |
गुज्रवई रायाणं बहूविह् सुददाद विविह नामाई ।
ताणं चिय भणिमोहं व॒धं मुष्टं निसामेह् ॥ ८२॥
कुमर अजय भीमपुरी टूणवसा रुष्पु टक पणवन्ना ।
पच नव विसुव मुदो तुष्टे चउमास् तेर जवा ॥ ८३॥
वीसल्पुरीय छह करि कुड गुग्गुखिय ट॑क पन्नासं ।
इष्टृहर पनर तोख अदुद्ध मासा छ सड़ करे ॥ ८४॥
अल्ञुणपुरीय तोखा बारह स्य सुद्धि अद्र करे ।
कटारिया चउदस तोल मासा ति सत्तेव ॥ ८५ ॥
नव करि असपारपुरीगारस तोखा अङाइय मासा ।
सारंगदेव नरवद तस्स इमं संपवक्खामि ॥ <६ ॥
सोटल्पुरी छ तोा मासा अदैव सुदु पन्नरसा ।
पणमासा दृहतोखा दस करि सखापुरी जाण * ॥ ८७ ॥
नि
चदेरियस्स दा से कोच्दापुरीय छह सङा ।
रज्करफेरूविरयिता
चाहंडी तिन्नि कमसो दुरत्तरी अंककी पुराणीय ।
तितिदु तो दह् ति दह् मास वीस वतीस पणतीसं ॥१०१॥
आस्य सतरहुत्तरि दु तोल छम्मास दन्छु चारीसं ।
आसी ठेगा महि छ टंक कणु सुद्धि पन्नासं ॥ १०२॥
आसछिय नविय तुष्टे सतरह तोखा सवाय इगि ' टके ।
टंक अटाई रप्ड सय मन्खे वीस मासाय ॥ १०३॥
॥ इति नरूपुरसुद्राः ॥
२०
त
भ्र० २८ चाहडी दुजओत्तसी ९०० मध्ये तो० ३ भरा० १०
प्र० ३२ चादडी आककी १०० मध्ये तो० ३ मा० ३
भ्र० ५ चांहडी पुराणी १०० मध्ये तो० २ मा० १०
श्र° ४० आसरी सतसर्टोत्तरी मध्ये तोऽ २ म!० ६
भर०५० आसछीटेगा १०० मध्ये तो०२ मा०
भ० १७ आसली नवी ठेका १ प्रति तुलित तोखा १७।
मध्ये रूपा तोखा २॥ सत १ मध्ये रूपा तो ५८९)
[व
पनरह तोला सतिहा वुद्े च विषुव टैक इगो ॥ १०४॥
सहृ सङ् वारह तोटा जीरीय हीरिया सयगे । ,
वारट् करिविं सु कमे टंकद् दके वियाणेह् ॥ १०५॥
दब्खु अटां तोरा अकुडा सय मच्छ मुदु चाटीसा ।
जद्त अड माप्त नव जव दृव्वो सुद्ेण दिवढ सयं ॥ १०६ ॥
सहं सउ वीर टंक जव तेरह सत्त मास सय मज्ज ।
खक्खण सवा छ मासा रुष्पु सए सदु असी सयं ॥ १०७ ॥
राम ठु जव चउमासा दुन्नि सया सुदि रंकु इके ।
बव्वावरा मसीणां खसरं च स्यं नवद् अहियं ॥ १०८॥
1 इति चंदेरकापुरसत्कमुद्राः" ॥
दंव्यपरीश्चा
२१
प्र० ,६॥ कोल्दापुरी १०० मध्ये तो० १५ मा० ४
प्र १२ जीरिया १०० मध्ये तो ८ मा०£
प्र० ८ हीरीया १०० मध्ये तो० १२ मा०६
, प्र ८० अकुडा १०० मध्ये सो २ मा०्दे
प्र० १८० जदत १०० मध्ये तो० ० मा०८
प्र० १६० वीरमुंद् १०० मध्ये तो० ० मा०७
पर० १८० ठक्ष्मणी १०० मध्ये तो ० मा०
प्र २०० राम १०० मध्ये तो० ० भा
प्र० १९० वव्वावरा १०० मध्ये तो ० मान्य,
प्र० १९० मसीणा १०० मध्ये तो० ० मा०५
प्र° १९० खसर १०० मध्ये तो० ० मा०५
॥ इति चेदेरिकापुरमुद्वाः ॥
जारंधरी बडोहिय जइतर्चदाहे य रूपचंदाहे ।
^-^ ^~.
अथ टिदिकासत्कमुद्रा यथा -
अणग मयणप्पलखाहे 'पिथउपरह य चाहडपखाहे ।
सय मन्दि रंक सोलह रुप्पड उणवीस करि सो ॥ १११॥
॥ एता मुद्रा राजपुत्र-तोमरस्य
+,
प्र० १५०
प्र २००
प्र ३००
पर ०
॥ इति जाङधरीमुदाः
#॥ 3.
जदइतचदाहे १०० मध्ये
१०० मध्ये
रूपचचदाहे
निरोकनचच॑दादहे १०० मध्ये
सां तिडरी साहे ॥ मध्ये
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रूप्य तोडा
9१
9१
११
३.
परति नामानि सुद्धानां शत ९ मध्ये
\ १९ अणगपलाहे सत १ ,,
१९ मदनपटाहे सत १९ +,
१९ पिथडउपराहे सत १ +,
१९. चाहड पटाहे सत ),,
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सातउरसाहं पण चारं सया इक रकण ॥ ११० ॥
रूपा तो ° । ©
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मासा
छ
1
1
-
३१
रुप्प चर तिच मासा दिवटढ सयं दु सय टंकिके ॥ १०९॥
तिन्नि सय इकि टंके सीसडिया हृद् तिरोयचदाहे ।
६२
शङ्करपैरूविरचिता
सूजा सदावदीणी तहैव महमूद साहि चउकडिया ।
टंक चउदस रुप्पड सय मन्छरे मुद्ध इगवीसं ॥ ११२ ॥
कडगा सरवा मखिया सवा छ तोटा य रुप्पु सोर करे ।
कुडिया पण तोखा छ मास अद्र इगि रटंके ॥ ११३॥
छुरिया जगडपलाहा चउतोर दु मास रुप्पु पणवीसं ।
टुकडीद्िगा अहिया इगि मासइ रुप्पि तेवीसं ॥ ११४॥
कुव्वाइची जजीरी तह य फरीदीय परसिया मञ्छे ।
दस मासा तिय तोखा म्॒धे टकिक्ि छव्वीसा ॥ ११५॥
चक कुवाचीय वफा सवा ति तोख य सृष्टि इगतीसा ।
सतिहाय तिनि तोडा खकारिया तीस करि जाण ॥ ११६॥
उणतीस निवदेवी सुट तोखा ति सड चउमासा ।
घमडाह् जकारीया अदु तोखाऽडवीस करे ॥ ११७ ॥
पदमा अरवदीणी सयगा समसीय चारि टक सवा ।
इगसट्ट इक्ि रंकद् सत्तरि चर टंक मोमिणिया ॥ ११८ ॥
टक सेखा पेच रवा तोला तिय द्वु नज रुप्पा। =`
वत्तीस करिवि खे टंकई ;के वियाणिजा ॥ ११९॥
तितिमीसि ऊुत्वखाणी बरीफती अधर्चदा सिर्केद्रीया ।
नव टक रुप्पु मुदे च्छतीस करेवि इय समसी ॥ १२० ॥
समसदीण खुयाणं र्हणी पेरोजसाहि पणतीसं 1
तद् वारखुत्तरी पुण ग मासा हीण तिय तोरा ॥ १२१॥
समसदि खया रदीय। तस्स रदी दुन्नि ठिष्टिय इुदउवा ।
सट सोर पण तेरह टंकक उणवीस इगतीसा ॥ १२२ ॥
नवगा पणगा मउजी मासा नव सङ् तोर इको ।
पणपन्न सोरहुतरी दु तो सदि पंचासं ॥ १२३ ॥
उणचास पनरहृतरी दु तोला इक मासओ रुप्पो ।
त डु तो दु मासा [पताक मडल्िया एवं ॥ १२४ ॥
द्रव्यपरीक्षा ३३
पेरोजसाहि नंदण अखावदीणस्स एय मुदां ।
बल्वाणीय इकगी अड़ा तिय रक सुद्धि असी ॥ १२९॥
` बलवाणि वामदेवी तिस्सूखिय चउकडीय सगवन्ना ।
मे दिवड तोर सय म्र द्वु नायव्वो ॥ १२६॥
¢,
तेरहसद मरुट्री नवद् करिवि इक् तोरुओ रुष्पो ।
उच् मूरुत्थाणी नवमासा रुप्पु तीस सय ॥ १२७॥
मरकुद्टीय सुकारी वारह नव नवइ १२९९ अंक्रितस्स महे ।
तोखिकू अद मास सत्तासी मुदि जाणेह ॥ १२८ ॥
सीराजी दइ तोला छम्मासा रुप्पु मुष्टि इगयाखा ।
चरपन्न मुक्खतरफी मासा दस तो इच्छो ॥ १२९ ॥
काल्हणी तह नसीरी दक्छारी सत्त छ पण ७६१ टंक कृणो |
सगयाटीस पचासं पणपन्ना कमिण टकिके ॥ १३० ॥
सत्तावीस गयासी दु ति हिय सयमश्न्ि १०२।१०२ ट॑क दस रुष्पं |
मउजी सद् पण तोला समसी हूय रप्प टकाय ॥ १३१॥
जह्याी तह सकुणी सड़ा पण टंक रुप्पु सय मञ्चे |
9,
मृष्टं सवार दमं ठ्हति वदति विवहारे ॥ १३२॥
अन्न॑न देससंमव असुणियनामादरं जं जि मुदां ।
ते पनरह गुण सीसई सोहिवि कणु स॒ नजेई् ˆ ॥ १२३॥
२४
प्रति नामानियुद्रानां शरत मध्ये रूप्य तोडा मासा
२१९ सूजानाम मुद्रा सत १ 3 १
२९ सहावदीनी सुद्रा सत१ - 3; ५9
२९ महमूदसादी मुद्रा सतर 9 १9
२९१ चउकडीयासुद्रा सत १ + %
प कटका नाम मुद्रा सत १ 99
£ सरवानामसुद्रा सत 7 ५
१६ मखिया सद् 9 95 |
१८ ऊंडचिया सुद् 29 9 3
णय द्ुरिया सुद् ११ ~ 9१ १9
२५ जगरपरादा नाम ,, % १
२२ दुकडीयारेगा 9 ५ 9
२६ कुवादची जजीरी मुद्रा २) ०)
९५४ ५८ ५ (८ .¢ ^ ~ ~ (८ ०८ (८ प
9 «छ ^ ८९ ~¢ ९५ ९८५ ९४ ‰ ‰ ५ (५
|) १।
कुरफेरुविरचिता
न
प्रति नामानिखुद्ाना दत मध्ये स्म्य तोटा मासा
शद फरीदीनामसुद्रा » 1 1 १०
२६ परसियासुद्रा 3) श ५ १०
३९ चक नाम सढरा ,सत १ % 9 २
३९१९ वफानाम सुद्धा ददु + , 9 द
३० खकारिया नामसुद्रा + 9 ५, 8
२९ नीवदेवी नाम मद्रा + 11 [1 छ
२८ धमडाहय नाम मद्रा +» २ ॐ ६
२८ जकारीया नाममुद्रा + 1] 9 ै
दर अखावदीनी सुद्र > 1 3 प
६ सतकरा समती मदा + % % ५
८० मोमिनी अलाई सुदा 3 ॐ ४
देर सेलासमतसी +» + ध २ ९॥
2२४ तितिमीती नाम मुद्रा 9 % घ
2४ कुव्वसानी ॐ 9 9 २१ ४
३९ खठीफती न । % 6
2 अधचदा ॐ 3 3 1 ०
२८ सिकरी नाम मुद्रा 1 | छ
३५ व नाम सुद्रा + २ ॐ १९१
३५ पेरोजसाही + + + 11
३५ वारहीत्तरी +» », + 1 1 ११
१९ स्टी दिद्धिका खकसारसं मध्ये
३१ र्दी बुदौवा रका बुदा
५५ वार०नवका मउजी
५५ पनका मउजी नाम सुद्रा
५ सोटहोत्तरी खुदा सत १ मध्ये +;
४२ पनरहोत्तरी मुद्रा सत १ मध्ये
७ छरा नाम मुद्रा सत १ मध्ये
८० वलख्वाणी इकागी सत १ मध्ये
५७ चख्चाणी वामदेवी सत १ मध्ये
१७ चौकडीया ॥
९० तेरदसई मरोरी सत ९ मध्ये
१३० उश्च सुख्थाणी सत ९ मध्ये + %
८७ स दगानी सद्वा खत १ मध्ये %
८७ कारी नाम यद्रा सत १ मध्ये
४१९ सीराजी नाम मद्रा सत ९ मध्ये
५४ सस्तख्फी स॒द्रा सत २ मध्ये
४७ कार्दणी नाम सुदा खत ९ मध्ये
५० नसीरी दिल्या रकसालहता
५५ दकारी नाम सुद्रा खत ९ मध्ये
२७ गयासी दुगाणी नाम सुद्र
२० मजी नाम जुद्रा तिगानी सत १ र
४८ जखाङी नाम शद्रा वसमाना
७४८ श्छुनी नाम सुद्धा यवचैमान #
------ ५ इति धी दिव्यां राच्ये चचैमानयुद्रा ॥_____
०,७.०0 ५७ „०७ © ५ ७ ७ ० „५ र ५० ७ © „© ७ ८७ ८ < ५ ९८ छ ९५ ८५ १० नन ५ क च १ ४ ५ ५५ ८९५ ७
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© ० 0 0 ७ ~ = 9 ०
द्रव्यपरीश्चा २५
संपद् पवहमाणा मुदा अ्ावदीण रायस्स ।
दुविह् दुगाणी दव्वो पडणा दस अद्र टक सए ॥ १३४॥
छरगाणी पुण दुबहा सङा पणवीस पडण पणवीसा ।
टेक सय मन्ध रुप्पउ सड चर दु जव नव विञुवा ॥१३५॥
द्र्गाणी सय मञ्छये तंबड पण नवद् टक पण दव्वो ।
रायहरे विबहारे गणि इग्गाणिय। सयं ॥ १३६ ॥
इग पण दह् पत्नासं सय तोडा त॒द्ध हेम टकाटूं ।
चर मासा दीनारो रुप्पय टको य तोरीणो ॥ १२३७ ॥
चड मास जाव घडियं सहावदीणस्स तुच्छ मुदां ।
द्म्म छगाणी टंका रुप्प सुवन्नस्स तोखीणा ॥ १३८ ॥
॥ इति अश्वपति महानरेन्दर पातिसाहि अखावदी मुद्राः ` ॥
र् 9)
० रूप्य रका ९ अखाई प्रति गण्यते ॥
१० गानी सतमध्ये तो माई जभ
१० छगानी सतमध्ये तो मा३ ज २।४
३० गानी सत मध्ये तो३े मार ज०
३० दुगानी सतमध्ये तोर मा८ ज
६० इगानी सतमध्ये तो९ माल जण
° दोष तावा सत १ टेक पूरणे सर्वं मुद्र
५ ^ ~~
^
इतो भणामि संपद कुदुबुदी रायवदिषोडस्स ।
चरस वह मुदा नाणाविह वु सुटो य ॥ १३९॥
बत्तीस कणयमया रुप्पमया वीस दस्म सत्तविहा ।
चउविह तंबय साहा युदा सब्वेवि तेसट्ी ॥ १४० ॥ दारं ॥
इग परण दह् तोखइईं दस हिय जास दिवड् सडउदु सय ।
इय वद्र हेम टका चररंस पुणोवि एमेव ॥ १४१ ॥
३६ उङकरकेरूबिरचिता
तेरह मासा सतिहा सुघन्न टको य सोनिया तिविहा ।
इग भासिया दुमासिय चउयंजा एय वत्तीसं ॥ १४२ ॥
॥ इति खणैसुद्राः ॥
२६
{ देम टका नाना तीव्ये
{ ० इकः तोलिया ९
° पच तोलिया २
|
० दस्र तोलिया १ ।
° पचार तोलिया ९
० सय तोलियाटेका
हेमदीनारु मासा 8
रूप्य टका सवेपि इक तोणियाः 1
२७
कनके सुदा २२ यथा-
, नानाविधा तोखो यथा-
१४ इृत्ताकार नाना तो० तो
१ ५ १० २० ३०
० ७६० &० ७० ८०
९० १०० १५० २०० ॥
१४ चतु कोण तोव्ये दत्तकार चत्
निचित ,
.१ मासा १३5 खव््ताकारू 1
.२ अपर नाना वृत्त कघुसुद्रा -
_ १मासा९। १मा०२1 १यु०४
2२
रुणिग तोरी वलन चउदस चरस हेम सम वधा ।
पच विहा रुष्पद्या इग दु ति चउमासि अद्ध. ठुला ॥ १४३ ॥
॥ इति रुप्यसुद्धाः“ ॥
२८
रूप्यसुद्रा २० विचृरणम् 1
५. ठंका मुद्रा नानाविध तो 1. ,{ -
१. सटृतच्ताकार सो० ९
श चतु कोण, । तोखो यथा-
। १ ५५ १० 2२० 2० ४० ५० ४
त 2० ७० &० २० १०० १८५० २०० 1 -
पर्वं 1
५. खपीया सुद्धा नाना चोखो ।
१ माखा९| १मासा | १अाण्रे
_ १ मासा १ मासा ६ | .संदृचखा०
४.१
द्रव्यपरीश्चा
दुमगाणी य छगाणी तुद्धे मुषे य रूप्प तबे य ।
३७
: अहह सम जाणह् अन्ने अन्ने वि ही भणिमो ॥ १४४ ॥
चरगाणी वह सए सोर सवा टक नव जवा रुष्पं |
चउमासा तुष्टेणं न संसयं इत्थ नायव्व ॥ १४६५ ॥
चवीस वारसट्र य अडउयाटीसाण मुद् चररंसा ।
ते य रुप्प तंबय संखा कमि अट्रगाणीमो ॥ १४६ ॥
तित्तीस टंक नव जव चर विवा रुप्पु सेस तबो य ।
सय अह्रगाणिएहिं इगेगि ठुद्धो य चरउमासा ॥ १४७ ॥
॥ इति द्वंम मुद्राः ` ॥
%
द्रम्मा सुद्धा सप्त ७ नानाविध तोखो मूटो ।
चृष्ताकार सुद्धा ३ तोध्ये टं १
१. दुगाणी १०० मध्ये धातु २
ठ. ८ नवाती रूप्य ! ट. ९२ तांभ्र
१. चउगानी १०० मध्ये घातु २
ट. १६ मा० १ जवर रूप्य
टं, ८३ मा० २ जव ७ जावा
१. छगानी १०० मध्ये धातु २
ट. २८ मा०२जव ९ रूप्य
ट. ७५ मा० जव १४] ताम्र
चतुरस सुदाः ४
१. अटगानी १०० मध्ये
ठ. २२ मा० जव ९ 5४ रू°
ट. ददे मा० २ज० ६, १ तां०
१. वारहगानी १०० ठं० १५०
भा० १ ज० १५. १ २५४ रू०
मा० ४ ज०.ऽ३॥. २). १ तां
१. चडउवीसगानी तो ० ३ (३००१)
मा० ३ ज० १५. २॥. ७।. ३ रू०
मा०८ज०) २.९० .१०॥ तां०
१. अडतारीसरगानी ० ६ (६००?) चडवीसगानीतो
। द्विगुण द्यं ।
ताच्र मुद्रा सादासं।
०5१ मासा
०.९ १। मासा ९।
०.५२॥ मासा २॥ ०.5 ५ मासा ५
"~~~ ~~~ ~~
८ ठद्र्फेरूविरचिता
विवा सवाय विसुवा अधवा पडूका य तंव चडरंसा ।
£ वुद्ेण कमि चडंता मासाओ जाम पण मापा ॥ १४८ ॥
॥ इति साहे सुद्धा; ॥
एव दव्वपरिक्खं दिसिमित्तं चेदतणयफेरेण । ,
भणिय सुय - वैधव्ये तेरह पणहत्तरे वरिसे ॥ १४९ ॥
इति श्रीचन्द्रागज ठद्ुर फेरू विरचिता '
द्रव्यपरीक्षा समाप्ता ।
ट्ुरपेरूषिरचिता
| द
धातृत्पत्तिः।
=
अथ धातूत्पत्तिमाह-
रुप्पं च मद्वियाो नइ - पव्वयरेणुयाड कणञओ य ।
धारव्वाभो य पुणो हवन्ति दुनिवि महाधाऊ ॥ १॥
पटर च कीडयाओ मियनाहीञ हवेद कत्थूरी ।
गोरोमयाड दुव्वा कमं प॑काड जणेह् ॥ २॥
मडरं च गोमयासो गोयेयण होन्ति सुरहिपित्ताओ ।
चमरं गोपुच्छा अहिमत्थाओ मणी जाण ॥ ३॥
उन्ना य बुक्डाओ दन्त गद्रंदाउ पिच्छ रोमा(मोरा१)ओ।
चम्मं पसुवग्गाओ हूयासणं द्ारुखण्डाआ ॥ ४ ॥
सेखाउ सिखडइव्चं मर्प्पवेसाड हृद जवा वरं ।
नि
हय सगुणेहि पवित्ता उपत्ती जय नीयाओ ॥ ५॥
इत्युत्पत्तिः ।
अथ करणीयमाह-
पित्तरि जहा-
वे मण अधा८वटियं कुद्टिवि रंधिज् गुडमणेगेण ।
जं, जायद् निच्चीढं तयद. तवय सहा कटियं ॥ ६ ॥
सा वीस विसुव पित्तर दुभाय तबेण पनर विष्वा य |
त्छेण तंबयाओ सवाद्रया ठक्त मूसीहिं ॥ ७॥
तम्बयं .जहा-
बन्धेरय खाणीओ आणवि कुद्टिज धाह महरी य |
गोमयसहियं पिंडिय करेवि सकवि य पहयव्वं ॥ ८ ॥ `
£
उङकरफेरूपिरवचिता
खीरोबहिसंमूयं विभूसणं सिरिनिहाण रायाणं ।
' दाहिणवन्तं संखं वहूमंगरनिख्यरिदिकरं ॥ २९॥ ^
वदन्ति रेहकलियं पचम सुन्भ सोरूसावत्तं ।
इय संखं विद्िकरं संखिणि हद दीददाणिकरा ॥ ३० ॥
सिरिकणयमेहटजुयं वरठाणे ठविय निच सड कां |
दुधि. न्हविऊण चन्दणि कुसुमागरि मन्ति पडला ॥ ३१ ॥
पूजामच्रः-
ॐ हीं श्रीं श्रीघरकरसाय
पयोनिधिजाताय रक्ष्मीसहोदराय चितितार्थसंप्रदाय
श्रीदक्षिणावर्च॑संखाय । ॐ हीं श्रीं जिनपूजाये नमः ॥
इति पूजाविधिः ।
दाहिणवत्तो य संखोयं जस्स गेदंमि चिद् 1
मंगल्मणि पवन्ते तस्स ख्च्छी सयंवरा ॥ ३३ ॥
तस्संखि खिविय चंदणि तिख्यं जो कुणई पुहवि सो अनजिओ।
तर्स न पहवद् किंची अहि-सादणि-विज्ञु-भगि-अरी ॥ ३४ ॥
नरनाहगिहे सखं बुदहधिकरं रजि रद्ध भण्डारे ।
इयराण य रिदिकरं अंतिमजार्हूण हाणिकरं ॥ ३५ ॥
दाहिणवत्ते संखे खीरं जो पिय कय ऊुख्च्छी य ।
सा व्रा वि पसूवड गुणखक्खणसंजुयं पत्तं ॥ ३६ ॥
इति दृक्षिणावततैसद्खः ।
दीवंतरि सिवभूमी सिवरुक्खं तत्थ होन्ति रुदक्खा ।
एगाद् जा [चं]उदस वयणा सव्वे वि खुपवित्ता ।॥ ३७ }
पर उत्तमेगवयणा सिरिनिरया विग्धनासणा सहया 1
* ^ केणयज्ञय कण्ठ सवणे सुय सीसे संठिया सहला ॥ ३८॥
\
धातूत्पत्तिः ७३
दुमुहा -मंगख्जणया तिमुहां रिवहूरण चरर मजञ्ज्रत्था ।
पेचसमुहा पुन्नंयरा सेसा सुपवित्त सामन्ना ॥ ३९॥
इति सुद्ाक्षाः ।
गण्डुयनइसंभूयं साछिगगामं कुमारकणयजुयं ।
-चक्छंकिय सावत्तं वद्र कसिणं च सुपवित्तं ॥ ४० ॥
खोया तरहयमत्ता हरि व्व पूयति साङ्गामस्स ।
सेयस्यि मुतिहेउ पावहरं करिवि चायति ॥ ४१॥
इति शालिग्रामम् ।
“ महभूमि दक्िणोवहि केडिवणं तत्थ केटिगुदाओ ।
कह्रञ्रभ य जाय कप्पूरं केटिगन्माभ ॥ ४२ ॥
कपूर तिंचि कित्तिम दइकडि तह भीमस्षेणु चीणो य ।
कच्चाउ सुकमि मुष्टो वीस दस छ विसु ब विसुरवंसो ॥४३॥
-कायासुगन्धकरणं तहत्थिमज्ञाय भेयगं सीयं ।
‡; -वाय-सलेसम-पित्तं तावहरं आमकप्पूरं ॥ ४४ ॥
इति कषूरः ।
अगरं खासदुवारं किण्हागर तिद्धियं च संवख्यं ।
वीसं दस तिय एगं विसोवगा सुकमि अन्तरयं ॥ ४५ ॥
अदकटिण गवख्वन्नं मञ्खे कसिणं सर्क्ख गरुय च ।
उण्हुं घसिय सुयंधं दाहे सिमिसिमदई अगरवरं ॥ ४६ ॥
| दइयगरम् ।
मख्यगिरि पव्वयंमि सिरिचंदणतस्वरं च अहिनिखयं ।
अह्सीयटं यध त्गंधे सयलवणर्गधं ॥ ४७ ॥
सिरिचदणु तह चंदणु नील्वह सूकडिस्स जाइ तियं ।
तह य मछिन्दी कउही घव्वरु इय चंदणं छविं ॥ ४८ ॥
वीसं वारट्र इगं तिहार पा विव चंदणं सेर ।
पण तिय दु पाड टका जद्रथर चर तिन्नि कमि सुदं ॥ ४९॥
उक्रफेरूपिरचिता
सिरिचन्दणस्स चष्ट वनने पीयं च .वसिय रत्तामं ।
साए कडुयं सीयं सगंठि संताव नासयरं ॥ ५० ॥ ,
इति चन्दनम् ।
नयवार-कासमीरा कामस्या मिय चरम्ति सुकमेण 1
मासी सुत्यगटि उनं कल्थूरिय अरूण पीयघणा ॥ ५१ ॥
नयवाल-कासमीरे मियनाही हवद् वीस विसुबा य ।
पचि उरमाद्र पव्वय सभूय दह्रं जाणेह ॥ ५२ ॥
मियनाहि वीण हृद पण तोखा जाम चम्म सह् तुष्टो ।
तस्स कणु वार विसुवा चम्मो विवह उदेसो ॥ ५३ ॥
मियनाहि उण्हमहुरं कड़यं तिक्ं कसायसुग्गंधं ।
टुरगन्धि छदि तावं तियदोसह्रं च खसणेहं ॥ ५९ ॥
इति सगनाभीकटथूरिकाः ।
कृसमीरि जवडि केसरि देसे हृद कुंकुमं खगन्धवरं ।
वीस वारटरं विवा पण आदण हुरुमयस्स भवे ॥.५५॥
इति कंकुमम् 1
मुर मास ऊुट वाटय नह् चन्दण अगर मत्य छुष्टीरं ।
सिव्दारसखंडजुयं सम मिर्स दंग वर धूवं ॥ ५६॥
इति धूपः 1
कप्पूरसुरहिवासिय चन्दणसंभूय परम सिय वासा ।
मासीवाखयसंमव कल्थूरिय वासिया सामा ॥ ५७॥
इति वासः । †
इति रष्ुरफेरूविरचिते धातोरखत्तिकरणीविधिः समासः।
शरीचिक्रमादिये संवत् १४०३ वरे फागुण श्° < चन्द्रवासरे
शृगसिरनधतरे छिपितम् । सा० भावदेवाङ्गज पुरिसड ।
। आत्मवाचनपठनारथं सुममस्तु ।
~< ° <==~-~--
ठक्ुर फेरू विरचित
=
ज्यातषरसार
॥ ॐ खस्ति ॥
॥ आदिद्यादिग्रहा नमः॥
सयल्सुरासर नमिरं जोदससारं भणामि किं पि अहं
संखेवि परप्पहियं निरिक्खिरं पुव्वसत्थां ॥ १
हरिभद-नार्चंदे पउमप्पहसूरि-जरण-वाराहे ।
[000 0 080 0) 0) 00 म भा 0०५००१०० चि भजन म ११००१.०१.१७ ८००१४
दिणसुद्धिः बयाखीसं विवहारे सदधि गणिय अडतीसं |
गाह् दुहियसड रगे दुसय बयाखीस लुय सब्वे† ॥ २ ॥ दारं ॥
[ प्रथमं दिनद्युद्धिद्रारम्।
दिणञ्युदिः जहा-
~१_ (~य कुजं ८५ (^ ६ _ (9 ९ ,„_ (~
रवि ससि कुजं बह गुरं सियं सणिवारा राह केय सहिय गहा।
ससि बुह गुर सिय सोमा कुर त्ति बुहो य जेण जु ॥ ४
नंदा भदा य जया रित्ता पुन्ना य पडिवयाइई तिही ।
नक्खत्त जोय रासी. चक्क अवकह्ड सुपसिद्धं ॥ ५
तं जहा -अश्विनी १, भरणि २, क्रत्तिका ३, रोहिणी ४, गरिरः
५५ आद्रा द, पुनर्व्वस्ु ७, पुष्य ८, अ छेषा ९, मघा १०, पूर्वफाल्युनी ११.
उत्तरफल्गुनी १२, इस्त १३, चिच्ा १४, खाति ५, विराखा १६,
अनुराधा १७, उयेष्टा १८, मूल १९. पूर्वाषाढा २०, उत्तराषाढा २१,
जनीचि २२, रवण २३, धनिष्ठा २४, रातमिषा २५, पूर्व॑भाद्रपद
९९ उत्तर नाद्रपद २७; रेवति २८ ॥ इति नक्षत्रनामानि ॥
† ४२ दिणलुद्धि, ६० व्यवहार, ३८ गणित, १०२ खम्र,-२४२ गहा ।
-रिप्पणी | ।
४५
(1 उद्घर्रूधिरचित ज्योतिपसार
वि्कम १, पीति २, आयुष्मान् ३, सौभाग्य ४, सोमन ५,
अतिगंड ९, सुकर्मा ७, धृति ८, गल ९, गंड १०, बद्ध १९१, धुव
१२, व्याघात १३, दपण १४, वज्र १५, सिद्धि १६, व्यतीपात १७,
वरियालु १८, परिघ १९, दिव २०, सिद्धि २१; साध्य २२, द्युभ
२६, चद २४, व्रह्मा २५, रद्र २६, वैधृति २७ ॥ इति योगनामानि ॥
मेषु १, ब्रु २, मिथु 3, कड ४, सि ५५ कन्या ६, तुरा ७,
बधिरः ८, ध ९, मकरु १०, ऊख ११, मीलु १२॥ उति रादिनामानि॥
चुचेचोलाअभ्विनी!लिद्टुटेलो भरणि)अइउएकृत्तिका।
ओवविवुरोदिणी।वेवोककिग्रगरिरः।कुघडछओआद्रा।केको
ह् टि पुनर्वसु! छ दे दो ड पुष्य । डि ड़ डे डो अच्छेषा। ममिश्ुमे मघा।
मो 2 टि इ पूर्वफाल्गुनी । टे ठो प पि उन्तरफात्युनी पुपण ठ दस्तः।
पेपोररिचिच्रा।र्रेरोतसाति।!तितुतेतो विदाखा।न नि
खने अनुराधा। नोययियुच्येछायेयो भचिमूल। भूष
फट पूर्वापाडा। भेभोज नि उत्तरापादा। ज्ञजेजों खा अभिः
जित्। चि खु खेखो श्रचण।मगिशुगेधनिषछा। गोससिखु
छातभिपक।सेसोद दि पूर्वभद्रपदा। दु छा चन थ उत्तरभद्रपदा।
देदो च चि रेवती । इति नक्नत्राचकद्डचक्रम् ॥
अश्विनी भरणी कृत्तिकापादे मेषः १ । कृत्तिकाणां चयः पादा
रोदिणी गदरा चपः २ । श्गरिरादै आद्रा पुनव्वैखपादच्नयं
भिशुनः ३। पुनर्वसुपादमेकं पुष्य ज्छेपा कर्कटः े 1 मघा प्रवा
फाट्युनी उत्तरा फाल्यनीपादे सिः ५। उत्तरफाल्युनीनां त्रयः पवा
दस्त चिच्ाद्धं कन्या 1 चिच्राद्धै खाति विदाखापादच्रयै तुला ७।
विराखापादमेकं अञुराधा ज्येष्ठा च्रथिकः ८। मृ पूर्वापाढ उत्तरापाढ-
पादे धनः ९। उन्तरापाडाणां चयः पादा ख्रवण धनिष्ठां मकरः १० र ।
धनिाद्ध सत्तसिष पूर्वभद्रपदपादच्र्य कुमः ११ पूर्वण
उत्तर भद्रपद रेवती मीनः १२। इति नक्षत्रे राङायः ॥
रवि पडिवेऽह्मि नवमी कर मूर पुणव्वस् घण्ट य ।
अस्िणि पुस्मो य तहा ति-उत्तरा रेवद सिद्धा ॥ ६
सोमे नवमी वीया मियसिरि अणुराह प॒स्सु रष्िणिया 1
सवण दय पेच रिक्ला मय॑तरे जया तिहि सहया ॥ ७
प्रथम दिनश्ुद्धिद्धार ड्
तिय छट्रऽदरमि तेरसि मूकऽस्सणि रेवदर य असङेसा ।
मियसिर उत्तरभदव इय सिद्धा भूसवारंमि ॥ <
वीया सत्तमि बारसि असटेसा पुस्स सवण अणुराहा ।
कित्तिय रोहिणि मियसिरि बुद्धदिणे इय सुहा भणिया ॥ ९
पेचमि दसमिक्ारसि पुनिम अणुराह् पुव्वफग्गु करं ।
पुस्स पुणव्वसु रषद अस्सणि य विसाह गुरि सिद्धा ॥ १०
सक्र तेरसि नंदा अणुराहा सवण पुव्वफमग्गु तियं ।
उत्तरसाट पुणव्वसु रेव अस्सिणिय रिडिकरा ॥ ११
सणि नवमि चरथि अह्रुमि चरदसी सवण साइ् रोहिणिया ।
मह् सयभिस पुव्वफर्यु तिहि-वार-मि सिदिजोय सुहा ॥ १२
॥ इति वार-तिथि-नक्चच्न-सिद्धियोगः' ॥
छद्िक्छारसि चउदसि रवि बारसि तेरसी य सोमदिणे ।
भूमे पडिव इगारसि तेरद्मि चउदसी बुद्धे ॥ १३
गुरि दु च सन्त बारसि नम्वि बीय चयि चउदसी सुक ।
५. 9.१
पण सत्त पुन दह सणि तिहि वार विरुद. जाणेह् ॥ १४
॥ इति तिथि-वार-विरुद्धयोगः" ॥
सूराद् बारसीओ इगणजा छट ककजोगोऽय ।
रवि ससि सत्त बुटिग तियं संबत्तय छ गुरि सुक्क तिया ॥ १५
॥ ककैट - संवत्तयोगतैः ॥
मर चित्तुत्तरसाढा धण-उत्तरफग्गु-जिद्र-रेवद्रया ।
सूराइ जम्मरिक्खा णेह तह वज्मुसट पुणो ॥ १६
॥ इति जन्मनक्षत्र वज्सुदा्ट* च ॥
1 दद्यतां प्रथमं कोष्ठकम् । 2 द र्यतां द्वितीयं कोष्ठकम् । 3 दरयतां
तृतीयं कोष्ठकम् 1 «4 दर्यतां चतुर्थं कोकम् ।
६ ख्ुरफेरूविरचित ज्योत्तिषसार
चट चुट नव दसमे तेरसमे वीसमे य नक्खत्ते ।
रविरिक्खाड गणिजइ रविजो सयटकल्जकरं ॥ ३९
रवि-कुज-वुह-सियवारा दुगंतरे भरणिमाई रिक्लाहं ।
युननिम तिय भदा तिहि निवजोया तरुणजोगा य ॥ ३५
नंदा पंचमि नवमी अस्सणिमाई दुगंतरे रिक्खा ।
बुह-भूम-सोम.सुक्का कुमारयोगा युणेयव्वा ॥ ३६
रविजोय-रायजोए कुमारजोए सुञखदियहे वि ।
ज सुहकजं कीरद ते सव्वं वहुफरं हवद् ॥ ३७
॥ इति रविजोग" - राजजोग - कुमारयोगच्रयम्"* ॥
गुर कुज सणि तिहि मदा मिय चित्त धणिद्र जमल्जोगोऽयं ।
तिप्पाएु नक्खत्ते इय सहिय तिपुक्खरं जाण ॥ ३८
जमरु-तिपुक्खरजोए सुहकलं पुत्तजम्म-वीवाहं ।
नट्रु-विण्टुं सव्वं हवेइ तं विरण-तिडण कमे ॥ ३९
॥ उति जमल -च्रिपुष्करयोगौ" ॥
वे वार सणि विदप्पड् दु ठु अंतरि कि्तिगाद् नक्खत्ता
तिहि र्ता तेरऽ्मि नायव्वा थविरजोगा य ॥ ४०
जु जणावणीयं जलात् बुव अणसणाणं ।
जं युण वि अकरणीयं ते करद थविरजोगेण ॥ ४१
॥ इति स्यविरयोगः" ॥
सणि ससि बुह अभिसेयं बुह-गुर-सुकसु वत्थपहिरणयं ।
सूरे कारभं पुर नगर मंगर कुजा ॥ २
॥
इति श्रीचंद्रागजटङ्ुरफेरूषिरचिते ज्योतिपसारे
_____ दिनशुद्धर्नाम पथम द्वारं समाम् ॥ गाथा ४२॥
१ सू्ैनकषत्रात्. चद्रनघत्र जाम गणनीयम् । ४।६।९।१०।९३।२०) रवियोग
उत्तम. । “कस्स भए पचाणणस्स भस्नति गयघडसदस्सा ।
तट रविजोगपणट्ा गयणम्मि गा न दीसति 1
13 दद्या अयोदश कोष्ठकम् 1 14 दइ्यता चतुर्दश कोष्ठकम् । 15 ददयता पच्वरदृश
कम्. । 16 दृद्यता पोडश कोषठकम् । 17 द्क्यता सप्तदृज कोष्ठकम् 1
प्रथमं दिनड्ुद्धिद्धार
एतेर्यत्रेणाह ९५.
ेणाह~-
प्रथमं कोष्ठकम्
=
१।८।९ ह।मू।पु1ध।अ।पु।!उ२।रे।
९।२ मते० ज्ञेया | खग । अचु । पुष्य । रो! प्र
३।६।८।१३ मू 1 अश्वि।रे1 ज्छे। खर} उम।
२।७।१२ गच्छे । पुष्य ।श्र। अनु ।क।रो। स]
८११०।११।१५ | अचु । पृूण्फा। ह। पुन। पु ।वि। रे । अश्वि।
१।६।११।१३ अयु 1 श्र) पू० फा] उ० फा उण षा) पुन। रे। अश्ि। ह।
९।४।८१९४ श्र स्वा । सो । मघा । शत । पूवीफाल्गुनी
द्वितीये कोष्ठकम्
| वार | तिथिचिस्द करकैर। सं
१६.5१६ द1११।९४ | १२। ७ | भरणी | मघा | विरा ६ ज्येष्ठा
सोम| १२१२ | ११ | ७ | चित्रा | विशा | पृण्षा | उण्षा | अभि
मेगख| २।११ | १० | ० | उण्पा | आद्र | धनि | शत | पृण्भा
वुध | १३८१४ | ९ | १।२। धनि० | मूक | रेवती । अश्वि | भणीरः
गुरु | २४।७१२ ६ | उण्फा | छृ्ति | रोहि | सग | आप्रा
भ
वज्रा | यमधेट | उत्पात [सुत्युयोगकाणयोग
८
टक | ९।२।४।९४ | ७ | ३ | ज्येष्ठा | रोहि | पुष्य | अच्छे | मधा
द| ० | रेवती | हस्तु | उण्फा| दस्तु | चिना
रानि 9 १०११५
ततीयं कोष्ठकम्
वार | कुलिक | उपङ्कछिक | कंटक | अर्दधमह | कार्वेखा | गुभवेाप्रहःयार्ध
रवि | ७ ष् | £ ८ १।२।६
चंद्र | ६ 8 २ ७ ड १।८।५
मग | ५ द १ २२ द 219८
ङ्च | € २ ७ प 4 २।६।८
गुरु | १ दे ८ राणीऽ
खकर| २ ७ ष्च द ७ ७९१६८
डानि २ द | @ ६ २ अण
८ उकुरकरूविरविता ज्योतिपसार
चतुथ कोठम् पथ्चम कोकम्
व ॥ २४ भवन्ति 1
म्) प्रथमाराधिपस्य
् यावत् घरी २
वार चार | यंभ | गकायपाव् हकुअगुख | तदुछायापाद कालीय अदयोयतेऽपि होरा
करहरा अह्यरा्ञप हस
रवि २० ११ चार घटी
चट १६ <]
मग | श्ना २ भा
इध | २९४ 2» १ चुघ २॥
व न चट २
टक १२ ८ दानि
शनि, १२ ८॥ गुर सा
0
1
पष्ठ कोष्ठकम् सप्तम कोकम्
सू्यैद्ग्धास्तिथयः चद्रदग्धास्तिथय
हः न,
द्य तिथि राशय तिथि
धन् । मीन २ कभ 1 घन ` २
दप । ङम ४ मेष 1 मिथन ध
मेष 1 कके द तुला । खिद द
मिथुन । कन्या < मकर । मीन <
चश्चङ। सिह १० चप 1 कफे १०
मकर 1 तुर र वृश्चिक 1 कन्या ०२
अष्टमे कोष्ठकम्
10) करूरद्ग्व(ग्धा)स्तिथय सेपख्कान्दयादि
र स्ननन्[सन् [ड सच न ति |क | ठ निच |म |ॐ | | म । ड |
६ ७| <| ९।१९९|१्द् १९३ , १४
५| १० | १० | १० | १० | १५ | १५ | ९५ | १५
०
५
प्रथम दिनशुद्धि दार
नवमं कोष्ठकम् दामं कोष्ठकम्
६ तरुणयोगः-दौ
चार
1
१५ | भर) सग पुष्य रवि ९ | अशिरो
३ | पृण्फा।चिच्रा।अनु | बुघ ६ | पुन।म
२ | पृ०्षा।ध। मंग १९ | ह! विशा
७ | उत्तरया भा द्यु | | ` मूढ । श्र
१२ प्रभा
एकादशं कोष्ठकम् द्ादक्षं कोष्ठकम्
धि त
तिथि | नक्षत्र | वार | तिथि | नक्षत्र | वार
२ | श्छ | शुरु 0 र्त्ति । पुल | शुरु
७ | चि |मेग ७ |उ०्फ़ा।वि | मंग.
१८ |उण्षा।पुच्भा|शनि
१२ | ध | शनि
चयोदशं कोष्ठकम्
स्थविरयोगः
(तिथि || | नश्च | वार
४ | कृत्ति । आद्र £
, ९ | आ्छेषा ,, श्य-
१८ | उत्त फाल्गुनी | र
१३ | खाती ) ज्येष्ठा | वबु-
८ | उत्तराषाडा ह-
॥ ० । स्प
० ति
१० उद्रफेरूबिरचित ज्योतिपसार
, चतुरदै्ं कोष्ठकम् < त
1 रवि ! चंद्र | मंग | बुध | गुर ९ शानि
सारिस्थिति [मादु दिन (मासु |माञ्ु| मास |माद | मास | मास
१२ |१॥|१ |१३।१९ |३० | १८
उदयदिन सं ० ० । ६६० ३६ । ३५२ २५१ २४२ ०
अस्तदिन सं०| ० | ० | १२०| १६ | ३२ | ९ | ४२। | पथि०
०।३२। ० ७७ । ० पू्यै०
६५ | २१ | ११२। ५२ | १३७ °
वक्रदिन ० | ०
पोडशं कोष्ठकम्
पञ्चदशं कोष्ठकम् १ ५ | चद ~ मगल
= उच्तिम ० प ५
पारा २०।१२्/ मध्यमः गोचरक्डलिका स
3
६।अ१य२ | अधम. २३1६।१०।११ | शमा ग्रहा | राणद।८।१०११
ग्रहणराह् | फं शनि छक , | ^ युद,
दणसाद | फलं इति | | ३।९।१९ | १।२।३।९।५।|२।५।७।९।११
८1९1 १९१।१२ | विवाहे भन्य
त | ह =
1 = १ छ व चग न् म म्म छनन
५
11||
४/१ ||| 4.४
# णतु #
४१ ०६ | ०९ ११| < ८| १| ५०४ < ष्
९| १९१
१० | 81१० | ८| ७०२११ | दै
३| ९१२९ ष | ३
भूमस्य | चद्ववेष ‡ | दयुक्रस्य
वाम्बेध | बुघ विना | चैद्ध विना | वामवेघ वेध
दितीय' व्यवहार दार ११
[ द्वितीय व्यवदारदवारम् ]
>
सणि तीस गुरू तेरह अद्रारस राहु दिवडु मासु कुजो ।
नुहसिय-रवेगु मासो सिवा दु दिण चंदु रासिदद्रं ॥ १
खड सथं सड छती तिनि बैर्दततर दु-एगर्वनसि ।
तिन्नि वैधीलं गारय(ह) आद कमे उद्यदिणसंखा ॥ २ `
स्वि सो दसणीं नदं वयाधः पच्छिमत्थ दिणा ।
भूमाई तह पुव्बे बुह सिय बत्ती सर्गेत्ैयरी ॥ ३
पणसहि एमैवीसं भौरेसअहियं सयं च बवेन्ना | ए
शंडतीस सयं दियहा वकगया मंगलादइ कमे ॥ 8
॥ इति ग्रहाणां रादि-स्िति-उदया-~ऽस्त-वक्रदिनसंक्चा(ख्या) ॥ `
रवि तिय टरो दसमो चंदो तिय सत्त छ इग दसमो य ।
सियपक्खि दुं पण नवमो गुरु पचम दु नव सत्तम ॥ ५
बुहु दु च खड दह्र कुज सणि ति छ भिगु छ सत्त दसरहिओ ।
राहू तिय दस छद गोयरि सवि गारहा सहया ॥ &
रवि मंगद्यु पतिसंता चंदु सणी निस्सरंत गुरु अते ।
मञ्छगया बुह सुका सुह-असुह फं पयच्छति ॥ ७
बुहुं विजा-गम॒णि सिओ सणि दिक्खा गुरु विवाहि जुदिः कुजो ।
निवदंसण॑मि सूरो सव्वसुकजे बली चंदो ॥ ८ |
नव सत्त पंच बीओ दिवाययोऽ सरणुरू य ति छ दहमो ।
एए जहूत्तपूहय हवति सुपसन्न वीवहे ॥ ९ `
॥ इति जन्मरारितो अरहाणां गोचरः ॥
गहणे रासीओ जानिय रासी ति चड अह गार सुहा ।
पण नव दहुःऽत मेच्छिम, छं सत्त इग दनि अद््जहमा 1 १०. ` `
४ ;' ` ॥ इति ग्रहणरारदिफलम् ॥
१२ ठद्ुरफेरूविरचित ज्योतिपसार
चद्व सियपक्े कसिणे तारावठं सुरिक्लाओ ।
श्वर 8 नैवु्तिम दै इेगई मन्दिमा तिं पर्णं स्तैऽह्मा ॥ ११
॥ इति ताराचरं जन्मनक्षचात् ॥
जो गहु मोयरि अवलो तस्समयुहमंकि जद गदो कोद ।
हृद वामवेहि घ गदो अय॒हो वि खहस्स फट देद ॥ १२
रवि सणि विणु सणि रवि व्रि चंद बिणा बुद्ध बह विणा चंदो |
अयुैक समघुर्हके सेसस्स गहाण वेहयुद्या ॥ १३
गारह तिय दह् छ सहो पण नव चउरंतिमो रवी अयु ।
सणि कुज ति गार छ सुहा अघुहतिम पंचमा नवमा ॥ १४
सचेग छ इच्छारस दृह् तिय चंदो घुर्हकरो भणिभो ।
दु पणतिमऽह चड नब असुदरो वामवेहंमि ॥ १५
दु चर छ अड दृह् गारस उणे बुद्धो महावी हौड ।
प्रण ति नवेगडटते अहो विय होइ नायन्चो !॥ १६
वी इ्छारसमो मव पचम सत्तमो य विदिकरो |
वारऽह वह् चरत्यो तद्रजो य असुंदये जीओ ॥ १७
सको इगाद जा पण अह्र नविकार अंतिमो सुहओ ।
अड सक्तिग दहु नव पण इच्छारस छ तिय विदः सुह ॥ १८
॥ इति छयोदिगरहाणां जन्मराहितो वामवेधः, फलाफलम् ॥
पव्वऽगी जमै नेट पच्छ वायश्च उर्रर्साणं ।
इय उद्दिसा सुकमं पायालाऽयाससहिय दसं ॥ १९
॥ इति दिसाकषमम् ॥
सिरि हदि केः य सुर्यो वैरि हिद भाहि ग्ड जै १९ ।
तितिदुदुदु प्ण इगेर्गं दु छ रवि रिक्खा उ गण सुकमे ॥ २
द्वितीय व्यवहार दवार १२
एयस्स फठं कमसो सिरि मियहीर सुैड प्रसं । `
चोरी सर रहुतद्टो तिथरत्त विदे अप्प ॥ २१
| इति रविनक्षचाद् रविचक्तम् ॥
मुहि दाहिणैकर पर वामकरे हिय सिरे नयं शुज्छे
इग च छ चं पणं ति दुं दु सणि नक्खत्ताड सुकमेणं ॥ २२
रोयं' लाद बिदेसं ब॑धर्णं खाहं च पूयं सुहं मिन ।
भणिया एड गुणागुण गणिज् ता जाव नियरिक्खं ॥ २३
॥ इति रानिचक्रम् ॥
च सिरि" चं दाहिणकरि कठि पण हियं छ पार्यं वामकरे"
च, ति नयणि ` गुररिक्खा पय वामकरं वज्नि सेस सुहा ॥ २४ .
॥ इति गरक ॥
तम रिक्ु मुहि ति फुष्टिं चर फरछि्ये ति अहठँ ति ज्चिय गुडिक्छ
तिय रायस तियं तामस चर स्ह तिय अर्यह तमचर्क ॥ २५
फुद्धिय फएटिए खहं अषा(खा)णि ठच्छी सहं च सहि रिक्ते ।
स॒ह ` हरु ञ्जडिय रायस तामस असहे य असुहतमं ॥ २६
॥ राहनक्षत्राद् गणनीयम् ॥
राहतजुचकं-पुव्वौ बायव्वौ बिय दाहि ईसार्णे पच्छिमैऽम्गीः.य ।
उन्तैर.नेरद सुकमे चरघडियं राहु दिणमाणं ॥ २७
॥ इति राह दिनचक्रस् ॥
पुव्चुत्तरऽग्गिनेरई दाहिण पच्छिम्म वायवीसाणे ।
सियपडिवयाइ जोदणि कमि संमह दाहिणे वज्ञ ॥ २८
॥ इति योगिनीचक्रम् ॥
कसिणे सत्तमि चउदसि दिण मदा दसमि तीय रयणीषए ।
सिय पुन्निमटदियहे चरउयिथि इक्षारसी य निसे ॥ २९
१४ उद्ुरफेरूविरचित ज्योतिपसार
पण घडिय धणह्राऽऽदइम -भयकरी दह दुवारसंतकरी ।
विद्री तियघडियंतिम, धण-कणययु्हैकरी जाण ॥ ३० न.
म्भ वरु भणि तिहि" वेर्यो दई रुद ति पुन्वयाई् अद्र दिसे ।
पठमपहराई मदा .पि्टि खहा संसदा असहा ॥ ३१ -
॥ इति .भद्राचक्रम्॥ ¦` `
गिभ सत्तभायं पण द॑ह तिहि तीस तिहि दिक कमे
इय दिण संख चा उ ]दिि सिर पुंछ सम॑कि वच्छटिद ॥ ३९
॥
रविचनर कोष्ठम् ' ' शनिचक्र कोष्ठकम्
६ ३. | श्रीपति” । 11 | रेग
सखे ~" मिष्टमोजनि ४, | लमि; ^
कथे २ | स्कंधपति ६ˆ | विदेश
शुजो ^“ |।, 1२. 1 पर्देसी ४ | व॑घन।:
हस्तयो. २ | तस्कर ष्
4 ५ || हैश्वरः ३
नाभिः, । ^ १८ थस्पतुष् २-
ख्ये ^ १९ । सीरत (3
जाञुभ्या || 2; | विदेख ¦
पादयो
शनिनक्षचात् गणनीयम् 1
जाव जन्मरिक्चम्। शानिचक्रम् ।-
` | सुख नक्षत्र ,
पुष्फित नसवर
फलित नक्षत्र
अफलित नक्षत्र
छडितं नक्षत्र...
यि न्न "£ |
राजसः नक्षत्र, ।
तामस नक्षत्र
द्रुम सक्चश्र
र
4
१
23 गणनीयम् ॥
जाव जन्मनफक्तम् ।
#
॥॥
- दिती व्यवरास् दार
राहघडीचक्र कोष्ठकम् तिथियोगिनीचक्र कोष्ठकम् ।
हैशा पूर्वै अधि ईला | ` पूव २ । ` आ्ेय
१६ |. ४ २९ ८ १९।९ | २।९१
उत्त राह घडी । दक्षिण उत्त | तिथियो- | `र्दक्षिण
२८ चक्रम् १२ २१० | गिनी चक्रं | . "५९२
वायु पश्चिम | नैकलय वायु पश्चिम | नैक
२० ३२ | ७१५ |` ६९४ -. | -४।१२.
भद्राचक्र कोष्ठकम् । "क
पूवै | आश्र | दक्षिण | नेश्षल ३ वायव्य | उत्तर । ईशान
शङ्के | छृष्णे | शै | शङ्क | छष्णे | शङ्खे. | इष्णे. |.
दिवां | दिवा | दिवा | दिवा | रारि | रा्चि- | रान्न | संचि |
१४८ ८ ७ श्ण 1 १० १९... 1
प्रहर ९| प्रदर | प्रहरे | प्रह | प्रह ५ | प्रह ६ | प्रह ७ | प्रह <| ,
॥ इति भद्राचक्रं सन्मुखं वज प्रहरमाने ॥ -
वत्सचक्त कोष्टकम् ।. । `
भिगु सणि तञ सत्तु खे, तञ च॑दे, ब॒हु ङुजे, ससी बुद्धे ।.
बुह भिु जीवे, सुकरे रवि ससी, मंदे रविदु कुजा ॥ २३४
चमर मित्तसूरे,बुरचंदिःरचंगु भूमि सुर बुदधे।
चमररारिसबुसिषु, बु ख॒ मंदे, मित्त.सेस समा॥इ५् . ~
॥ इति राद्मिन्नौदासीनाः ॥
शद छक्षरपेरूविरचित ज्योतिपसार
४ ॥ शशवु-मिने-उदासीन म्रदकोषठकम् ।
मेस विस मयर कने कके मीणे वले य मिहे य ।
सुराई कमेणुचा नीचा उच्वा उ सत्तमगा ॥ ३६
1 इति उचनीचौ ॥
सवणऽद पुस्पु रोहिणि ति-उत्तरा सय धणिट् उड़खहा ।
रायाभिसेय मंदिर छत्तारंवाईं कायव्वा 1 ३७
भरणिऽसकेस ति-पुव्वा मरू म वि किन्ती अहोमुहा रिक्खा 1
नीम्ब सर चूव वावी पकीरए भूमिखणणाई ॥ ३८
चित्त अणु जिह रेवद् मिय कर पुण साई अर्स तिरियमुहा ।
गय दुर्य करह् दमणं जत सगड अरहटं कुजा ॥ ३९
# इति ऊर्ध्व॑ुख -अधोषुख - पार््वख्चखा नक्षचाः ॥
भ्रूसस्सा ह् ति-पुव्वा मिय धण सवणऽद चित्त असङेसा ।
पुस्छु पुणऽस्सिणि शर बुह् ससि रवि भिर इय सुहा विल्वा ॥ ४०
॥ विद्यारमे चरे्टाः ॥
धण पुण रोहिणि रेवद ति-उत्तरा पुरसु पच हत्थाई ।
अस्सिणि बुद-युरयु्छ वत्थाटंकारि पुरिसयुद्य ॥ ४१
हत्याइ पंच रेद् धणिटध अस्तिणि युरऽक भियुवारे ।
चृडाइकणयरयणं वत्थं पहिरेइ नारिवरा ॥ ४२
॥ इति पुरुषस्तरियो वस््रांकारे प्रधानाः ॥
पाणिगहूणाड गमणं टम त्ष य चमे वरिसे ।
र सुक चंद सखे बिवादरूग्गो व मेरूग्मो ॥ ४३ ` +,
रोहिणि मूर ति-उत्तर मह् मिय कर चित्त पुसयु धणे -साई । , |
खहवारे नंवबहुया ुगिहिपनिद्ा वड् सुह्या ॥ ४ , , 1
२ नृतेनवहश्दपवेसे ज्यु .मदिननस्चत्ः ॥
द्वितीय व्यवहार दार १७
कित्तिय भरणि सलेसा पुणव्वसू चित्त सवण मूर महा ।
अदा पुस्सो य तहा न कुणड न्हाणं पसू य तिया ॥ १
॥ प्रसूताखीखने एते नक्षच्ना निषेधाः ॥
पचग धणिट्रगाई जा रेवद् पंचरिक्ख ताव धुवं ।
द्क्खिणदिसे न गम्मद् न कटर - तिणगहण गिहुकछाया ॥ ४६
हत्थ -सवणाई तिय तिय अणुहार(राह)स्सिणि अभीह मिय मूं ।
पुस्पु पुणव्वञ्च रेवद सुहया गुर चंद भेसिजे ॥ ४७ |
॥ इति मैखजे(षञ्ये ) ॥
जे इच्छंति सुसहरं नववहूय सबा गुव्िणी ते वि ।
न हु गच्छंति पएणं दाहिण तह संहे सुक्छे ॥ ४८
दुक्रार -देसभंगे रायभए् इक नयरि वीवाहे ।
जे तिय तिवार आगय ताणं सुक्को न हन्ने ॥ ४९
पोटतिय सुक दाहिण आगच्छ संमुहं च वलेद ।
कन्नअ चेय तवस्सिणी दाहिण-समृहौ न दृसेइ ॥ ५० -
॥ इति छक्रफलम् ॥ |
सिघद्धिय जइ जीवे महभुत्तं होड अहव रवि - मेसे ।
ता कुणहू निष्विसंकं पाणिग्गहणाई कन्नाणं ॥ ५१
॥ इति मते यरसिघस्यफलम् ॥
जो कल््॒ जेण रिक्खे भणि सो तस्स महति कायव्वो ।
दिण-निसि पनरसमं सो जं हह तं मुहुतपरिमाणो ॥ ५२
अद ओहि मि(चिफं मर्ह घरण पुत्र -साढ ऽभीई योहिणियौ ।
जिं विक्॑ह शर सयं पुत्र -फर्शुं दिणमुहुता ॥ ५३
रयणिसुहुत्तं अदा पुव्वामदाद अट्ं नक्खत्ता ।
पणव पुरं सवरणं करं चिरत सह य पन्नरसा ॥ ५४
॥ इति दिन-राचरिजुह्तनाम ॥
१८ उ्रफेरूविरचित ज्योतिपसार
मूट मिय सवण, हतं पुस्खु पुणव्वद कुज - ऽक -युरुषारे ।
घणपक्खि सुद्धदियहे सी्मतयउ्चयं कुजा ॥ ५५
॥ सीमंतोन्नयनम् ॥
सवणाई तिनि इत्थं रेवदर अणुराहं सद अस्तिणिया ।
प्सु पणव्वुऽमीई ति-उत्तरा ख॒हदिणे चंदे ॥ ५६ `
नामक[र]ण - ऽ्नपास्ण नयणेजण जायकम्म वयवंधं 1
सिप्पाद् चूडकरणं तणुभसणमाद् कायव्वं ॥ ५७
॥ उति नामकरण - अच्प्रास्रन - चूडाकरणं च ॥
कर सवण चित्त रेवद् रोहिणि अणुराह पुस्ख॒ जिट्धा य |
अस्सिणि पुणनव्वसे वि य करिज सिघुकचवेह खहा ॥ ५८
पुस्सु पुणव्चघु रोहिणि ति -उत्तरेहि ऊुखंभवत्याद ।
जत्तेण परिहरिजहु जइ वटु सुपदसोहग्गं ॥ ५९
॥ इति कुस भवस््रे निपेधः ॥
रोहिणि प्यहादैणं अंधय काणं च चिष्यडं अमरं ।
सयरुदसुद्ि॒न्नं गयवत्थ कमेण उवएुसं ॥ ६०
>
त
॥। इति श्री चन्द्राइज - ठकरुरफेरू - विरचिते ज्योतिषसारे व्यवहारद्वारं
द्वितीयं समाप्तम् ॥ २॥
----~¬.६<-
[ चती गणितपदद्धारम् 1 ]
उन्ञेणि दाहिणुत्तर जत्थ ठिए सहस कीरए रग्गो ।
तत्थंतरस्स जोयण पच उण रसेहि जं पत्तं ॥ १
वि- ४५ उन्तर पिंडे हीणस्नयं दाहिणुत्तरे कमसो ।
ससि -वेर्थं भाई रुदं अंयुरु -पडि्जगुं ञं च ॥ २
ततीय गणितपद् द्वार । १९
रवि" अंगु संकस्स य विसव च्छाया तं च मेस -तुटे ।
अयणं सूणदिणेहि जहिच्छद्वाणस्स नायव्वं ॥ ३
॥ इति विषवच्छाया ॥
एगृणं सयं पणस ईदसेहि विसवच्छायहयं ।
सोर्खह धस रम फलं सदेसचरखंडियपङाईं ॥ ४
॥ चरखंडिकानयनम् ॥
वसु रिश्च नंद - व -कर ति- दैसण तिय -रदतैः नंद - गतीं ।
वैक - रिक्खं चरखंडिय कयुक्मे रिणधणं कुजा ॥ ५
मेसाइ कमि उवक्छमि इच्छियटाणस्स रूगपरसंखा ।
भणियं च अओ वुच्छं तकाय जं फुडं रग्गं ॥ &
॥ लय्नानयनम् ॥ स्थापना लिख्यते-
द ठीरी जोजन ७४| आसी जोजन ८१ | छञ्चप्रमाणं परसंख्या ।
२९९ विषवच्छाय १३ विषम च्छाया अगुरु
३ त अगु ६ ६ दीरी सं° | आसी सं°
६ व ३९. मेषु २९४ | २१२ मीच
२२ ॥: चरखंडिक चरखंडिका तृषु २४७ २८० कुभ
२९९ 1 दद मिथु २०९१९ | ३०९१ मकर
० ध सिंधु २५९ | २५३ चश्चि
परमदिनं परमदिने कल्या २४२ | २५४ तुख
रऽ २९४ चऽ २४
प० ३६ प० ४४
धण - मिहुणगए् सूरे जित्तिय भोयंसि किरइ संकपहा ।
तित्तिय अयणंस धुवं अनि पवाहिय इमं जाण ॥ ७
११०८९ र ( (| रुदसहिः पै *
पण-ख -्दूण सगं सष्िफल य अयणंसा |
ते सूरे दायव्वा रगे कंती चराणयणे ॥ ८
॥ इद्ययननांराः ॥
२२ उद्धरफेरूषिरचित ज्योतिपसार
्रत्तेशीरसठाणे संठिय पिक्खंति पुन्नदिद्धं गहा ।
रग्गं गहाण दद्र गणि वामं विणा राह ॥ २७
अचर पुनः केचिदेवमाहः-
दो वारहंधा थ छहद्र पाओ, दद्र य अर तिय गारसाभो ।
पंचो नवं ठाण गहाण पणं, चरर्किंद दिष्टी पर(रि)पुन्न नूणं ॥ २८
अथवा-
तिय दसममो य मंदो तिकोणगो ५।९ जीओं अह-च भूमो ।
सुच्छ-रवी बुद् -चंदा पुनं पिक्खति जायाओ ॥ २९
॥ इति ग्रहाणां टटिः ॥
जा तिय ता न विकप्पं तियहिय किदं खडाउ हीछिल्ना ।
खड़ खडहियाउ हीणा नवहिय वका सोहि सुजं ॥ ३०
॥ इति जम् ॥
चरखंडपिडविडणं ख -# रधं तीरैः जुत्त परमदिणं ।
कक्रयणं सूणदिणे निसिद्धः दिणमाणु मिस्य भवे ॥ ३१
॥ इति परमदिन-मिभ्रौ ॥
अयणंसजुत्तसूरं ुजकंमं करिवि सेस जं रासी ।
तं चरखंडियसुत्ते सुज्रेहि गुणिज् अंस कला ॥ ३२
हरिऊण तीसि भायं रुप जुत्त मुत्त खंडिचरं ।
ते पनरहिजुय हीणं अज वतु कमि विडण दिणरयणि ॥ ३३
1] इति दिनि -रा्िमानम् ॥
परमदिणाओ हीणं इच्छिपय दिणमाणु सेस सचिहयं ।
पच फ वारसंशै संकरस दिणद्धङाय धुवं ॥ ३४ ,
॥ इति मध्याहुच्छाया ॥
1 4
चतुर्थं खञ्रद्वार ` यद
जा जहि काले छाया दिणद्कछाया वि हीण संकजुया |
दिणमाणं छ चं गुणतेण फर दिवसगयसेसं ॥ ३५
॥ गतदहोषदिनम् ॥
द्वसद्धं संक्रैलयं गयघडियफठेण मञ्छायजुयं ।
संदरूणै सेसअंगुर जहिच्छकारस्स छायवरं ॥ ३९
॥ इति इष्टच्छाया ॥
संकपदहावग्गजुयं तस्स पए कंनु कन्नवग्गाओ ।
सोहेवि संकवग्गं सेसस्स पए हवद् छाया ॥ ३७
। ॥ कर्णच्छाया ॥
वासरथुत्त घडी पट संपद तिहि वार रिक्ख जोयजुयं ।
तं तक्वाछियवारं तिहिरिक्खं जोय जाणेह् ॥ ३८
॥ तिथ्यादितक्छाटिक योग ॥
॥ इति परमजैन श्री चन्द्राङ्गज - ठक्रुरफेरू - विरचिते ज्योतिषसारे
गणित्रपद ततीयं द्वारं समाप्तम् ॥
[ चतुथे लघ्रद्वारम् ]
गुरखित्तगए सूरे रविखित्ते जीड गुर-रविष्िं गिहे ।
सुष्छे य सुरगुरे वा बङे उड य अत्थमिए ॥ १
तिनि दह दियह बाले पक्खं पण दियह भिगु सुए बु ।
पुव्वावरसुकमेणं तिदिण गुरू बार पण बुद्धे ॥ २
हरिसयण अहियमासे रवि -ससिगहणाड जाव सत्त दिणा ।
संकंति पटम अग्गिम इय ति दिण दिणत्तयारए ॥ ३
जिह्रस्स जि्मासे वद्धि वितिपाय विद्ध ससि नटे ।
न हुं खम्गं दायव्वं जम्मदिणे जम्मभे मासे ॥ 8
॥ इति वर्षं - मासादिनिषेधः ॥
1 टज्करफैरूचिरचित ज्योत्तिपसार
रतो पथं वेह जु जामित्तं गर्ग प्प्गेहं ।
इकगगर्ट दिणदोसा चय दक्ख पद ववाहे ॥ ५
॥ चकम् ॥
पंचु्रेहा पण तिरिय रेहा, पत्तेय चरक्रूणिहि विनि रेहा |
वामस्स करूणग्गहि वीयरेहा, कित्तीयमाईं सुणि छत्तवेहा ॥ ६
॥ पंचरलाकाचक्रम् ॥ ^
रवि ˆ कुज - गुर -सणिकमसो वारह् ति छ अद्ध पुरउ. छतं ति ।
पुनिम ससि बुह भिगु तम पच्छा वावीस सत्त पंच नवं ॥ ७
वितत्रं भयजणणे मरणं कहं च वंधुनासयरं' } ,
कजलविणौसं गमधं मरणं सूरादरत्तफरं ॥ ८, ` , ,
॥ इति लाततः ॥
मह् चित्ता अस्लेसा रेव अणुराहं सवण इय पाओ । `
रविरिक्खाओ ठविजइ अस्सिणिमारईणि जोदजा ॥ ९
॥ इति पातम् । वञ्जपातकरम् ॥
ससिहरनक्खत्ताओ जई ह्र गह इक रेह बीयदिते ।
ता जाणिजहु वेह परिहरिय्ं ज भणियं ॥ १ ० ~,
रवि - कुजवेहे विहवा बुहि वंद्चा मिरु अउत्त सणि दासी.
शुरवेहेण तवस्सिणी बविखासिणी रादवेहेणं ॥ ११, , , ;
उत्तरसादंतपए सवणाइमघडिय चारि" अव्मीई ] , , ,,.
तत्थद्धिर गहेणं इप्पलड रोहिणीभेयं ॥ १२ ,
परिहरिवि विद्धपायं करिजे कजं असंकियं नूणं | ।' , , ,
सप्पस्स दह अंयुिषेए ता, हव कत्य, विसं ॥ १३
\ ॥ इति वेधः ॥
- चतुर्थं व्यवहार द्वार २५
व ®>
सणि सुक्र राह के रवि ऊुज रासिक्ति चंदसहिय जुई ।
बुध - विहप्पदसहियं न हवद कल्थेव जुदरदोसं ॥ १४
॥ इति युतिः ॥
छमगससि जो नवंसगु जामित्तनवंसगौ य जेण गह ।
चटवन्न जाव सदः उव॑रे जामित्त जुडदोसं ॥ १५
ससि रूग सत्तमो जई कूरगहो त च चयहुं जामित्त ।
जल्थुभयदिसे क्रा चंदे अह रुग्गि गरूगहयं ॥ १६
॥ इति यामिच्र-गलग्रदहो द्रौ ॥
रविरिक्खाड उवग्गह बजह पंचद्र चउ दसशद्धारं ।'
उणवीसं वावीसं तेवीसदमं च चरवीसं ॥ ˆ१७
विलस सू असंणी केर्डं वलं कंपं निग्ारय ।
इय नाम फटं कमसो अदैव उकग्गहाणं च ॥ १८
॥ इति उपग्रहः ॥
एरुड़ तिरिय तेरस रेदाचकमि विसमजोगिक्तं ।
समं जए अडवीसं तयद तुं च सिररिक्खं ॥ १९
सिररिक्खाड कमेणं अदट्धावीसं ठविज नक्खत्ता ।
जह् इवि रेह रवि -ससि इकर्गद्यु तं वियाणाहि ॥ २०
॥ इति इक्ग्गल । इति रत्तयादिदोसाः ॥
सणि पवणु अंसु पायं बुह गुर कण्ट कुजऽग्गि रवि रत्तं ।
सुक्केण य संतावं अहिचक्े कित्तियाइ् ससिनाडि ॥ २१
॥ इति अहिचक्रदोषः ॥
उदयाओ गय रूग्गं संकं तीभुत्तदियह जुयसेयं ।
ते पंचहा ठवेडं तिहि रवि दहं ऽदं रणि" सहियं ॥ २२
नवसेसं जत्थ पर्ण तत्थ फं कहं अगिं रायभरयः ।
चोरभयं" मिच्ु' कमे पट - विवाहे य ताऽरिटरं ॥ २३
1 इति बुधर्पचकदोषः ॥
क उकर्रुविरचित ज्योतिपसार
सवण धणि् विसाहा दक्खिण अवरेण सूल पुस्सो य ।
कर पुव्वफग्यु उत्तर पु्वे पुव्वुत्तरासाढा ॥ ४४
सोम -सणी पुव्वदिसे शुरु दाहिण पच्छिमेण सुक्र -रवी ।
उत्तर बुह् -भूमो विय गमणे वल्ञेद दिगस ॥ ४५
॥ इति नक्षच्नवार - दिक्ञलम् ॥
किन्तीठ सत्त सत्त य पुव्वाई चउदिसेहिं परिघठिई ।
अग्गी वायव कोणे रेहा उद्टुधि न चछिजा ॥ ४६
॥ इति परिघचक्रम् ॥
पुव्वाद्दसदिसेहिं कमेण सियपडिवयाई हृद पासो ।
तस्सम्मुहो य कारो गमणे दुनि वि ससुहवजा ॥ ४
दिणवारं पुव्वाई कमेण संघारि जत्थ ठाणि सणी ।
कारुं तत्थ वियाणञु तस्संसुहु पा भणि इगे ॥ ४८
॥ काल - पारौ सन्ुखौ व्यौ ॥
जिच य पुव्वमदव रोदिणिया तह य उत्तराकस्गू | `
पुन्वाइ् सुकमि कीखा संसुह गमणे बिवज्निज्ा ॥ ४९
॥ इति कौलाः ॥
धण सीह मेस पुव्वे, विस कना मयर दाहिणे च॑दो \
ठर छम मिहुण अवरे, उत्तर अछि मीण कके य,॥ ५०
वामो चंदो ऽष॒हो निनं, दाहिणोऽहाणिकारमो ।
पिं च अघो चंदो, संहो अदसदरो । ५१
, ॥ इति चंद्रचार ॥
निसि अंतिमदुबडीओ पटर पदर पुव्वयाद् हू सूरो 1
गमणे दाहिण पि्वी पवेसगे वाम पिट्धि स॒हो ॥ ५२
1 इति रविचार ॥
॥॥
चतुथं व्यवहार हार २९
जा नाडी वहइ धुवं तं चरण.ग्गे करेवि चङियव्वं ।
सिज्छति सयटकजं इय रग्गं सयररूगगाणं ॥ ५३
॥ इति इदसचार ॥ ।
पिव पुन्निमाऽवम र्ता तिहि कुर वार भरणिशदा ।
मह कित्ति विसाटुत्तर - ति सङेसा जत्त इय असहा ॥ ५४
सय साद चित्त रोहिणि घण सवण ति - पुव्व मञ्क्िमा जन्त ।
पुण पुस्स मूर रेवद् मिय कर जिटृऽस्सिणीऽणुराह सुहा ॥ ५५
॥ इति अधम - मध्यमोत्तमपरस्थानाः ॥
रवि -कुज ति छह दह् खहे बुह् - गुर - सक्छ खडंत रहिय सुहा ।
इग छ अड ऽतः विणा ससि जनत्ता रुगे ति छायु सणी ॥ ५8
॥ याच्रालय्नम् ॥
दय मंडरीय नरवहू पत्थाणे पच सत्त दह दियहा ।
पचसयघणुहसञ्छ दृह उवरि ठविज् सत्थ -वत्थाईं ॥ ५७
रेवद मूर ति -उत्तर सय साइऽणुराह पुव्वभदधया ।
पुस्स पणव्वघ्ु रोहिणि सवण.स्तिणि हप्थु दिक्खसुहा ॥ १८
॥ तिथिवारनक्षचप्रधानाः ॥
दु पणछरविदुति छससी कुजति छ दह् बुद्धुतिदु छ पण दहमो।
किंद तिकोणे य गुरू सुक्छो तिय छ नव बारसमो ॥ ५९
मदो दु पण छ अडमो सुक विणा सव्व गारा सहया ।
चंदा क्रूर सत्तम अई अयुहा दिक्खसमयंमि ॥ ६०
रवि ति ससि सत्त दहमो बुहेग चर सत्त नव गुरू ति छ दो ।
खको दु पच सणि तिय मज्छिम सेसा अयु सेसा ॥ ६१
॥ इति दीक्षालग्रङ्कडलिका उत्तममध्यमाधमाः ॥
सियपकखि पडिव वीया पचमि दह तेर पुचिमा खया ।
कसिणे पडिव दुं पंचमि विवपदृट्काइ सुहवारा ॥ ६२
३० उकुरफैरूविरचित व्योततिपसार
सवण धणिद्र पुणव्चसु पुस्षु महा मरू साई रोहिणिया ।
ह्यु अणुराह रेवद ति -उत्तरा हरिणि सुपदा ॥ ६२
॥ इति प्रतिष्ठायां तिथिनक्षत्रवारद्युभाः ॥
अथ लद्रम्-
दतिछससीतिछक्रुरा दु छ किंद-तिकोण शुरु पदषसुहा ।
ह् दह् इगाद जा पण इग चड नव दह् सिओ सविकारं ॥द४
। इति उत्तिमा ॥
मज्द्िम रवि कुज पचम दु पण छ मुणिं सुदं छ नव सत्त बु ।
किंद -तिकोणे चंदो दशं पण सणि गुरु तकओं ॥ ६५
॥ मध्यमा ॥
सोमगहद्रम ति सिओ मंगल सूरो ठु अद्र नव किदे |
सणिग दु च नव सत्तम पदट सवि वारहा असहा ॥ ६६
1 अधमा इति पतिषादिनदद्धिः ॥
गणै डि ईसि कमं पंचम धैदरं च जोणिवरं च ।
रासिवरईैणं भावं कन्ना वर -सन्तहा पीई ॥ दारं । ६७
पुस्सु पुणस्सिणि रेवद कर साद्ऽणुराह् मिय सवण देवा ।
भरणि ति - पुव्व ति -उत्तर रोहिणि अद्या य मणुयगणा ॥ ६८
धण चित्त जिद मह सय मूर विसा कित्ति रक्खससङेसा ।
सुकुटुत्तिम नर रक्खस मरणं मज्छिम्म सेसगणा ॥ ६९!
॥ इति देव-मलुक्च ( ष्य- ) राक्षसगणाः ॥
अहिचक्छि अस्सिणाईं वरकन्न म एगनाडि तं वेह ।
कन्ना वरणे असुं हयं गिहसामि -मित्ताई ॥ ७०
॥ इति नाडिवेधः ॥
समरासीओ अम वदरं विसमाओ अह्मे पीर ।
सत्तु खडहय असहं डु वारसं तह य अन्नसुहं ॥ ७२
ध पडा्टक-दु( दि. ्वौदशकौ ॥
९
चतुर्थं व्यवहार द्वार ३१
दुन्ह वग्गंकं ठविडे वरु भाए सेस अगिमो रई ।
बहु काणि मग्गंतो पुरिसो तियपासि सो सहलो ॥ ७२
॥ रिणलस्यवर्मः ॥ `
गरुड मंजर क्षीहे याणे अहि उंद्रेः य मिय मिटे: |
इय अट्रुवग्गजोणी प॑चमटठाणे हयद् वयरं ॥ ७२
॥ इति प॑चमे वैरम् ॥
तर्य गै मे अहि" अहि" सार्णं बिरार च मेस मंजारंः ।
धरखुदरं ध भहिसं वैश्यं महिसी"" य वैश्यं च ॥ ७४
मिथ हरिणं सांणै वनरं निग वीनरो य हरि वरेयं ।
सीरः पैव हिं एवं अस्सिणिमाष्ह्ण जोणिकमं ॥ ७५
॥ नक्षत्राणां जो (यो ) नयः ॥
सीह-गय महिस-ुरयं मूसय॑-मंजार वंनरं-मेसं* ।
अहि-निरेटं पसु-कंग्धं मिय-सतीण विरु अन्नोन्नं ॥ ७६
| ॥ इति योनिवहरं ॥
वर -कन्नरासि सामि य सत्तू असुहया य सेस सुह वरणे ।
इय सत्तभेय पीड भणियः, भणामित्थ वीवाहं ॥ ७७
॥ इति वरणे स्रधा प्रीतिः ॥
अद्ध वरिसेहि गरी, नवि रोहिणि, दसहि कन्न, उवरित्थी ।
एवं जाव गणिजइ्, बार्टवरिसुवरि न गणिजा ॥ ७८
गुर -रवि - ससि रुगगबले गरी सेसा इगेगि रहियकमे ।
इय भणिय सुह विवाहं न विवाहं सत्तवरिसतले ॥ ७९
पच घडी तिहि अंते छह रिक्खंते य ति दिण मासते ।
दुहिय अउत्त विव कमि हयेद तिय पाणिगहणकषएु ॥ ८०
रेवद् मह मिय रोहिणि मूर ति -उत्तरऽपुराह कर साईं ।
बुट् युर सिय ससि वारा पाणिरगहणे सुहा भणिया ॥ ८१
३२ उक्घरफैररूविरयित ज्योतिपलार
अथ लम्रम्-
भिगु सति बिणु सहि (*णि ) ख्ा इग डु चड नवंऽति पच दह सोमा ।
वीवहै ससि बीओ सव्वे तिय गारहा सुहया ॥ <२
बुह - युर - द्रा सणि -सूरु अहृमा सुहय भूम -रवि नवमा ।
वुह् - गुर - सुका अंते करगदणे सयणसुक्खकरा ॥ ८३
भिगु सस्स रवि सुसरो युह दुह रगं पसह सुयठाणं ।
जामित्तवहै भत्ता तियस्स जाणेहु वरमाणो 1 <४
॥ इति विवाहे लग्नम् ॥
अय क्षोरकर्म्पे-
छ्टुऽ्मि नम्बि चउदसि अमावस चउयि विद्धं गडुंते ।
सञ्ञा निसि मञ्छन्हे एए वजेह खुरकम्मे ॥ ८५
पुस्खु पणव्वसु रेवद सवेण धणिट्धा मियऽस्सिणी हत्या ।
चित्त बुह् सोमवार खउरं सुहरुग्मि कायव्वा ॥ ८६
दु पण नवते सोमा सुहपावा असह तिय छ गार सुहा ।
बुह शर सिय कदि खहा ससि दरुरा असह सेस खउरि समा ॥ <७
॥ इति क्चउरकम््मफलाफलम् ॥
रोहिणि महा विसाहा ति -उत्तरा भरणि कित्तियऽणुराहा 1“
इय मुडण छोयकषए इंदो वि न जीवए् वरिसं ॥ <<
॥ इति नक्षश्राः सडन-खोचे वर्खनीयाः ॥
ख॒हरग्गे चंदवङे खणिज नीमा अदोस रिक्खे 1
उदडसुहे नक्खत्त चिणिज्र सुहरुगि चंदवङे ॥ ८९ '` ' `
चित्तऽणुराह् ति -उन्तर रेवद मिय रोहिणी य सय पुस्सो ।
सादर धणिटु सुहंकर गिहप्पवेसे य ठिडसमएु ॥ ९०
चरर ति छ गारसगा सोमा किदे तिकोणगे सुहया.! `
दररऽद्रम अदअसुहा सोमा मञ्छिम गिहारमे ॥ ९१
किंद्ऽमं ति क्रूरा असदा तिय गारहा खहा सवे ।
हय वीया असहा सेख' समा गिहप्वेसे य ॥ ९२. ॥
चतुर्थ व्यवहार दारं ३३. .
सूर गिदहित्थो गिहिणी चंदु धणं स्क सुरुगुरू ुक्ं ।
जो सबलं तस्स भावं सबलं हृद् नस्थि संदेहो ॥ ९१
॥ इति गृहनीम्ब - निवस - प्रवेसे च ॥
चंदबरृहीणदियहे चररग्गि तिकोण किंदि पावगह् ।
तिहि रित्त क्रूर वारे रोयवियुक्छस्स ह्वाण वरं ॥ ९२
॥ इति रोगीरोगविसुक्ते सानदिनम् । इति ऊडङिकालग्रानि ॥
फुडु गोधूखियरग्गं दिणंति दिद दुभाय रविविषे ।
अन्भच्छन्ने जाणसु दुदरतरूपन्तमिरूमाणे ॥ ९३
फु्टति य बह्वी सउणा निख्यस्यि उच्छगा हंति ।
रादसिणि - सिरिस - किद्छिरि - पवाडपन्ता मिरुति गोधूे ॥ ९४
जमि गोधूटियारगे चंदो सत्ती खडःटुमो ।
कुछिओ कंतिसम्मो य, तं च बजेह जन्त ॥ ९९५
रवि-चंदसुत्तरासी पिंड हद जत्थ छ च वारस वा ।
तत्थ कमि कंतिसंमो सणिच्छरंते हवड कुछ ॥ ९६
जइ सव्वदोसरहियं युणबरूसषहियं च रछब्भए लग्गं ।
ता गोधूलिय सुहमवि बहि एकि सया वि वज्िल्ना ॥ ९७
अजापाङ [ य ] गोवाख टदा ब्चीवर कोलिया
जे धरति पुणो तेसि, रगं गोधूटियं वरं ॥ ९८
-॥ इति गोधूिकलम्नम् ॥
आसी सडकुठेख सिद्िकर्सो ठाणे सुकन्नाणष,
तस्संगस्स रुहो सुटछ्रवरो चंदु ब चंदो इह ।
फेरू तत्तणओं य तेण रइयं जोस्ससारं इमं,
दोसत्तऽम्गिग (१३७२) वच्छरे दुगसयं गाह दु चत्ताहियं ॥२४२
~ “५ इति मी च॑द्रांगज ठक्कुरफेरू विरचिते ज्योतिष्कसारे लममससु्य-
दवारं चतुथं समाम् ॥
भ्योतिषसहर गाथा २४२ । व्रंथाप्रं छोक ७१७1 येच ंडछिका सितम् 1
$ उङकरफेरूपिरचित ज्योतिपसार
ज्योतिपसार ग्रन्थनिदि्ानां यच - चक्र - फुण्डलिकादीनां यापना यथा-
२४ तमे पत्रा्के खचित प्चशराका- ५ तमे पतरदध खचितं .
यन््रमिदम्- 'इुकगगखः चक्रमिदम्।
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जन्म ऊंडलिका
२९५ पत्राङ्क सूवितलञ्च-भंगकरङुडजिकायन्रमिदम्।
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¦ | 9
यन्- चक्र -कण्डलिकादि
५,११.१ ११०, ०.१७८० ११०१.१/०० १४१० न.न १8 ११0 (09 (१४११ १/१ ११/०१ 7)
‡
| ५१||
६ | २।४| ६ | १२ १।२|१।२। ३|।३|
१ ३ | ९।१२| ३ | ४९| ४।९| ४।९| & | ६
११ ।५।१० | १९१ |१२५ | १२।५ १२५ १९१ | ११
१ ८ |२३११ ९ (१०।३ | १०३ ९०२
९. ११।६ | ११।६ १९१।६ ६
९८११८१८० ११८१ १ १८१११८१ १८१८ १.०४१.८१८ १५८१-9
विवाह कुडिया
क्षडर क््म॑ङ्कडलिका्यज
2
(१0८१११११ ८०११ 0१/०१ ०१००२०४० (२/० ८११०१६०१ ८१०११ (१.०० ०६८०१०१ ०१०६ ८०१०३०१ ११/०० ००४ ६०३० ०६ ८२/०० ८१.०५८ १५३.)
र |चं|मं| द| द| |स ||
३ | २ | ३ | २।५ २५| स ३ | ३
६ । ५ | € |९।१२।९।१२९।१२् ६ | ६
१९ | ९ | ११ | १४ १४| १।४| ११ | ११
१२ ७1 १०। ७1१० ७1१०
उत्तिम कुडलीं
{५
६५
मध्यम
१/८ ११४ ११ ०११० ०१.०१.० ०१.५८ ०१.०० ०१.०१८ ०१०००००१. १.००१.८१० ०.०० १.५०१.०९० १६.०९८ ०१/५८ ०६.०५८ ००.०० १६.०५०००६५.५०१०६.०५४
©
८
२।६| ८ १; २।६ | २।६
<} १९१ <1१९१। ८११ ८।११
© ॥}
॥
२।५| १ | २।५| ० | ० |
९।१२ ॐ |) १२ ° ©
९।४| ७ | १८४| ० | ० १।७ | १४
७।१०| १० | ७1१० ० © ७1१०| ७1१०
१८ १ १ १८.११८ १८ १०१८ ११८ ८१.५८ १०५८० ५००११ ०.१८१.५०१. 9
©
२।५
९।९२
२८
९।१२्
|
|
©
अधम
©
©
6११0१११० ०१/११ ८१/१०/८१११ ८९०११ ८१०१० ८१०६८ ८२०६८००१
2३७
2८ उक्ुरफेसूविरचित ज्योतिषसार
गृहनीम्पमिनेखप्रनेद शुटलिका
1 चं | मं | च| ६ | छ द्य |स
। ३ |९५०|३ 8 २३
६ द
& |अ७1१० 1६० |51१० ७1१०
११ |९।५ | २११ | रा | ९।५।,९।५ १९१ | ११
२1९१ २।२१।२।२१ ३।११
0 |
मध्यम
९ 1 ८।२ | <८।२
५ 2।९२ |६।१२
९ |<८।२
५ [६१२
० [८१९ <!
अधम ८१ ० |<? | ० ०
४।७ | ० |४।७ | ० ० | ° | ५७ ४५
१०1१२ ° [०१६ ० ० ० ॥१०११२१०।१२
८०२ ० | ० {० | २ २
बीजक विवर्णं ३९
-उ्योतिषसारस्य विवरणम् - द्वार >, गाथा रर्
प्रथमं दिनश्चद्धि दवारं गाथा ४२
गा.२ दारगाथा
„„ २ वार तिथिनामानि।
+ ० नक्ष २८ नामा? 1
,, ० योग २७ नामानि ।
„ ० रासि १२ नामानि ।
गा०१जन्म नक्षत्र वज्रुरा०्| गा० १ योगानां अद्युभ घदीं।
„„ २ यमर्धंट उत्पातादियोग। » १ चंद्रद्ग्धास्तिथयः ॥
५ १ इूख्योगः । » १ सूयदग्धास्तिथयः ।
„२. श्युभवेखा जं । ९ क
„२ कुलिक उपङ्कछिकादि | » ९ कुमारयागः ।
1
९ राजतरूणयोगः । ` '
» ° नक्ष अवकहड चक्रे । | जंज । ॥ „ १ रविजोगः ।
५ ° नक्षत्र राशयः । ‰ १ विजयाहय सुहृत । | ,, १ योगज्यफङं । ,.
>+ ७ वार तिथि नक्षत्र सि०॥|;; १ ्ुवर्ं जच । „ २ यमल पुष्कर । ..
„„ २ विरुद्धयोगः। „ २ छायाख्य्यो जथा } „ २ स्थविस्योग ।
£ (. €
„ १ ककैटसंचत्तंकयोगः । (१ कारूहोराघर। |» १ वार गुण।
पवं गाथा ४२ दिनद्यद्धिद्धार
दितीयं व्यवहास्दारं गाथा ६
गा० ४ ग्रहाणां रारिस्थिति| गा० ९ योगिनी चक्र । गा०२ शुक्र फलाफलं ।
उदयास्तवकदिन । |» ३ भद्रा चत । „ १ गुरु सिहस्थफरं ।
‰ ९ ग्रहगोचर शुद्धि । | + २ वत्सगति चक्र । | ›, ३ दिनराचिमुहततं ॥
+, १ तारावरु जन्मन०।| , २ रा्ुमिजोदासीन । | , १ सीमेतोन्नयन० `
» १ ग्रह गोचर यारि। |, १ उच्चनीचचौ। २ नामकरणमन्प्रा० ।
७ ्रहाणां वामवेध ।
१ दिसाचक्रे जथा ।
२ रविचक्रं जथा।
२ कशानिचकं जथा ।
९ ब्रहस्पति जथा]
२ राहतयु चक ।
९-राहदिन चक्र ।
११
११
११
११
१३
१३
११
३ ऊर्ध्वाधो तियंक् । | „ १ कर्णैवेधदिन। . `
१ विद्यारंभे श्रे । » १ कुखुभवसखनिषे० 1
२ पुरुषखियो व० । %» १ अंधकाणादिनश्चष° 1
२ वधूगहप्रवेशा०। न
९ चियःसखाने वर्जा०।| _
१ पंचक नश्चा । इति विवहारद्वारं
१ सेषज लश्चचः । द्वितीयं । गादा £
(| उज्र्फेरूपिरचित ज्योतिषसार
दंतीयं गणितपदद्धार माथा ३८
गा०३ चिपुचच्छाया 1 गा०४ अ्रदाणा दृष्टि 1
‰ १ चरखंडिभानयनं 1 » १ अरुज कम्म1
9 २ छद्यानयन । » १ परमदिन 1
9 २ अयनांसानयनं 1 + २ दिनसनिमान ।
१ स्फुटस्य, 1 + १ मध्याहच्छाया 1
9, ३ स्फुटद्मानयन। , १ गतटोपदिनं।
* ७ पडवर्गानियनं 1 + १ इष्टच्छाया।
+ ३ चद्वरीउपाय. 1 „ ९ कीच्छाया।
% > उद्यदयुद्धि । „ १ तिथ्यादितकालिक
» १ अस्तय्युद्धि। इति गणितपदं ठंतीय दार । गाथा ३८
चलतु लद्सञुचखयद्वार गाथा १०२
गा०४ वर्पमासखादिनियेच। गा० १४ याजाकुडलिका 1
५१६ ऊच्चापातादिदोप ८1 + प दीक्षाङडछिका ।
१, ९ संदिचकरे नाडीदोप। „+ ५ भ्रतिष्टाकुडलि1
५२ द 1 „+ १८ विवादङुडलि० ।
५३ लपने भगकसण.। + ३ क्षौरकम्मङ्ंड०।
५ १ लभ्नदोपा 1 + १ भुडनखोचकर्म ।
ध क । । ०.५ = 1
विशोष्य १ रोग दिन।
१३ सर्यसामान्यलञ्च । कु द गोधूलिकं ॥
; ५ जन्मकुडलिका। +» १ संपूणकरणे ।
इति खद्चसखसुच्चयद्वार चतुर्थे । गाह १०२
इति श्री चंद्रागजटक्ूरेरूविरचितच्योतिप्कसार द्वार ४, गाहा २४२
सं° वीजकयिवरणम् 1
॥ ॐ नमः सर्वज्ञाय ॥
टक्कुर -फेरू-विरचित
गणित
[णत सार
| ~क त
[ प्रथमोऽध्यायः ।]
नमिऊण तिजयनाहं छच्छीस - गिरीस -सयलट - देवज ।
खेहाण गणणपाडी पुव्वायरिएहि जह् वुत्ता ॥ १
तत्तो व (१ वि) किचि गहियं किंचि वि अणुभूय किंचि सुणिऊणं।
तं सयररोयहेऊ फेरू पणे चंदसुभओ ॥ २
पडिकादणि तह काणि पडिविस्संसा तहेव विस्संसा ।
जावय होति विसोवा वीस उण कमेण नायव्वा ॥ ३
वीसि विसोशहि दम्मो दभ्मिहि पचासि ट॑कञओ इच्छो ।
वीस कम दीह वित्थरि अह कवी सद्धं वीगहभो ॥ ४
पव्वंगुखि चरवीसिहि बत्तीस करंगुखी य विन्नेया ।
अद्ध जवि तिरियगेदं पव्वेगुलु इ जणेह ॥ ५
चरवीसंगुर हत्थो पडिय चहुं हत्थि हवद्र उडु इगो । .
बिहुसहसिदंडि कोसो चहुंकोसिहि जोयणो इको ॥ £
` , इय भियं सरहत्य विक्खंभायाम गुणिय पडहस्थं ।
` . विथारहु उदय गुणं तं घण असं वियाणाहि ॥ ७
चहुं करएुडहि पारं चहुं पाईं एगु माणं भणिञ । . ,,
चहुं माणेहि वि सेई सोख्स सेदं भवे पत्थो ॥ ८
छि गुजि मास हृद् तेहि वि चहु टंक टकिं दसहि परो ।
+~ पठिहि इष्टं सेरो सेरिहि चालीसि इटं मणो ॥ ९
४२
उद्र- फेर -विरचित
जनि सोरुपेहि मासड तेहिवि चहं टंक तोल तिउणो ।
सोहि जवेहि चन्नी वारि वच्ची महाकणञ ॥ १०
सद्धिं पठि एग धडिया घडिया सहीहि एय दिणु-रयणी ।
दिणि स्यणि तीसि मासो वारहि मासंमि वरि इगो ॥ ११
एगं दह सय ससं दसदस खक्ख तहैव दसलक्खं ।
कोडि तह दसकोडी अव्वं दसअव्व जाणेह् ॥ १२
खद तह दसखच्च संखं दससंख पम दसपडमं ।
नीरं तह् दसनीट नीख्सय नीटसहसं च ॥ १३
द्ससदस नीट तद् पुण नीरं रक्खो वि नीर दसलक्खं ।
तह कोडिनीट इच्वाढ सख अंकाहं नामाद्रं ॥ १४
॥ इति २५. गणिताङ्क ॥
परिकम्म पणवीसं तहऽह जाई य अद्र विवहारा +
अहिमारा चरेयं पणयारीसाइ दारा ॥ १५
०११ ५५ 9 ण [कि # ~ + ॥
इच्छाएगि जुयदेः इच्छां गुणियं हवेद संकटियं ॥ १६
१- अथ संकलिततमादह- -
सम दिण दरू मग्ग गुणं विसमं अग्गिमदङेण संगुणियं ।
जं हृ तं सकछियं न संसयं इत्य नायव्वं 1 १७
इच्छा पण्ट्ऽक्खरिहिं गुणिजदः षन्ु मडि पुणु इच्छ दणिञ्दं ।
विडणिहि पण्टिहि भाउ ह्रिजद्् रु्द॑किहि संकटिड कहिलद् ॥ १८
एग्गादईं जाव दस संकछियं पिहरु दस गुणाणं च ।
एशुत्तर बुद्धिकमे भणेह एयाण मूल युणो ॥ १९
संकलियहं युणिगि य तस्स प्यं एगि हीण अद्धेण ।
अह्'त्रिरण वग्गमूले सेस सम संकङियमूं ॥ २०
गणितस्ार - प्रथमाध्याय ४
२, अह(थ) वयवकलितमाद-
~
जह संकलियपपुणं इकिकं एगयाइ बदर ।
तह विमकरिए किद् इकिकं मूटरासीओ ॥ २१
सेम बविमकलियपयं संकलियपयं च कीरए सहि ।
दुन्ह् पय॑तरि गुणियं दटीकयं विमकल्ियसेसं ॥ २२
संकछिय सहस्साभ दसाद् दसन्दसऽहियस्स संकटियं ।
सादेनि भणसु पंडिय जं हद विमकछियसेसंकं ॥ २३
विमकलियसेस सोहि वि संकलियघणार सेस्स बिरणजुयं 1
तस्स पयं सेखसमं तं हइ विमकलियसररूपयं ॥ २४
संकल्ियपयं बिरणं सेगं विमकलियपयविहीणदलं ।
विमकखियजुयं जं हृद तं उवराभ थ विमकछियं ॥ २५
सयसंकलियधणाअो उवराओ तीइ जाम विमकलियं ।
ता किं जाय तं मणि; जद विमकलियं वियाणाहि ॥ २६ `
अथ युणाकारमाद-
ठवि गुन्नरासि हिद्रे कवाडसंधि व उवरि गुणरासी ।
अनुखोम-विरोमगदं गुणि सुकमेण गुणरासी ॥ २७
वीसा सउ बत्तीसिहि नव सइ चसह सत्तवीसेहिं ।
अडहिय सख सद्धिगुणं किं कि पत्तेय 'होति फं ॥ २८
अह गुणरासी खंडिवि इगेग अंकेण गुणवि करि पिंडं ।
परकमि चडति पती छेय करत्रि सुकमि गुणिय पुणो ॥ २९
दुतीक गुणाकार सल्यालीक परिक्ञान-
गुणरासि गुन्नरासी पिह पिह पिंडं नवस्स सेसयुणं ।
तह गुणियरासिपिडं नवसेससमं हवड़ खुद ॥ ३०
खेवसमंखंजोए रासि अविगयक्खं जोडणे हीणे 1
खन्न गुणाणड् सुन्नं सुन्नगणे. सुत्न सुत्रेण ॥ ३१
४४ ज्र फैरः - विरचित
सुस्त य गुणयारं सुत्नस्ष य भागहरं तदा वर्गं ।
सुन्नस्स वग्गमरूखं धणाई भणि जड वियाणासि ॥ ३२
४, अथ भगाह्रमाद- ।
जस्साओ पाडिज् संहरणीओ जु दरद खलि हरे ।
उवरि रहि हारणीयं हि द्र॑सं भवे मायं ॥ ३३
५. अथ वर्गः-
पढम बग्गु ठवियं अवरकमे विडणञद अंके ।
गुणि पुव्वसहिय पुण तह् वग्गजुय ठाणहियवग्गं 1 ३४
जो अं तिणय अंके गुणिज सो वग्गु अहव इच्छ दुहा ।
दद्रूण जुय गुणेविणु तदिट्वग्गहिय इय वर्गे ॥ ३५
एगाद् नर्वताणं सोखस चरउवीस अद्भवीसाण ।
पत्तेय वम्गरासी जं जायद्र तं भणह सिग्घं ॥ २६
६. अथ वर्भसूलमाद्-
जं हवदर वग्गरासी तस्संताओ गणिज जाव धुरं 1
विसम -सम - विसमद्ाणे वर्गे साहेवि मूखकं ॥ ३७
विउणु करि चालि भायं फल्पंती तस्स वग्गि सोहि पुणो ।
पुव्वविहि जाव चरिमं विडण तमद्धिय मूलं ॥ ३८
७. अथ घनमादट्-
धुरि्मकषणं टाविय तस्सेब धुरक वग्यु तिहु युणियं ।
वीयके गणिउणं ठटाणाहिय सुकमि जोडिव्ना ॥ ३९
पुणु वीय अंकवग्गं शुरिमकिहि गुणिवि तिडण करि जुत्तं ।
पुणु तस्स य अंसस्स य वणं करिवि सिय धणमेयं ॥ ४०
इच्छिय अजु तिहा ठि उवरुप्परि गुणिय जं हवड् स धणो ।
अग्मि युच्चकि हयं तिडण पुव्ववणजुयसेसं ॥ ४१
ध
॥
गणितसार - प्रथमाध्याय
एगाई जाव नवं तह सोर दुसय प॑चवीसाण ।
तिनि सय नवऽहियाणं पत्तेयं किं हवेद घणं ॥ ४२
८. अथ घनमूरंमाद-
घणपय दोअ घणपए घणपयमायं घणेण पाडिल्ं ।
तं ठकं मूलं चारिवि तदेयंकतलि दिना ॥ ४३
तवण्यु तिरण्यु तस्तेव पच्छएु धरिवि भाउ पाडिल्वा ।
लद्धं पति ठविल्नड् हरकविगमो य कायव्वो ॥ 8४
पतिस्स अंकवम्गं तिरणं पुव्वकि गुणिवि सोषहिजा ।
अंति पयस्स घणं पण सोहिय तं कृ पुण एवं ॥ ४५
९. अथ असिन्नपरिकमाषटकमाह-
भिच्चकु इम ठविजई् रू(ऊ)वरि असस्स मग्ध छेयतटे ।
हीणसे विदुःचयं अच्छेयं जत्थ तत्थेगं ॥ ४६
छेय हय रूवरा्ली अंसा जुय गय सवंनणं हवद्र ।
अन्नोन्चछेयगुणिया हवति कमि सदिसछेयंसा ॥ ४७
सदिसच्छेय केरेविणु ता कीरद् जोड हीण अंसाणं |
न हवइ् छेयाण जुद्रे कयावि इय सणिय स्थेहिं ॥ ४८
छेयंके विरण कए उवरिमरासी हवेडइ अद्धीय |
सव्वेवि पायरेहिं भिन्नटिदं एस नायतव्वा ॥ ४९
१०. अथ भिन्नसंकटितमाद-
सदिसच्छेयसजुदं छेएण विहृत्त भिन्नसंकङियं |
ति छ पण नवस पिडं तह् पठण ति दिउट सतिहायं ॥ ५०
आदायस्स वयस्स य सवंनणं करवि सदिसङेय पुणो ।
पिहु पिह अंसाण जु तयंतरे भिन्न विमकलियं ॥ ५१
अद्ध. तिहाय खडंसा नवसु अट्टा सोहि कि सेसं ।
सङ्क तिथ. पेच सतिहा नवंस खडसार सोहिजा ॥ ५२
(9
४६ उक्कुर- फेर - विरचित
११. अथ भिन्नखुणाकारमाद-
अंसेण अंसगुणियं छेएण वि छेय युणिवि हरियव्वं ।
जं हबद् र्डमंकं तं जाणह् भिन्नरुणयारं ॥ ५३
पाऊण पच दम्मा गुणिज् सतिदाय अह्र दम्मेहिं ।
अददः खडंसि गुणिय पिहुं पिह कि हव तस्स फलं ॥ ५४
१२. अथ भिन्नमागादरमादह-
करिऊण छेय अंसा हरस्स विवरीय न हारणीयस्स ।
पुव्वविहि शुणि विभायं एस विही भिन्नभायस्स ॥ ५५
अड्ादृएदहि भायं हरि्ए परणसत्तद्म्मेहिं ।
चटु सतिहाई विदत्तं सवा छ किं ताण रद फर ॥ ५६
१६. अथ भिच्नवर्ममाद्-
अंसाण वग्गरासी हिद्िम छेयाण वग्गमाएण ।
पाडेवि जं जि छद ते जाण {हु | भिन्नवग्गफरं ॥ ५७
अड्कादयस्स वम्गं सतिह्ा पंचस्स पठणसत्तस्स ।
भणि अद्ध तिहाय पुणो जद वग्गविही वियाणासि ॥ ५८
१९ अजथ भिन्नवर्ममूलमाद- ।
असस्स वम्गमूरे छेयणमलेण माड पाडिल्ा ।
विसम-सम-विसमकरणे हद् सूरं भिन्नवग्गर्स ॥ ५९
९५ अथ भिन्नघनमाट- [
असस्स धणं कुजा छेयस्स घणाण माड हरिऊणं ।
ज किंपि तत्थ रु भिन्नवणं तं वियाणाहि ॥ ६०
सडय-सत्तरस घण सवाय पनरस पा तिहायस्स ।
सं जयद् वणरासी पत्तेयं तं भणिजासु ॥ ६२
पुणु पथिन्रचणमूलमाट-
इच्छिय असे छेयणघण सूरमाउ पाडिल्ना |
अगि पुच्वकणषएु इय करणे वद षणमूटं ॥ ६२ ,
गणितसार - प्रथमाध्याय
(५
# <)
१७. अथ चैरासिकमाद-
आइ अंतेकजाईं ठविलज्ए अन्नजादमञ्स्ेण ।
अतेण मञ्छि गुणियं आदमभागं तिरासियगं ॥ €
जा इच्छारस द॑मिहि दौसिय कर सत्त कप्पडो होड ।
ता चरवीसिषहि दम्मिहि कड हत्थ हवंति ते कसु ॥ ६४
भणि हव नाणवटं नव मंद खटति दम्म पणवीसं .।
दय .अग्घपमाणेणं सोरूस मुंदाण कई मुष्टं ॥ ६५
च॑दण परं सवायं सतिहा नव दस्म मुहु पावे ।
ता छ पर खडंसूणा कित्तिय दम्मं पावंति ॥ ६६
द्म्मि सवा सत्तहि ` पिप्प दइ सेर छट्रसंसऽदहिया ।
कन्मद् ता-नव दम्मिहि तिह्यय उणेहिं किं. हवई ॥ ६७
पाठणवीसा सहि दम्मिहि सतिदहाय पंच पत्था य । `
ता तंदुखाई अन्नं कद् रन्मड इक दम्मेण ॥ ६<
बारहवन्नी कण सतिहा सय द्म्मि तोल इच्छो ।
जद हु त दकि मासय दसंसहीणस्स कंद सुटो ॥ ६९ ` `
जद जोयणच्टरंसं प॑सुल्म चख्ड सत्त दिवसेहिं । ` `
ता स्ट जोयणादं कित्ति कारेण गच्छेद ॥७० - `
अंगुटसत्तंसो जद दिणस्स छ्सि कीडञो चट । |
गच्छि अट्रजोयण नियत्तदरं केण काटेण ॥ ७१
अथ पचरासिकमाद-; ख्नवेकादछयस्िको थ (१ )"-
दिद्धिम फर्क. विवरिय पिह पि कमि दौ वि पक्ख गुणिऊणं
थोवेक-रासिभायं पण सत्त नवाह रासीणं ॥ ७२ ि
१८. अथ पचरािकमादट-
मासेण पैचगसए वरिते 5. मकं हक ।
अह्. नो नजद् कारं.फर = । धणं ॥ ७. :
८
उक्र केरू- विरचित
मासे तिहाय उणे ससए दिवु दम्भ ववहारो ।
ता सतरदि पाणिं सवायनवमास किं हवद् ॥ ७४ `
सहृट्र मणं माड जोयण सतिहाद द्म्म पडणदुए् ।
ता नव सवा मणाणं कि हद दस जोयणे पडणे ॥ ७५
जद वारस कम्मयरा चहु दिवसिहि तीस दम्म पावंति ।
पणयाटीस दिणेहि ता किं पाव॑ति अट जणा ॥ ७६
जट किरि भित्ति सुवन्नो यण तिमासर पडणवीस धणे ।
ता सदसी वन्नी गंजहिय दुमास कद् युद्धं ॥ ७७
१९. अथ सप्तरारिकमाद्-
@ दीह तिकर वित्थर दु कवर नव दुम्म पावंति ।
नव दीह पेच विट्यरि ता कैव सत्तं कड् स्ट ॥ ७८
२०. अथ नवराशिकमाद-
चीर वरह पच वन्नेहिः
ते दीहण सत्त कर, तिन्नि हत्थ वित्थार अच्छ ।
तहं सव्वं सुं करंड छ सय द्म्म दोसियहि निच्छद् ।
जई चहुं वन्निहि अट कर दीहि पंच वित्थारि ।
ता नव चीरह् सुहं कद्र, कहि दोसिय विचारि ॥ ७९
२१. अथ एकाद रारायोरीन्) आद
दुकतिदु इग पथा जा कर पुड सुग सट दम्मेहि ।
ता नवति दुग तिकमे पत्थाई सुग कड् सं ॥ ८०
२२ अथ व्यस्तत्रैराशिको(क)माद-
मन्छ्ं च आद्रयुणियं अतेण विहत्त वित्थ तियरासी ।
अंताई् एग जाई ठवि मञ्छ्े अंत जाय ॥ ८१
दह सेदयंमि पत्थे मविया सत्तहिय वीस पत्थाद् ।
सोसि सेद पत्थे कह पत्थ हवति ते कसु ॥ ८२
खासद्धि टके ठखिया मण वीस वक्खरं तद्भया 1
जद वाहन्तरि तुष्टे त॒छखियं ति हवंति कितिय मणा ॥ <
गणितसार- प्रथमाध्याय ४९
सड़्ारस वन्नी तोखा चारीस सङ् कण य ।
ता दस सवाय वन्नी पवट्रणे हवद् केवह ॥ ८४
नव आयाम तिवित्थर दइ सइ वीसहिय कंबल सव्वे ।
$ म
पचायाम दु वित्थर कड् केवर होंति ते कसु ॥ ८५
२६. अथ क्रयविक्रयमाह-
मन्छंत गणिय मूलं अंताद गुणिय सव्व उप्पत्ती ।
विकय कयंतरि भायं नादजह् मूरुखाहधणं ॥ ८६
सतरह् मण टंकेणं छिजहि पन्नरस विक्किणिजंति ।
जइ दस टका खहे ता कहू ठंकाण ते मूले ॥ ८७
तिहु द्म्मि पंच वत्थू छिज्हि नवि द्म्मि सत्त विक्किजा ।
दंम दुवाटस खाहे कित्तिय दृम्माण सा मूले ॥ ८८ `
उवरि दम्म ति वत्थु ठविज्हि वकद विनि. वि रासि गुणिजद ।
आदम रासि राहि ताडिज्नद् विहू रासि अंतर पाडिल्नइ् ॥ ८९
२. अथः मांडप्रतिभांडकमाद-
भड -पडिभंडकरणे विवरिय मृद्धं फं च विवरीयं ।
कमि गुणवि दोवि रासी हरिज् खु रासिणा मायं ॥ ९०
स् दम्मि दुमण पिप्पछि तिहु सय द्म्मेहि पंच मण सुंटीं |
ता पिप्पछि सत्त मणे पाविजद सोंटि कितिय मणा ॥ ९१
५. अथ जीवविक्रयकरणमाट~-
जीवस्स विक्एण य वरिस विवरीय फलठंक विवरीयं ।
सेसं च पुव्वविहिणा जाणिजहु जीववरयु्टं ॥ ९२
दस बरिसा तिय करहा टका सउ अद्र अहिय पावंति । ..
ता नव वरिसा करहा कद मुष्टं हवड पचाण ॥ ९३
॥ इति परमजेन श्रीचन्द्राङ्गज रठछ्करफेरुविरचित्तायां गणितसार-
कोुदीपाय्यां पंचविंरातिपरिकम्मसूच् ( चाणि १) समाघानि॥
॥ इति प्रथमोऽध्यायः ॥
[ द्वितीयोऽध्यायः] , ,
१. अथ मागजातौ कलासवण्णनमाद्-
समछेय करवि पच्छा अंसयुई हवइ भागजाई य ।
अस्स अधु) तस्स य पणंस- टु किं वह् ॥ १ `
२. अथ प्रभागजातिमाद्- |
छेएण छेय गुणिय अंसे अंसा पमागजाई य ।
अस्स अघु (ङ) तस्स य पणंस खट्ट किं वद् ॥ २
३. अथ भागभागजातिमाद-
छेएण सूबराणिए छेयगमे हवड भागमागविही !
अंसाण जुई भायं धणेण पिहगंस युणवि, फर् ॥ ३
, - एगि तिभाय दुभायं एमि स नव भाय सत्तमाय च । ,,
~ एगि छमाय तिभायं किं सयद्म्माण पिहुशु ,फलं ॥ ४
वावि छ कर चउ नाख्य मरति कमि दिणिगि दर ति चउरंसो +
जद समकाछि ति सुच्चहि ता पूरहि केण काठेण `॥ १
४, अथ मागातुवधमाद- ।
अदृहरि उवरि हरु गणि स अंसि हिद्धिमहरेण यणि रूवं |
जा हवद चरिम छेयं एसा भागाणुवंधविही ॥ ६
सड तिय तस्स पायं सदिं जं तस्स छ्टमंसयुयं ।
तस्द. जुत्त किं हु तह्धः सतिद्ाय तस्स पायय ,॥ ७
५. अथ भागदग)ोपवाद्माह-
हिष्टिम हरि उवरिमहरु गुणि हिद्टिम हरे गर्यत्तेण ।
--" उवरिम ख्व युणिजहि एवं भागापवाहं च ॥ ८
` तिय अदधूणं पउणं तस्स खडंसूण तह्य अद्ध च } -
तंस - चउरंसरहियं क्रं किं पत्तेय हो( हो ठति फं ॥ ९
<
गणितसार - दितीयाध्याय ९५१
६. अथ भागमातजातौ आद-
भागाई पच जाद समासणं तं च भागमत्तीय ।
पिहु पिह जहुत्तकरणं करेवि समछेय अंसजुदै ॥-१०
अद्ध पयस्स भाय तिभायभायं तह अदहियं ।
त्यंसु अद्धहीणं एगद्भं किं हवेड् धणं ॥ ११
७. अथ वह्ीसवर्णने आह- |
वह्वीसवन्नणविही हिद्धिम केएण गुणवि केयंसा ।
उवरिमञंसे रिणु धणु पकीरए हिष्टिमंसाण ॥ १२
दुइ तोखा तिय मासा तहैव च गुंज पच विसुवा य ।
ते सत्तमंसहीणा सवन्नणे किं हवद् वष्टी ॥ १३
८, अथ स्थमस(स्तंभांर)कजातौ आद्-
समकेय अंस पिंडं रूवाओ सोहि जं हवद् सेसं ।
तेण पच्चक्खभायं रके थंभपरिमाणं ॥ १४
अद् खडंस दुवारस अंसा ज पंक वाट्टुयत्थकमे ।
पचक्ख तिनि कविय मणि पेडिय ! थंभपरिमाण ॥ १५
भाऊ पचम गयड पुवद्धि
द्क्खिण अहम सोखसंस पच्छिम पण्ड,
चाउद्धु गउ उत्तरह् सीहमद्रण दम छुं नहृड ।
तट्इ् रहि पडिय ! निसुणि गोरू सड पणयाट्ु,
ते इकट्रा जइ करहि कड खोडद थणबाल्टुं ॥ १६
अधु सतिहाड विज्छ्े खडंसु सत्तंस अहिउ जलतीरे ।
अदु नवंसहिड थलिगय चडसेस किं जहे ॥ १७
॥ इति परमजेन श्रीचन्द्रा्ज ठकुरफेरूविरविते गणितसारे
कोखुदी पष््यां अष्टौ भागजातयः ॥
॥ इति द्वितीयोऽध्यायः ॥
[ तृतीयोऽध्यायः । 1
१. अथ व्यवदारगणनायां मिश्रकः्यवहारे आद
नियकाछि पमाणधणं फेण परकाटु वि तोयं ।
मिस्ति गुणिरुण दोन्नवि जोयाविह तम्मि फठमूटं ॥ १
मासेण प॑चगसए चहु मासिहि दम्म पचस वीसा
तस्स फं क मूर जद खुणसि त भणसु सिग्घेण ॥ २
२. अथ भाव्यके आषह-
नियकाछि पमाणधणं गुणिज्न फट्काछि कमिफलईणि 1
अं ्ताण जुर्दभायं मिस्ति युणवि रुद सूटाई ॥ ३
मासे सयस्स पण फलु एगं विप्पस्स अदु वित्तीय ।
लेहगपायं वरिसे नवसयपचहियमिस्सधणं ॥ ४
३. अथ एकपन्रीकरणे आद
गयकार फरुसमासे मासफलख्केण भाई् काटो य ।
मासफटु षिड़ सयरुणि धणपिडे हरि सयस्स फं ॥ ५
दुगि तिगि चड पंचग सइ मासे घणु दिन्चु एग दुति छस्यं ।
चह छहि दसट्र मासिहि एगं पत्तं कदं हवद् ॥ ६
४. अथ प्रश्येदोक्लोपके आद-
समछेयंसजुई हर मिस्सं पत्तेय्थंसि युणिऊण ।
पक्खेवकरणमेयं मिस्साउ फरं सुणिलेड ॥ ७
दनि तिय पच चड मण वीयं पक्खविय तं च निष्यन्नं ।
विसय ददोत्तर दर हरि दिन्नाण वि किमह् भिन्नफटं ॥ -८
छह बुणे्हि सुद्धे दस टंक पचि दम्मेहि ।
टक छयासी ष्टं किं बुणिर्यं किं बुणाववियं 1 ९
कंचोतटं सत्त उदए् सत्तोवरि एगु दिष्ट विक्ख॑मा ।
दसि द्म्मि भरिउ च॑दणि अंगुलि इकिकि कड् युद्धो ॥ १०
गणितसार - त॒तीयाध्याय धटे
५. अथ समविषमक्रययोः आद-
म॒ष्धे वदु वि हत्थो पिहगंस गुणेय अंस जुवभावं ।
द्व्वेण अंसगुणिओ समविसमकयं तिरासि विहि परं ॥ ११
द्म्मिक्ि सेरु हरडडई तिनि बहेडा छ सेर आमल्या ।
भो विजन ! देहि फएक्िय सममत्ता इच्छ दम्मस्स ॥ १२
तिहुँ अद्ध सेर पिप्पल सतिहा नवि दम्मि मिरिय सेरु इगो ।
चहं परणु सेर सटी इगस्स तिङ् समं देहि ॥ १३
दमि नव सेर तदु इक्ारस संग सेरु इष्टं धिओ ।
ति दु इग अंस वणिय ! कमि सवाय दम्मस्स मे देहि ॥ १४
६. अथ सुवपर्णव्यवहारे आद-
ज सुवन्ना जं तुष्टं तं तेण गुणेवि करए पिंडं ।
तुष्धि वित्ते वन्नी बच्ची भाए हबद् तुष्टं ॥ १५
नव दस अब्टिच्छारस वन्नी तोखय तिय छ पण सुय ।
एगत्थ गाछियं तं केरिस वन्नी हव कणयं ॥ १६
७. अथ सुवर्णे भिन्नोदाह्रणमाह-
अह सवा नव पठण छ वच्ची तुष्टेति पच दइ मासा ।
तिय छ पण अंस सहिया अव्र किं हवद् कणयं ॥ १७
८, अथ पक्रसुवण्णस्य आदह-
वन्न सुवन्न गुणिक्ं विपक्छ कणए विहुत्तवन्नाय ।
इच्छा वन्नीभाएु पक्सुवननस्स वुष्टकं ॥ १८
छ पणहु सन्त तोख्य नव सत्त दसद वन्नपच्छाय
संजायवीसतोला केरिस वन्नी हवड कणयं ॥ १९
दुतीकः-
सत्तट्ं नव छ वन्ना च पच ति सत्त तोख्या कमसो |
इक्छारसीय वन्नी तुष्टे किं हवद् प्रवि ॥ २०
+ कर -केरः- विरचित
९. अथ नछसुवण्णवण्णमाद्-
उपन्नवन्नएणं सुबन्नपिंडं गुणेवि सोहिजा ।
वन्चसुवन्नवहिं ,गयवन्न सुवन्नए् भार्यं ॥ २१
तिय प॑च सत्त मासा नवट्र दसवन्न अह्टमासन्ने 1
उपन्ना दस वन्ना का वन्नी अहूमासाणं ॥ २२
उपन्नवन्नताडिय कणयजुर वच्चकणयवहू्पिडं । .
सोहिवि मायं गयकणयवनि उप्पन्नवन्रुणि ॥ २३
अहियस्स हीणछेयं हीणस्स य अहिय इच्छ व्नीओ ।
छेयंक वु भागा इय इच्छाकरणवन्नविही ॥ २४
पण सत्त नव इगारस वन्नीओ पिह्यु पिहयु किं छिजा । -
जेण इ दसी वन्नी वु्े तोखिष्ुं त॑ सणसु ॥ २५
॥ इति मिस्रकव्यवदारम् (रः) ॥
१. अथ सेदीव्यवदारो यः (१ यधा-)
गच्छेगुणुत्तर हय सहा अंतधणु पुणवि आइ जुयं ।
दुविहत्त मन्दम धणं गच्छ गुणं हव सव्वे धणं ॥ २६
वीसाद् पच उत्तर सम्तदिणे ठुरिय दरडरईैमाणं ।
तं भणि तह नटा उत्तर गच्छं पुणो भणघु ॥ २७
२. अथ नघछादययानयने करणमादह-
नट्द्जाणणल्थे सव्वधणं गच्छ भत्तरद्ओ ।
एगूण गच्छिड तरू गुणेवि दि सोहि सेसाई ॥ २८
३. अथ नष्टोत्तरानयने करणसूचमाद्-
उत्तरनद्णयणे गच्छेण विह॒त्तसव्वधणरासी ।
आइविहीणं कां निररेगच्छ द्रु रुद. चयं ॥ २९
४. जथ नटगच्छानयने जाद्-
अडरन्तर हययुणिये दुयुणाद्रै उङ्क हीणवम्गजुयं ।
मूं धण बि उणूणं सचयं चयनिरण, हरि गच्छं ॥ ३०
गणितसार - ततीयाध्याय वणु
५. अथ संकलियेक्यानयने आद-
इग चय संकछियंकं वि जुएण पएण गुणिवि तिहु भायं ।
छं संकछिय जुरं न संसयं इत्थ नायतं ॥ ३१
संकछिय वग्ग तह घणं पिह पिह पचाण किं हवड् इक ।
[१ ~ €
गणिञउण मणय. सिग्घं जय गणियविहिं वियाणासि .॥ ३२
च, अथ.चगकघनक्यानयनमादह-
इच्छपय बिरणसेगं ति हरिय संकलिय गुणिय वरज ।
संकणियवग्यु जं हुड तं घणपिडं वियाणेहि ॥ ३६ ` `
७. अथ संकंलितवग्गेचनैक्यानथने आद-
सेग बिडण पय परय शुण सेग पयदेण गुणिय हृद् जं तं |
संकछियवरग तह घण तिन्हाण जहे मरुणेयतं ॥ ३४
।॥ इति सेदीरयवदारे सुच्रगाथा सम्मत्ता ॥
अथ क्षेचव्यवहारमाद-
चउरंस दीह चरस विक्खंभायाय गुणिय तं खेत्तं ।
चउरंसे छ. कर भुया ति पंच कर दीह चररंसे ॥ ३५
सुव पिडद्धः चरा कमेण भुवहीण सेस गुण सुकमे ।
तस्स पए तं चित्तं तिुए अ चरग्थुए जाण ॥ ३६
मुहयुव कर पणवीसं भूमिसुवं सद्धिः वास वावन्नं ।
दाहिण. उणयारीसं किं जाय तस्स खित्तफटं ॥ ३७
भूमिसुव हत्थ चरउदस तेरस एगं च बीय प्चरसं ।
एयं विसम तिकोणं खित्तफरं अस्स किं हव ॥ ३८ `
सयखण चउरसाणं भूमह जोड ठव गुणखित्तं ।
तसाण भूमुवद्धं रंषगुणं हवद्र खित्तफलं ॥ ३९
खेवजुव तेरस पनरस भूञ्चुव इगवीस पच हत्थ सुह ।
मज्ज खुब दुवारस एरिसखित्तस्स किं माणं ॥ ४०
प
उड्र - फेर-विरचित ,
तिक्छोणफटं विर भूमत्तं मज्छ टंवओं हवद् 1
भुवटव वमग अंतरि सेसस्स पए हवद् अहवा ॥ ४१ '
सुबङेब वरगपिंडं तस्स पए हव निच्छयं कन्न ।
सब्बत्थ खित्तगणणे एस विहि दवद नाया ॥ ॥ ४२ .
विक्खंम वम्ग दह् गुण तम्मूले वहचित्त परिहि धुवं ॥ .
विक्लंम पाय गुणिया परिही ता हवद् खित्तफटं ॥ ४३
दस विक्ख॑मे खित्ते समव करंपि जायए परिही ।
शुणिऊण भणहि पंडिय } तसु खित्तफटस्स किं हवद् ॥ ४४
वदस्य विक्खंमं तिरणं तह छ्रमंसजुय परिही ।
विक्खंभदे गुणिया परिहि दरं तस्स चित्तफरं ॥ ४५. -
जीवा सर पिडद्धं सर गुणियं वग दह्युणं काडं। `
नव भाए जं लड तस्स पए हवद् धणुह् फरं ॥ ४६
धणुपिडे इगवीसं जीवा पनरस छक छक जस्स सरं ।
भणि पंडिय ! गणियफलं किं जाय तस्स धणु चित्तं ॥ ४७
सरवग्गे छगुणक्रियं जीवा वगहिय मूरू'धणु पिंडं ।
धणुवग्गाओ जीवा वम्यूण छमाय मूर सरं ॥ ४८ "
धणु सर जुयदहीणं घणुहाओ बग्ग चडण्.पय जीवा ।
पत्तेय गणियमाणं एयाण फं हवद् नूणं ॥ ४९ 1
चादि तिसुव दुगं सरुजे दो घणुह चउरसं मज्ज ।
दो धणुह् जवाकारे कुछिसे चउसुब दु कप्यिज्रा ॥ ५०
तिसुवं गयदंतोवम चउव्मुवं सगडचकवद्टसमं ।
चेदस्स सरिस धणुहं व्र परिपचरच॑दसमं ॥ ५१
वा््दवम खितं वित्थारे १ कर दहे !
दर खं तिन्नि धरा गयदैते कर हवेइ फलं ॥ ५२
निम्मागारे खित्ते उभयसुहे तिर पंचकर रवे ।
घरामुहे पण इत्थ ति मच्छि दह् व कुछिुवमो ॥ ५३
॥ इति क्षेत्रव्यवदारदत्रं समाप्तं ॥
1
गणितसार - ततीयाध्यार्थं ध४
१. अथ खातस्यवदारमाह-
तटमुह मजे विसमं उंइत्तं महव दीह्-विसमं वा ।
तं एग काडं विसमह्रणेहिं हरिय सम ॥ ५४
सम . वित्थर -दीहगुणं उंइत्ते गणिय हवद् खित्तफटं ।
खात्तं समसुववेहे घणोवमं जायए गणियं ॥ ५५
दु ति चड कर उडत्ते पुक्खरणी पंच हत्थ वित्थारे ।
सोस हत्थायामे किं जाय तस्स खत्तफं ॥ ५६
दीह् कर सड सोरुस वित्थारे दस सवाय अद्भुदए ।
अह् वित्थर् दीहदए सम नवकर किमिह पिहयु फं ॥ ५७
२. अथ रूपस्य फएटलानयनमाह-
कुववित्थारं वग्गं तिरण खडंसहिय बेहि गुणियव्वं ।
चहुं भाए ज खड ते करसंखा हवद् सव्वं ॥ ५८
चरूुवस्स य विक्खंभं छ हस्य कर वीस जस्स उडत्तं |
करूवस्स तस्स पंडिय ! खत्तफरं किं हवेद् धुवं ॥ ५९
तिक्रोणयादं खित्ता पुव्चुत्ता लित्तषकसमा जाण ।
ते वि गुणियं तिवेह हवति घणहत्थ खत्तफले ॥ ६०
३, अथ पाषाणफलखानयनकरणसूचम्- ।
दीहंगुखाणि वित्थर पिडंगुर ताडियाणि विभएहि ।
जिरणं अट तरसं हवति पाहाणघणदहत्था ॥ ६१
स्तय हत्य वित्थरि कद पिडे सिंरासहे जस्स ।
सत्रिहाय पच दीह कमित्थ इद् तस्स गणियफरं ॥ ६२
जं हब पिविहरूवं वट - तिकोणाई सयर्पाहाणं ।
चित्तफलटु ठव गुणेविणु पिडगुणं हवड् तस्स फं ॥ ६३
दस .ह्थे विक्खंमे षरटरपट्र व्व वह्ूरपाहाणे ।
[ दिवटकरमाणपिंडे किं होइ इमस्स गणिथपटं ॥ ६४
गोरसुद्ययणद सनवसे अहिय तं हवइ सें । `
५८ उङ्कर-फेरू- विरचित
परिहि चउत्यं मायं हय परिहि नवंसहिय वित्तं ॥ ६५
छ कर दीहुदय वित्थर समवद्ं गोरयरस पाह्यणे ।
किं गणियं किं ित्तं जं दुद् तं भणहि पत्ते ॥ ६६ `
४. अथ पाषाणस्य तौल्यमाद-
घणकंविय ईकणं टिष्धियसंमूय पाहणं सव्वं ॥ ।
पचास मणं जायदर वुकि चउवीस वद्धो [ य ] ॥ &७ '
वसी अडयाटीसं मम्माणी सट कसतिणु वासट्ी ।
जजावयं कन्नाणय उणवन्नकुडुकडो स्री ॥ ६८
॥ इति खातव्यवहारसूच्गाथा १५ सम्मत्ता ॥
अथ चितिव्यवहारमाद- |
गोमद पायतेवं चरस वैष्टं मर्नोरयं तकं । ,
सोवांण पलं दवं वोँवी इय नवविहा भित्ती ॥ ६९
पढममवि सुदभित्ती वित्थरदीहुदय गुणिय जं हद ।
तस्साड वार वारी आख्य कट्ाउ सोहिला ॥ ७० ^ ,
सेसाओ दसमंसं दिवड्यं मद्धियस्स षेद । ` , ' ' '
सेसा पाहणसंखा हवति घणहत्यमाणेण ॥ ७१; , , ` "
पेच कर भित्ति उद्ये दस दीह दुवित्थरे य तम्मञ्जे ।
बारू ति उद् दु नित्थरि का संखा हवह् पाहाणे,॥ ७२
अथ इद्यानां गणना-
दीहे वित्यरिपिंडे अद्ध तिहा अहृमंसु इट कमे!
च सुदद् दिवडु वित्थरि दहं दीहे भित्ति के इद्र ॥ ७२
१. अथ गोमटमाह-
गोमद्धमरूरपरिही अद्धं पा परिहि गुणिय सनव॑सं ।
भित्ति¢ति)गन्भाञ चयणं वाहिर मज्ज्ञाउ तं खिर 1 ७४
भित्ति(ति)गच्भाओं परिही उणवीस छ वित्थरस्स किं चयणं ।
चादर परिही पेडिय ! चउवीस कि ठवह, चेत्ं,॥ ७५.
~ घ र ॥
५
गणितसार - तेतीयाध्याय ५९
परिहीविक्छंमद गुणिय नवेसहिय खट गुहे ।' `
अणुभवसहियं भणियं न संस्यं इत्थ नायत्वं ॥ ७६
२. अथ पायसेवमाद-
चरस पायसेवं बाहिर भित्ती य मज्छिमं थमं ।
वित्थरु दीहृदय गुणं जं हृद तं कंवियां जाण }॥ ७७
भित्ति तह थम अंतरि कुच सग्गं किरंत तं दीह ।
तट उवर जुयद्धदयं वित्थर गुणिय हवद्र पूरं ॥ ७८
३. जथ वर्ट-
तह् वद्रपायसेवे थमं भित्ती य गणहू कूल व्च |
पूर॑तर छत्तिदरं तं चरु व्व जाणेह ॥ ७९
2. अथ सुनारया-
वटूपासेवसस्सि मनाया होति सयर मञ्छाभो ।
पुणु इत्तियं विसेसं तिकोणदल वट्दलभित्ती ॥ ८०
` ५. अथ ताक-
वारिस्सुबरिम ताक दीहुदए गुणिय भित्तिपिडगुणं ।
सत्तस देवड्णं सिहाजुयं जायए खट्ट । <१
सत्त कर ताक दीह सिहासहिय हस चारि जस्सुदयं ।
हत्थेग भित्तिपिडं किं जाय तस्स खटफटं ॥ ८२
६. अथ सोपानम्-
सोवाणहिट्रुउवरिम जोयद्धं उदयवित्थरे गुणियं । |
नव हिद उवरि एगं दु पिहृर छह उद्इ किमिह फलं ॥ ८२
७. अथ पुलर्बधमाद-
वित्थरु दीह उद्ए गुणिय, ताकविहीणं सुवञुवसहियं ।
निर्गम अहियं तह् खष्टूणं, जल्पुरूषंधं तं हृद् नूणं ॥ <
८. अथ कूष-
कुवभित्तिमञ्ज् परिही वित्थर उदएण गुणिय हवद् फलं ।
दस उद्द दु कर वित्थरि अह्ारस परिहि किं चयणं ॥ «८५
७ उुर-फेर- विरचित
अथ वापी पट भेदि- [ष म
चदरंस दीह व्रा खडंस अद्धंस संखवत्ताई ।
वहृटदि दति वाकी) ते दिटपमाणि गुणियंति } ८६
॥ इति वितिव्यवदारसच्च गा० १८ सम्मत्ता ॥
अथ कछकचन्यवदारसरच्रकरणमाद-
दार जहच्छियमणि तस्साउ जटिच्छ फछिह कीरंति 4
लु दीह वित्र गुणिज फलहेहिं भागु त्ति ॥*८७
अद्र कर दीहु दारो करद्ध॒ बित्थारि दि तिहाउ करे ।
दीहेया पाड वित्थरि नवसु दकि किमिह फर्टेण ॥ ८८
अथ करवत्ते दारूच्छेदितगणना- ।
करवत्त ह् जे हुं ते दीदिण गुणिय होंति हत्यां ।
बित्थरवसाड कोडी चिरावणी अग्बमाणेण ॥ ८९ |
हग दिवढ विषुव सद् गजि दु ति वित्थरि गजि असीहि कोडी य।
चं विघुवहि सदधि गजे पंचाइ् नवंति चारीसे ॥ ९० .
दस्सादं जाब तेरस विसुवा वित्थारि ताव तीसेहिं ।
उवरंते जा सोर्स ता वीसि गजेहि कोडी य ॥ ९१.
उवरि जा वीस विषुवा ता कोडी दसि गजेहि जणेह् ।
उवरि करवत्त॒ न चद इय मणियं सुत्तदारीहिं ॥ ९२
दार गज सत्त दीहे विसोवगा अद्र सत्त वित्थारे ।
: दस रीह फर्ट् गारस चीरिय कद्र कोडिया हंति ॥ ९३
अट जव कवियंगुछि जवेशु करवत्त खीट् एरहि इगे 1
वट्स्स खंडकरणे पिंडं तं दीह जाणेह ॥ ९४
महुव वड सार सीसम निव सिरीसाइ सम चिरावणियं ।
खयररजण कीर सवा संबद्धं सुरदारु गुणि पडणं ॥ ९५
८ ~ ५ इति ककचच्यवहारो समत्तो॥ गदा ९ ॥ < , .*
गणितखार - ततीयाध्याय ६१
अथ शारिव्यवहारमाद~
समञुवि कथऽचरासी तप्परिहि खडंस वग्गु उदयराणे .।
जं हु ते घणहत्था घणहत्थे इक पत्तो य ॥ ९६
ति -कुदव धन्नाणं नवसु उद य रासि परिहीओ ।
दृसमंसु मग्ग गोहम वोर कर्त्या इगारसमो ॥ ९७
सिरु व्व वट्टरासी चरकरूदयं तस्स परिहि छन्तीसं |
भित्तिसंरगगञद्धा दरूणंतरि पाय परिह य ॥ ९८
बाहिरक्रूणे परणं परिही उद्ओ सएह जाणेह् ।
किं जायइ् करसंखा पिह पिह रासीण तं मणसु ॥ ९९
दल पाय परण परिही गुणिवि कमे दु चउ सत्तिहाएण । ..
पुव्वु उ्व फं पच्छा नियनियगुणयारए मायं ॥ १००
॥ इति रारिव्यवदारुच्चं खर्लत्तं ॥ गादा ५॥
अथ च्छायाव्यवदार्सुच्रकरणसाह-
थंभाईइ भित्ति च्छाया दंडि भिणवि शुणहू दंडसाणेण ।
तस्सेव. दृडच्छाया हरिज् भायं फटेणुदयं ॥ १०१
चउवीसंगुर दंड च्छाया थभस्स तिनि दंड सवा |
दृड सवा अद्धारस अंगु किं थेञ्रु उच्त्तं ॥ १०२
अथ, साधनानयनष्रणघ्-
समभूमि दु कर वित्थरि दुरेह् वट्रस्स सञ्छ्ि रविस्॑क ।
, }\ -पटमंत छाय गब्भे जघुत्तरा अद्धि उद्यत्थं ॥ १०३
चठ चड इग सयराईं पण तिय इग कच्छडाइ धुव रास ।
सत्तरुर पह मंणिजुव फट रूगयजुत्त दिवस गय सेसं ॥ ` १०४
॥ इति च्छायाव्यवहारसुच्ं सम्मत्त ॥ गाथा ४॥ एकच माथा १०४॥
॥ इति परमजेन श्रीचन्द्राङ्गज ठक्कुरकेरविरचितायां ` `
गणितकौखुदीपाव्यां अष्टो व्यवहाराणिराः) समा्ः4प्राः) ॥
< , ॥ इति तृतीयोऽध्यायः ॥
[ चतुर्थोऽध्यायः ।]
अय देसारा)धिकारमाह- ।
टिद्धिय रायह्ाणि कलं भूय करण मज्छंमि ।
जं देसछेहपयडी तं फेरू भणडू चंद॒भो ॥ १
जघु जघु वंरिवि दिजई तयु तज जीवटदर जं भवे दव्वो 1
सो गुणिवि रुदः दम्मिहि सव्वाण य जीवल मायं ॥ २
सेव रायह्, [ सेव रायह् ] पंच जण गए य,
तह सब्वह् जीवर्द तीस सहर्स एगत्थ रासिणः
तिय तेरस पंच दुद् सत्त सहस इय भिन्न रूविण,
वय कारणि जा नवसदहस ते सव्विवि पावंति ।
निय निय जिवरा कड़तहं कि किं कु अवति ॥ ३
उपक्खद् जं दव्वं हद् तं पंडिय ! करिज् सययुणियं ।
चद्धीहरे वि भायं ज रव्मद् तं सई होड ॥ ४
गामि नयरि देसे जद नवि रुखि पचास सहसि चद य |
सत्तरि सहस उपक्खड ता तस्स किा सई होड ॥ ५
जिसा सद भेद्ञद् जित्तिय धण कड तहि स वद्धा ।
जुयङ तंक फसिवि तह पणमामगे हंति विदुवा य ॥ ६
सहसेति अंतिमंका फसवि कमे छिद द चर गुणा
ते विषुवाई जाणह एवं दस सहसि ख्क्खे वा ॥ ७
नइ चद्टी मूख्धणं ठु रुक्ख नव सहस पंच इ [ ? ग { तीसा
चउक सदै भद्रज्द ताम धणे कि्तियं हवद् ॥ ८
+ (१) अथ देखाके- प
-धणरासि अंतिमंको फुसि् तं विउण विघुव दसमंसो ।
दो अंतिमेक फुसिए पर्णसि तह विखुव सयम॑सो ॥ ९
+ रासिस्स अतिमके विसुवा विदुवंसगाई सेस कमा ।
आईम अंकाण्धे दस्मा जाणेह वीसंसे ॥ १०
गणितसार - चतुथोध्याय ६६
(२),अथ सुकातयमाद-
मुक्छातद. जं बरिसे तं गय दण गुणवि वरिस दिणिभाय
पचि सहस्सि सुकातद्र नवि दिणि चरउमापि कि इवद्र ॥ -११
जित्ता द्म्मः मसेखिय दिज्ञहि मासिक्छि ते तिमागणा ।..
सेस हवति विसोवा दिवसे दिवसे मुणेयव्वा ॥ १२
(३) अथ घावकगतौ-
लहुगइदिणसंखगुण टह - दीहगदस्स अंतरे भाय ।
र्डदिणेहि मिर्ती अप्पगदं ख्टुगदे दो वि ॥ १३
च जोयणीय पच्छा नवम दिणि सत्त जोयणी चिओ ।
तस्स वहोडण हेड मिेद्र सो कदय दिवसेहिं ॥ १४ `
पचाई दु वड़ता जोयण दिवसेण चछर करहो ।
जोयण चदसं करंही कित्तिय दिवसेहि सो भिरं ॥ १५
आइ - मञ्छ्॑त रासी अंताो आद हीण मन्छ्रेण।
भाए द्धं बिउणं एगजुयं करह दिणमाणं ॥ १६
(४) अथ संवत्सरानयनमाद-
विकछमाई जे वरिस मास चित्ताद् करिवि दिण;
छं णि नंद छदहिय मास ते वच्छर जुय पुण, _ `
न॑व निहाण रस वरिस मास दुद दुद दिण ऊणय, _
ताजिय वच्छरू हवई मास सुहरम मारणय,
ताजिक पुणेवं करिवि पर अहिय मास सोहेवि पुणि ।
नैव मँणि ठ वरिस दुद् दिण अहिय पंडिय ! विक्मसमउ भणि ॥१७
, ॥ इति देराधिकारकरणसजं सम्मत्तं ॥
(५) अथ वसख्राधिकारमाद-
जुज पट्रोख्य अतरुस सारा पट् वत्य एम् ।
कर. वासक ताणाहं इय सहमा थर साड ॥ १८
९1
1
उद्र -फेरू-विरचित
सय ह्थि सयरू कप्पडि सीवाणि कर दिवड़ एग कत्तरणे | ,
दग दु तिय कोर 'धुवणे षटटृड प्या कमे 1 १९
-सयरु खीमेहिं कप्पड समसंख नवार किंचि हीणदहिया ।
दहटी जविणा सव्व थंमाड सवाद्या उदए 1॥ २०
उदयरस वार विघुवा कमरतले अह उवरि सब्वेहि ।
दग थमि दु थमे वा इत्तो सिय कप्पडं भणिमो ॥ २१
सव्वाण पडतरोवर जयद्र. उदृए गुणिज जा कमरं ।
पिह वित्थर दीह हय अष्टरस हिय जय वतयं ॥ २२
मन्ञिम ंडस्साभो चरणं खीमस्स कडयर्पवेसो ।
तस्स दिवड़ा परिही वारसमंसूण चरसे ॥ २३
च कर मन्जिम थमं सोटस कमरं च परिही वावीसं ।
तस्स खीमस्स पेडिय ! किं जायद् वत्थपरिमाणे ॥ २४
अट्टं तह य वे तिउणं कमरं तयद्ध जुय दउरं । ` `
इय धर हय सीमाणय थंभाठ तनाव चरयरुणियं ॥ २५
तंगोदी इग यंभा दि्ुवर छवद्धः उद्य गुण वतं ।
थमा परिहि पणंगुण टुगथंमा मञ्ज पड अहिया ॥ २६
खरिगह् मडव उवरं उभयदिसे जि कर तस्स अद्ुदयं।
तत्तो पणयुण परिही परिहिदरं उद्य गुण वत्थं ॥ २७ `
भित्तिवल्य पड दोनिवि दुवार पड वेवि उद्यदीद्रुणा। `
इय बल्यं अदं मंडव सह् वार तह भित्ति ॥ २८ *"
वारिगह खडषटंसा च्छत्तागारा य मंडवागारा | £
~ 'एयाणं न्च् त्रच्छा दि्टुवर युयद्ध उदुयगुणा 1 २९ ५९1 ‡--4“
इग थम छरुण परिही दंभ परिदी य मञ्ज पड अदहियं ।
अंस जन्त उदए थंमाड तनाव प॑चयुणा ।॥ ३० ४
मीराण वारिग हु चिरुंग चउरस ढु एग थ॑मा य | 4
सम उक्य चरण कमर विडण परिदि अद्भमंस हियं ॥ ३१ “
1
गणिततसार-चतुथोध्याय देष
वल्हछि पनत्तव्ी छंबुक्छाकटिय मञ्ख च्ह्स्यिा ।
एयाण य कप्पडञ तह तदय पुडस्स पुण अहि ॥ ३२
छायापड चंदोवय सराद चाजमणियाद् भित्तिपडा ।
वित्थर दीहे याणिया सुन्छंति विणोयचित्त विणा ॥ ३३
दही जरद् ताका छलय कुन्वाय चरख पडिरूवा ।
छनत्तारंव निसराणा ते रिप्पपमाणि नायव्वा ॥ ३४
उदेस सियाबणियं सइ गजि नावार दम्म सोखसमं ।
चित्तं गजिक्ि पच्छा दहटी जसराइ चेति दुगं ॥ ३५
किमिसं गजिकि चित्ते सुहमे चरखवीस थूछि वीसा य ।
चत्तारि टक डोरी इग सुत्तं अरुण नीर वा ॥ ३६
नावार सरज चम्मं नीखारण कसिण वत्थ तं पयड ।
सुत्तं नवार सद गजि निव परणं इयर सेर ॥ ३७
॥ इति वखराधिकारे गादा २१. सम्मत्ता ॥
अथ जंच्राधिकारकरणसूच्माद-
दिणैरम्मिं रस तेर चदासिदिथे लुरगे क्यः ।
इय कुद्िहि ख(°) इगाईइ इगिगि समहिय लिहि मणह्र ।
केर निहि सोरु्तं तह य उवहि वंस तिहि दिसि ससिहरं ।
इच्छादछिरू हरिवि कमिण ठवि जंतु मुणहि पर ।
जा सुनु वारि ताणुकमिहि जतरि तन्विवरीड घुय ।
जां सव्वि गेहि विस्म हव समः, सम - विसमाईइ समक जुय ॥३८
॥ षट् गहे जच ॥ ।
दाहिण कन्नेगाई सत्तहि य खडाद्र पंचहि य वामे ।
दतं चडतीस सुरं सरं यणि उणंवीस ठर पणंवीसं ॥ ३९
पणतीस ति चठ दुं रवी तेरहं जिरणं तीस रिक स्वी ।
मणु सतरह दुस नवं नख तवस पुव्वाह् जत छगिहं ॥ ४०
९,
६६ उ्ुर-फैर-बिरचित
ठिदि धुराउ पाओढि अद्ध अह् मेलि पुणुवरिम ।
पायभोलि इय कमिह जाव पा जंतु टवद इम ।
मन्धिमद्ु उवकमिहि चरिम पा जंतु पुणु वि कमि ।
चउ गिहाइ चड बुह्धि अंत इय हद इग चय कमि ॥ ४१
तिहि" निदि" रस॑ लु वरु कर तेर^ गौर 1
१.८, 8 १२ __ १ ^~ 99 १६ ६1
भति शुणि रवि मरुं दिति” कं गुणं सरं ।
अधु पड चहु चदे चउसठि गिदि ।
रतिः ड च कमिऽणुकमेगाई छिदि ॥ ४२
अथ विपमजंच्रानयने-
ख इगाद्र जदिच्छोटि गिह संखिग जुय सुन्व पढमोि ।
तत्तो मन्दम मन्छिम गिहार गिह जुत्त सुकमेहिं ॥ ४३
घुरि पति चरिम अंकाड जत्थ अहियंकु वद् तित्थ गिहे ।
सञ्वगिहसंख सोदिवि छिदिज इय विसमगिहजंतं ॥ ४४
ल्मे गहै छोयर्णं हरनय्णं इंदिरयं भणि ददि ।
ससि रसै जत इगाई रहि, इ्ासी उदेहि ॥ ४५
॥ इति जंच्ाधिकारो सम्मत्तो ॥ गादा ८ ॥
अथ परकीर्णकाधिक्रारमाट-
( १) करुमानयनमाट-
दुयुणा दुरुण जिं उच्वरहि) चार वार तिहु त्त ।
अह् जह् को ऊस॒ख न उवरद, ता धुरि तिनि निरुत्त ॥ १
दकु उरगिहु चहु वरेरदिः
प्तय तदि जक्खु दशु वार व॒द तसु म्म सुरवड् ।
धम्मिड इुमाण वि बहर सय विव अद्ध सुठवड् ।
जं 'तावंत इगेगु दे सविहि वारि जक्खस्स ।
सेस वीस टि उव्वगहिं सव्वे कदं हद् तस्स ॥ २
गणितसार-चतुर्थाध्याय ६७
(२) अथ आम्रानयनमाद-
जे पत्ता ते अंसि गुणिजहि, आङ हीण करि बुड़ि हरिजरदि ।
ठद्धा बिडण सूवसंजत्ता, पंडिय ! ते जण गया निरूत्ता ।
सेदिय संकल्यि फटसंखा, छ्डः विहत्ते हृद फरसंखा ॥ ३
अंसु अद्म कटक सञ्चार; |
गड अंब तोडण बवणिहि भक्खणत्थ आएसि राणय ।
चउरादि बड़ंत छह एण परिहि सव्वेहि आणिय ।
जं कर्कं थिड लद. तिदिः वीस वीस सव्बेहि।
कृय जण गयं कित्तड कटक, कड अंबाणिय तेहि ॥ ४
(३) अथ जमािकः वरिसोला नयनमाद-
गुणक थप्पिवि कमिण एगाद;
उवरप्परि गुणिवि गुणि वार वार इकिकु दीजह ।
वरिसौख जे हवई सन्ि तेडइ पठमह भणिजहि ।
तेतरि अंक रूवाह् विषु, पुव्व परिहि गुणियंति ।
दुदर ति ति भक्खहि सव्वि जण, पंडिय इड पमणंति ॥ १५
गय जमाद्रय पच सामुरह;
वरिसोलणुक्मिहि दियडई सासु तद्धिय भरेविणु ।
तहं सुंजिय रहि जि ते बिरण ति च पण गुण करेविणु |
अंतिम सहि भक्खहि अवरि, भणदि एण बहु खद |
सविहि एगु सा भक्खिया, कड थाक कद् खडः ॥ £
(४) अथ वख्रफलानयनमाह-
जे जण गरहति हत्थं ते चरण गुणिज्न छट. बत्थकरे |
तं वत्थु दीहू वित्थरू कर जण गुण चरण सव्वि जणा ॥ ७
वर वत्थु इगु चरदिसि इगेगु कर ठाहिउ तिहं तिहु जणे ॥
नव नव करि, जणि पत्ता कद् जण वरवत्थु कड हत्था ॥ ८
६८ उदर -फेर-विरचित
(५) अथ करभगद्यामाद-
आइ-मज्॑तरासी अंताओ आद हीण मन्छेण ।
माए रं विणं एगजुयं करह् दिणमाणे ॥ ९
च जोयणाई् तिय तिय वतो निच चछए करटो 1
सोर जोयण करही कित्तिय दिवसेहि सा मिदर ॥ १०
(६) अव विपरीतोदेराकमाद- ।
सेसूण चत्त वग्गं गय अहियं तस्स मूरुमाय गुण ।
गुणयारेण विदत्तं सो अयुणिय रासि नायव्वो ॥ ११
पचरुण नवविहत्तं तवग्गं नवहियस्स मूं च ।
दो हीण तिन्नि सेसं विविरिय उद्ेसगो रासी ॥ १२
(७) अथ प्नचिन्ताज्ञानमाद-
सत्तरि गुण तिउनेहिं पचहि इगवीस पनर सत्तं ।
पिंडेण स पणुत्तरु देवि हरिवि मुणह परचित्तं ॥ १३
चितिय सुयकरसदहियं विरणिगि जुय पैचरुण सुयासदियं ।
दह् युण ख पणक्र रूव सेस कमे अण् सन्न विणा ॥ १४
(८) अथ मर्दितांकज्ञानमाद्-
सयलटकपिड सोहिवि रासिस्संताड सेसपिडाओ 1
जं हीणु नवसु पाडड पूर मखियंछु सुनु नवं ॥ १५
(९) अथ सद्दांकानयनमाह-
एगाई य नवंता अद्र विणा इच्छियंकु नवि गुणि ।
पुव्वंकरासि गुणिया हवेति एगाई सरिसंका ॥ १६
(१०) अथ गोकंख्यानयनमाद-
उवराओ जा हट्ट हं, ताणुकमिहि ठविज ।
उचरप्परि सब्वेवि गुणि, गावि एम जाणिज़ ॥ १७
चहुं टुवारिहि गावि नीसरिय,
गय पाणी पच सरि सत्त स्क्ख तछि ते वडद्धिय ।
वति वारिहि नविहि पदसि छच वाडिहि निविद्धिय ।
९
गणितसार - चतुर्थाध्याय ६९
रक्खहि अह्र गुबाट तहं, सारिच्छिय सहि तेवि ।
पंडिय ! करित्तिय गावि ह्र, तम्मि नयरिं सव्ये वि ॥ १८
( ११) अथ गोदुशुघवटनमाद-
गो जण समभगेणं जणसंख इगाइई ठवि कम कमसो । `
जा अंतिम गोअंकं समपण्े दुदु अंकसमं ।॥ १९
इति श्रीचन्द्राङ्जटक्ररफेरूविरयिते गणितसारे देा-
धिकारायाः चत्वारि(रः) अधिकारानि(८राः)
सम्मत्ता ॥ गाहा ६४ ॥
अथ उदेरापचगं सुच्रमाह-
पणमेविणु सिद्धिकरं भणामि निप्पत्तिपचगुदेसं ।
धन्निक्खुचप्पडाणं देसकरग्घाणमाणाणं ॥ १
सव्वत्थ अन्न निष्पद भूमिविसेसेण अंतरं बहुयं ।
टिदधिय आसिय नरहड वरुण पएसा इमं जाण ॥ २
खित्तस्स दीह-वित्थर विग्गहया गुणिय हवद् भूसंखा ।
वीस कमि दीह-वित्थरि अह कंविय स्ट वीगहञ ॥ ३
अन्नस्स फटं जायड् निष्पन्ने वीस विषुव वीगहञ ।
सद्धिं मण धनन कुटव चरवीस मद्र जाणेह् ॥ ४
चरला मण बाधीसं तिर सोल्स मुगग मास अद्भारं |
वीस कंरुणिय चीणय पनरह् कूरी सवार्हया ॥ ५
सोरुस मण कप्पासा चाटीस जुवारि दस सणो तह य ।
इक्खु सवाणिय साहा इत्ते आसादियं जाण ॥ £
गोहुव पणयारीसं कलव सर्सूर चणय वत्तीसं ।
जव छप्पन मणाई सरिसम अटसीदह् करड दसं ॥ ७
वटख तोरि कुर्त्था चउदस मण हंति सव्व कण तुखिया ।
जीर धणिया दस मण प्र सिक्य मन्दि गणियंति ॥ <
उद्कुर~ फर - विरचित
सख्त वि वेसवारा दाछिम सेत्थी य सग्गवत्ती य ।
कोर धन्चाद सैकय सड दस्म करस्स विग्गहए ॥ ९
॥ इति धान्योत्पत्तिफटम् ॥
नव खारि पचास मणी इक्खुरसो तस्स पंचमं गुलो ।
सच्छर रुष्टे ह्र सोर्प्मसे य खंडा य ॥ १०
तस्स दिवङ्खा रव्वा हीणाहिय पुण हवेद् नीरवा ।
पुणु इत्तियं नवि चख्द् जा भणियं दि पत्तेणं ॥ ११
खंडाउ तिभागूणा निवात वर्सखगा भवे पणा ।
अदइचुक्ख सेस सीरो इग वारा हद् खंडसमा ॥ १२
॥ इति इश्रसफलम् ॥
तिल-सरिसिम करड मणे तिं नव सत्त पच विदुव कमे ।
दुधि. अडंसु नवंसो टूणिर तत्तो य परण पिओ ॥ १३
1 इति स्नेदफलम् ॥
दसि छरीरएहिं गावी महिसी तच्विडण चह वयष्छि हलो 1
खुल्दि पवाणे कटिया नाविय व्हार महर विणा ॥ १४
देवदइ कन्नचला तह नीखी कविटीय गो अदंतीय ।
विप्प सवासणि य पुणो करं चरं नल्यि एयाणं ॥ १५
टका वत्तीस हो तिविह् कटी एग दीवढ दु टकीय ।
महिसिष्क गावि अद्धो बुद्धय वसस्स धको य ॥ १६
इय भणिय उद्रसं हीणाहिय होति च्धियणुसारे 1
अद्ध तिहा पा अन्नं तिण चर पा हीण भा सकरं ॥ १७
\ ॥ इति देदाकरफलम् ॥
जे पाई 3 भवेति ते तिडण निच्छए सेई |
अन्नेवि विण पई टंकड इकेवि जाणिज्ा ॥ १८
जि किवि सेर भणिच्रहि दम्मिकिदि, ते नि सवाया मण टेकिकिहि ।
› सेस सेर द्म्मिक्ि खणिजहु ॥ १९
गणितसार ~ चतुथौध्याय ७१
जित्तिहि कित्तिहि दम्मिहि पंडिय ! मणु एगु वक्खरो होई ]
तस्स्टेषि विसोदहि सेर इच्छो वियाणाहि ॥ २०
गणिमवत्थुण जित्तिहि दम्मेहिं होद कोडिया इका ।
तावद्य विसोवेहिं छन्भद् एगा गणिम बत्थू ॥ २१
॥ इति अधैस्य फलम् ॥
अथ मानानि-
वट्रस्स य विक्खमं तिउणं तह छष्रमंस जुय परिही ।
सा पाय वित्थरे गुणि जं जायड तं जि खित्तफटं ॥ २२
-दनं (९) परिधि १९ क्षेच फं २८ इति घत्तं ॥
वद्रामो चररंसं बारस विस्वा हवे सविसेसं ।
चउरंसाओ व्रं तह वटरड पचम॑सूणं ॥ २३
तिक्ठोणयाभ वदं सडदुबारस विसोव हद खित्तं ।
वट्राञओ य तिकोणं विसोबगा सत्त अद हिया ॥ २४
॥ इति सेच्रमानम्॥ `
विङोष एषां दशनमाद-
गोरुस्स य उद्यघणं परणं पडणं व हव पाहाणं ।
^,
परिहिचरत्थं मायं हयपरिहि नवंसज्यचखित्तं ॥ २५
न्यास (९) उधं गोलकफलं १२० केच १ ००५५६, घनि २१६
वाः 1 क
पठण १६२ पुणु परणं १९० कलं ॥ रएरिहिं ४।॥ गुणित १९ जात
९० | अस्य नवास १० एवं १०० प्चिद्चक्त ॥
हि य
धण कृनिय इकेणं टिद्धिय संभूय पर सव्व ।
पन्नासमणं जायह् तुिओ चवीस्वसय ठ्ठे ॥ २६
चू
७
यर-फेरू-विरचित
वी अडयारीसं सहं ममाणीय कसिणु वासद्री ।
जज्ावर कन्नाणय उणवन्न कुड्क्ुडो सद्र ॥ २७
मद्री मण पणवीसं तुसंत्न मण अह्रवारस वणं
दह मण तिष्ट धयं तह सोख्स मण ख्वण उदेसं ॥ २८
राजु इगु तिजणसहिओ वारस गज भित्ति पाहणे चिणड |
चउदससयादं इट्य उदेस जल गग्गरी तीसा ॥ २९
सगवीस मणा हक्क नव चुत्नं विउणु खोरु इक्र गजे 1
पाहाण भित्ति चिस नव मणड् इमेव जणेह् ॥ ३०
वे केवण चुन्नं परण मणं पायसेर सण सहियं ।
तद्यंस खोर जुत्तं त्वट्े अद्ध जट्टाणे ॥ ३१ ॥ |
छाणय मण चालीसं तह् ककर स्ट पक हुदर चुन्नं ।
रक्ख पवाहिय सषटरी अरक्ख चालीस कछया य ॥ ३२ ।
उदेस पंवगमिमं चंदाघुय करूणा अओ भणियं ।
जह देसकरुप्पत्ती चष्िय समए सुणिजेड ॥ ३२३
॥ इति उदेसप॑चगं सम्मन्तं ॥
॥ इति परमजेन श्रीचन्द्राइज टक्करफेरूविरचित गणितसार
कोुदीपाय्या सुच समः 4 छम्) ॥
1 स्व चस्तुवंघ तथा गाथा मिभित ३११ ॥
लिखितं चेन्न खुदि ५ संवत् १४०४।
~
ˆ - गणितेसार ~ नीजके
~=
७द'
-सूज सं° गाधा तथा वस्तुचधं गणित ३११।
गा० २ भिन्न वग्गेस्य गणनां १३
गा० १५ मूल प्रबन्ध स्थापना ।
गा० ७८ परिकर्मणि पारी २७५
शाण
गह
५ संकलित उत्पत्ति विधि १
£ षिमरु कलित गणना >
६ गुणाकार मेद २ गणना २
१ भागादर गणनोत्पत्ति 9
वरगसं
. .३ वग्गखं० उत्पत्ति गणना ५
` २ वभ्भैमूर सं°उत्पत्तिगणनाद
@ घन उत्पत्ति गणना ७
३ धनमृलोत्पत्ति गणना ८
७ अभिन्न परिक्म गणना र
३ भिन्न संकछित गणना १०
२ भिन्न गुणाकार गणना १९१
२ भिन्न भागाहर गणना १२
११
१ भिन्न वग्मैसूद्छ गणना १४
२ भिन्न घनस्य गणना १५
१ भिन्न घन मू गणना १६
९ चरैराशिक गणना १७
- £ पंच राशिक गणना १८
१ सतत राशिक गणना १९
१ नव रारिक गणना ` २०
१९ एकादश राशिक गणना २१
५ ठयस्त रारिक गणना २२
कय विकय सेद् गणना २२
२ भांड परतिभांड गणना २७
२ जीव विक्रय गणना. २५
१ ष
1 इति गाथा ७८ परिकमोणि २९५ सुस्व
0 ५ | जैः
अपर भाग जाति ८ अष्ट
नामानि, ,
सूत्र गाथा० १७
१ कलासवने गाथा .
२ प्रभागजाति गाथा
३ भाग भागजाति गा०
© भागायचुबधाजा०
५ भाग प्रवाह गणना -
£ भाग मात् जाति गा०
४७ बही सवणे गाथा
८ स्थ॑भोदेस जाति गाथा
अपर व्यवहार ८ गणना ।
सूच गा० १०४
१ प्रथम मिश्रक व्यवहारं
गा० २५
गा० २ मिश्रक गणना प्रथ,
% २ भाव्यक गणना दती
$ २ एरपन्ी करणं स्च
@ प्रश्येपक
य. सुवण ठयव्०
७ सुवण भिन्नो
५ न्ट सुवण्णे व्ण अष्टम
ककय © वथो
१०
~» + . ०६ ९५४ ४ „^
0८ ७ १ १ ५ ९५ ~~
बीजक यथा छ्ुभमस्तु ॥
` २२ दुतीक सेढी व्यवहार "
गाथा ९
गा० २ सेदी व्यवहार गणित
„ १ नश्रयानयन
„ १ नष्टोत्तरानयन
, १ नएगच्छाचयन
„ २२ संकलितेक्यानयन
„ १ वर्गँकधनानयन
„ संकछित वग्म घनेक०
३ क्षे व्यवहार सुच्र
गाथा १९
९ समचउस्स
२ दीधे चडउरसं
द पकादि सावं
४ च्रिकोण स्मे
५ पंचकोण कषेत्रं
ह भिकोण विकटः
७ चुत्तमडलछ
८ धणुहांकार
९ गजर्दताकारः
१
१२ सानाविचि
[षे ह 1
९
म
द
(~
पै
द
७
७४ द्र -फेर-धिरचित गणितसार ~ बीजक
४ खात व्यवहार गाथा १५ दे क्षक्रच व्यवहार गाथा ९
गा० ४ खातनानाविधि गणन ९ ० काष्ठ दीर्ध वि०
# प कूपस्य फटानयन म् फरयस्ी छेद
ॐ £ पपाण ककानयनत द ` नानाकाठ
# > प्रापाण तोल्य गणन ४ पता याया ९
५. चिति व्यवहार गाधा १९
उ्यवहार गाधा
ना ७ रासि व्यवदार गाथा ५
++ दैटपापाण र् अन्न ससि ति
देगोमरचिणणग० ३ दीर्घोद्य
> २ पायसेवभित्ति ४ र
ॐ २ सनाय गणित संख्या ५ गणितसारि ४
% २ ताक गणना खुद्धि द गष्नतला
१ सोपान गणना ४ ~~
१ पुखर्वेघनग ८
0 ति ८ छाया ज्यवहार गाथा ४
» १ वापीसंगणना १० ° छाया साधना
~° ० दिग्साधना
॥ इति अष्ट व्यवहार सूत्र गाधा १०४॥ ।
ट्कुर -फेरू- विरचित
वास्तसार।
स्तुत ।
। „ न्क ्् कु
[ प्रथमं शहलक्षणप्रकरणम् । ]
नमो जिनाय ।
सयरघरासरविदं दंसण-वन्नाणुगाईइ नमिङणं ।
पयरण ति वल्थुसारं जहुत्त संखेवि भणिमो हं ॥
गेहे पनरहिय सये, बिवपरिक्खस्स गाह तीसाद्ं ।
पासाई सट भणिरय, पणहिय सय दुनि सव्ये ॥ २ ॥ दारं ॥
` वत्तीसंशुङ भूमी ख्णेवि पूरिज्न पुणवि सा गत्ता ।
तेणेव मद्िएणं हीणाहिय सम फटं ` नेयं ॥ ३
अहव तं भरिय नीरे चरणसयं गच्छमाण जा सुसद ।
ति-ढु-दग अंशुल कमि धर अं मग्जिम उत्तमा जाण ॥ ४
सिय विप्प, अरुण खत्तिय, पीयर वडसाण, कसिण सुद्ाण ।
मद्धियवन्नपमाणे सुहया विवरीय असुहयस ॥ ५
॥ इति भुमिपरीक्षा ॥
समभूमि दुकर वित्थरि दु १दचचछरंस मग्न रवि १२ संकं ।
पटमंत छाय गब्भे जमुत्तरा अदि. उदयत्थं ॥ &
पाठान्तरे-१ वण्णाणुगं पणमिऊणं । २ गेहाद् वत्थुखारं संखेवेणं भणिस्सामि ।
, 2 इगवन्नसयं च गिहे विवपरिक्खस्स गाह तेवन्ना ।
तह सत्तरि पासा दुगसय चउहुत्तरा सब्बे ॥ २।
चडउवीखंगुख 1 ५ मच्धियाए । दे फला नेया ।
७ अह सा भरियजलेण थ । < भूमी । ९ अहम ।
१० सिय विण्पि अरुण खत्तिणि पीय वदसी अ कसिण खदरी अ ।
, मद्धिववण्णपमाणा भूमी नियनियवण्ण सुक्खयरी ॥
, ` १९१ दुरेह । ।
७६ उज्घर-केरः-विरयित
॥ दिय॒साधनाचक्रं ॥,
समभूमी तिद्रीए वदति छ अं कोण ककडए् ।
कूण दुं दिसि संतरुर मच्छि तिरिय इत्यु चरसे ॥ ७
चउरंसिकिकि दिसे वारस भागाड पच भा मञ्े ।
करणें सह तिय तिय वं हृद खुद उद्॑सं ॥ ८
॥ इति भूमिसाधना ॥ ।
चउरंस अदिसिमोदा अवम्मियाफुद्ट तिदिणवीयरुहौ ।
अकषर भूमिषुहा पुव्वेसाणुत्तरंबुवहौ ॥ ९ प
वम्मदणी वाहिकरा रोरूसर पु्भूमि मच्ुयरी ।, `
ससा वहुटुक्खा ते बुच्छं स्टनाणमिमं ॥ १०
वकवचत्तएहसप्यय इय नव वमी कमेण रिदि्छणं ।
नव कुद्रा भूमिकया पुवाद् स॒णह पन्देभं ॥ ११
व प्पन्हे नरस सङ्करे मिन्चुकारगं पुव्वे 1
क प्पन्हे खरसषटं अग्नि दैहत्थेहि निवदण्डं ॥ १२;
दाहिर्णं च ष्य्हेणं नरस कडितुंमि मिन्चुकरं । ,
त प्पन्हिसाण नेद् डिमाण य मिच्यु सडुकरे"“ .॥ १३
ए पन्द अवरदिते सिखुसष्टं सह्य पदसं । ' ` -
चायवि ह पन्दि चउकरि अंगारा मित्तनासयरा ॥ १४ .
` १अद््/ २ त्तसयुट। ३भाग पण। '४ द्य जायेद! ५ दण तिः
वीयप्पखवा चडउरलाऽवाम्मिणी अफुल्न य । ६ भू खुखया । ० ण्वुवुदा 1-
< चम्मद्रणी वाटिकरी ऊखर भूमी दवद सोरकरी । ¢
अङ्फुद्य भिच्युकरी दुक्खक्री तह य ससल ॥ †
९ हसपया 1 ० चण्णा। १९ छिदियन्वा \ - १२ पुव्वाह दिस तहा
काऊण नवमाप् ॥ ९१ ॥ , , ॥
अदिर्म॑तिऊण खडियं विदिपुव्व कल्नाया करे दामो 1
आणाचिल्रद पण्डं पण्डाइम अ्खरे खल \ १२॥, , ~
१३ अग्गीषः दुकरि 1. १४ जामे । २५ तप्पण्डे निरपः सहृरूरे साणु स
सिषुदाणी ।। १४॥ १६ पच्छिमदिसि ए पण्डे सिखुखहं कर दुगम्मि परय ।
बास्तुसार -- प्रथमप्रकरण ७७
` स प्यन्हि उत्तरेण थ दथ वरस कंडीड रोरकरं ।
प प्ण्हे गोसटं सङ्करी साणि धणनासं ॥ १५
य प्यन्हि मन्छकुटटे केसं छारं कवार अदस 1
वच्छत्थरप्पमाणा मिच्चुकरा होंति नायब्वां ॥ १६
` इय एवमा अनिवि जे पुव्वगयाईं होति सादं ।
ते सव्वे वि य सोहिवि वच्छबङे कीरए गेहं ॥ १७
त जहा । वच्छ्चक्र-
कन्चादं तिनि पुत्रे धणादइ तिय दाहिणे भवे वच्छो ।
पच्छिम मीणाद्र तियं उत्तर मिहुणाईं तिय ण्यं ॥ १८
गिहभूमि सत्तमाथं पण ५ दह॒ १० तिहि १५ तीस ३० तिहि १५
द्स १० इ ५कमे।
इय दिणसंखे चउदिसि सिरि पं समंकि वच्छदिदं ॥ १९
अगिमओ भ्ायुहयो धणक्खयं ऊुणइ पच्छिमो वच्छो ।
वामो य दादिणो वि य सुहाबहो होड नायो ॥ २०
धण मीण मिहुण कच्चे रवि दिय गेहं न कीरए कैहवि ।
तुर बिच्छिय मेस विसे पुव्वावर सेस सेस दिपे॥ २१
॥ इति वत्सं ॥
~ . सोय १ धण २ मिन्चु र हाणी ४ अत्थं ५ सन्नं च £ कलह ७
उव्व्सियं ८ ।
पूया ९ संपदं १० अग्गी ११ सह् च १२ चित्ताई मासफलं ॥ २२
॥ इति गृहारंभे मासफखाषटम् ॥
९ उत्तरदिसि सप्पण्डे। २ दिय ३ कडिभ्मि। ४ करे धणविणासमीसाने!
५ जप्पण्डे मज्छगिहे अडच्छार कवाट केस वहुसहटा ।
वच्छचउकरूप्पमाणा पापण य इति मिच्च करा ॥ १७ ॥
६ कन्नादतिगे पुञ्े बच्छो तहा दाहिणे घणाई तिगे ।
पच्छिमदिसि मीण तिगे मिहुण तिगे उत्तरे व्र ॥ १९ ॥
७ भाप.। < द्हक्खकमा । ९ संखा चउदिसि । १० आउहरो । १९ वद ।
१२९ धण मीण मिदुण कण्णा संकंतीए न कीर गेहं ! १३ संपरई।
८० उक्र फेर-विरचित
सृक गिहल्यो गिहिणी चंडं धणं सुक खुरय॒रू सुक्ल 1
जो सलु तस्स भावं सव॑ हद नत्थि संदेहो ॥ ३८
॥ इति गरेप्वेदाखय्ं ॥
राया १ सेणाहिवई २ अमच्च ३ जुवराय 8 अणुज ५ रण्णीणं ६।
नैमित्तिय ७ विल्ाण य ८ उवरोहिर्यं ९ पंच पच गिहा ॥ २९
एगसयं अह्ृहियं चसद्री सदि असीअ चाटीसं । , “"
तीसं चारीस तिगे कमेण करसंख वित्थारो ॥ ४० ,
चउ छच अह्र तिय तिय अद्र ऊ तियगेखु अंसजयदीहे ।
सेसगि्यण य माणं वित्थाराओ सणे्॑वं ॥ ४१
अड छचच चउ छ चड छह चड तिय गेहीण हीण घुकमेण ।
वित्थाराओ सेसा सेसगिहा हति दैयाणं ।॥ ४२
अस्यार्थं य॑त्रेणाद- ।
वन्न चउक्रस्प गिह वत्तीसं कराई बित्थरं भणियं ।
चठ चट हीणं 'क॑कमे जा खोड अंतजार्ईणं ॥ ४३ :- `
१ खर । _ > चंदो) ३भावो सलु मवे। ४ पुरोदियाण इह पेच गिदहा ।
५ छ छ छ भाग जुत्त वित्यरमओ। ६ सेसगिदाण य कमस माणं दींहचणे नेयं †
७ अड छद चड छह चड छह चङ चड चड हीणया कमेणेव } ; `
मूलगिहवित्यरामो सेसाण गिदाण वित्याया ॥ ४२ ॥ =
८ गिदेखु 1 र वित्थसे भणिभ। ९० दीणो कमसो। ११ सोल ।
वास्तुसार-प्रथमप्रकरण ८१
दसमंस-अट्रमंसं खडंस चउरंस वित्थरस्सहियं ।
दीह सव्वगिहस्सं य दिय-खत्तिय-वइस-खुदाणं ॥ ४४
त्त | बि [छ् दय | (खन विप्र निय वेदय | शुद्र =
11६41 इद् [२८ व ।
दीं (२५५४ २९॥ | २८ | २५ | १६
अस्यार्थं पुनः यन्रेणाद-
अंगुङ सत्तहिय सयं उदए गन्भे य होड पणसीदं 1,
गणियाणुसार दीहे सगिहालिदस्स इय माणं ॥ ध
पव्वगुछि चरवीसिहिं व॑त्तीसि करंगुठेहि कंवीया ।
अट्टं जवि तिरिय गेहं प्व इष्कु जणेह् ॥ ४६ `
पासाय-रायमंदिर-तडाग-पायार-वत्थमूमां । ।
इय केवीहि गणिज॑हि गिहसामिकरेहिं गिहवत्थु ॥ ४७
गिहक्षामिस॒हत्येणं नीम्ब विणा मिणसु वित्थर-दीहं ।
गुणि अद्रिः विहत्तं सेस धयाद्रं मवे आया ॥ ४८
धय १ धूम २ सीह ३ सांणे विस ५खर ६ गय ७ धंसि <ददअह्ाया।
पुव्वाइई् धयाद् ठि फटं च नामाणुसारेण ॥ ४९
विप्पे धयाड दिना खत्तियं सीहाउ वदसि बसहा ।
सुदाणे कुंजराया धंखायु मुणीण दायव्वा ॥ १५०
धय गय सीह दिला संते ठणे धो य सव्वत्थ |
गय प॑चाईणं बसहा खेडय तह कडाईु ॥ ५१
१ गिहाण य । २ इक्क गद्रदं इभ परिमाणं । † इसके वाद् म॒द्धित में निख्रोक्त
गाथां हे-जं दीहवित्थराईै भणियं तं सयरमूरगिदमाणं ।
सेसमक्दं जाणह जहत्थियं ज वहीकम्मं ॥ ४६ ॥
ओवरय सार कक्खो वराय सूरगिह मिणं स्वं ।
अह मूरसारमज्छरे जं वद तं च मूरगिरहं ॥ ४७ ॥
` १ छत्तीसि 1 ४ कंविआ। ५ अङि जव न्ख । ६ भूमीय । ७ गणिजई ।
< गिहसामिणो करेणं भित्ति विणा! ९ साणा । १० अद्ध आथ इमे ! ११ चित्ते ।
१२ सुद च धेखाड सुणीण नायव्वं । शद पंचाणण । ।
£ उष्ठर-कैरू-विरचित,
वावी -छ्रुब - तडागे सयणे अ ग अ आस्णे सीहो } '
वसहो भोयणपत्ते छत्ताख्वे घञो सिद्धो ॥ पर , ,
विस-कंजर-सीहाया नयरे पासाय-सन्वगेहेष !
साणं मिच्छाईणः धंखं कारुयगिहा्दूु ॥ ५३
धूमं रसोदठाणे तहैव गदेषु वहिजीवाणं ।
रासहु वेस्ाण गिहे धय-गय-सीहाउ रायहंरे ॥ ५४ . ` `
दीं वित्यरिरुणियं जं दुद् तं मूखरासि नायच्चं । ` `
वसु ८ हय रिक्ख २७ विदत्तं, गिहनक्खत्त वे सेस ॥ ५५
गिैरिक्खं वेयश्टयं नवभाए् छद् सुत्तरासि धुर्व'। `
गिहरासि सामिरासी छक दुवार(र)सं असुं ॥ ५६
रिचैलं वसु ८ सेस वयं तं च तिहा जकंल.रक्खस-पिसायं ।
जयं काड कमेण दीणादिय सम सुणेयव्वं | ५७ ' '
जक्ख वओ विदिकरो धणनासं कुणड रकखस बओ'य । '
मञ्न्िम वम पिसाओ तहय जमंसं च विजा '॥ ५८
मुरासिस्स (मरूकस्स रासि # अंक गिहनामक्खर वयंकसंजुत्ं ।
तियं ३ सेस खुणहु अंसा ईद-जमा तहय रायाणो ॥*५९
गिहैरिक्ख सामिरिक्लं पिंडं नव सेस छ चड नव सुहया ।
मन्छिम दो परमदा ति पंच सत्ताह्मा तारा ॥ ६० `
जह् कन्ना-वरथीई गणिजए तह य सामिय गिह ।
' जोणि-गंणे-रसि^सव्वं तं जाह जोय्कताओ य ॥ दर्शं
सिः रधु 3
=
अदु यण उड् मच्च! ४ हह स
क्लं चउगुणिभ नवमत्तं खट ्॒त्तयसीओ । ६ सडघृदु । ७ वसुभत्त रिक्लसेसं
वय ! < जाड काउ कमसो। २ तियिहत्तु सेख असा इद॑स-जमंसरायसा 1
१० गेदमसरामिभर्िंडे नवमत्त सेम छ चड नव सुहया । मि ढराति
ज्म दुग इग भटा
व ताण ॥ ६० ॥ १६ गिद्एण । ६२ जोणि गण-रासि पमा नाडी वेदो
प्बो! ; ,
वास्तसार-प्रथमप्रकरण ८३
† भुद्रितपुसतके एतदन्तरं निन्नटिखिता गाथा ठम्यन्ते-
मओवर्य नाम सारा जेणेग दुसाड भण्णए गेहं । ।
गई नामं च अलिदो इग दु तिऽरिंदोई पटसारो ॥ ६५
पटसार बार दृह दिसि जाङ्य भित्ति मंडवो हवई ।
पिद्री दाहिण वामे अरिंद नामे यंजारी ॥ ६8
जाय नामं पूसा थ॑भय नामं च हवई खडदारं ।
भार पटो य तिरि पीठ कंडी धरण एग ॥ &७
ओवर्य-पडसाला-पतं मूरगेह नायव्वं ।
एअस्स चेव गणि रंधण गेहाद् गिहभूसा ॥ ६८
भोवरय-अर्दिंद-गई युजारि-भित्तीण प्ट्थमाण ।
लाछिय स॑ंडवाण य मेएण शिहा उवज्जति ॥ ६९
| चउदस शुर पत्थारे हयुरुभेएिं सालमाईणि ।
। जायति सव्व गेहा सोर सहस्य ति सय चुरसीभ ॥ ७०
. ततोयनिं करिवि संपद् बदति धुबाई संतणाईणि ।
ताणं चिय नामाई रक्डणचिण्डाई् बुच्छामि ॥ ७१
धुव १ धन्न २ जयं ३ नदं 8
खर १ र्कत £ मणोरमं ७ सुम॒ह् < दुस॒हं ९।
करूर १० सुपक्ख ११ धणद् १२ खय १३
अक्छदं १९ विर १५ विजय १६ गिही ॥ ६२
षोडदा गम्
55.51 दुसुह
15 5 कूर | ठवि च गुराड खुकमे
5151 खपश्च च 4:
॥ 5 । धणद् ओ गुर हि स्स खवर समा।
5.51} क्खय र ॥
1 511 अक्तदः उगेहि यर =
5111 विरल | पुणो पुणो जाम सव्ब्रहू ॥ ६३
11 1 । विजय
11
१ चत्तारि शुरुटविडं ।! > जाव ।
८ टक्ुर-फैर-विरचित
तं धुव-षन्ना्णं पुव्वाद् दहि सार नायव्वा |
गुरुठाणि युणह शतनं नामसमं भावै जाणेद् ॥ ६९ {|
॥ इति पोडदाग़हम् ॥
{ पोडदाग्रदकोषटकानन्तरं सुद्रितपुस्तके एता निस्नगता गाधा छम्यन्ते।
संतण १ संतिद २ वदमाणं २ इकुडा ४ सस्थियं ५च हसं 8 च।
बद्धण ७ कन्बुर ८ संता ९ हरिसण १० विउला ११ करां १२ च ॥ ७५
वित्ते १३ चित्तं १४ ध्व १५ कार्ड १६ तदेव बंधृदं १७।
पत्तद १८ स्व्वगा १९ तह वीसदमं कारुचक्षै २० [ च ] ॥ ७६
तिपुरं २१ संदर २२ नीला २२ दिलं २४ सासय २५य सत्थदा २६ सीर २७।
छर २८ सोम २९ समदा ३० तह मदमाणं ३२१ च दरक ३२ ॥ ७७
सीदिर ३२ य सव्वकामय ३४ पुद्धिद ३५ तदह कित्तिनासणा ३६ नामा ।
सिणगार ३७ सिरीयासा ३८ सिरीपोभ ३९ तह कित्तिोदणया ४० ॥ ७८
जगसीहर ४१ बहुलादा ४२ रुच्छिनिवासं ४३ च ुविय ४४ उजञीया ४५।
वहुतेयं ४६ च सुतेयं ४७ कलदावह ४८ तह विलासा ४९ य ॥ ७९
वहू निवासं ५० पुद्धिद ५१ कोहसनिहं ५२ मर्त ५३ महिता य ५४।
दुक्ख ५५ च इरच्छेयं ५६ पयाववद्भण ५७ य दिव्वा ५८ य॒ ॥ ८०
वहुदुक्ख ५९ कठच्छेयण ६० जंगम ६१ तह सीहनाय ६२ हत्थीज ६३।
कटक ६४ इई नामाहं रश्खणमेयं अओ बच्छ ॥ ८१
केवर मपरय दुगं संतण नामं यणे तं गेहं ।
तस्सेव मजनि पटं घहेगऽङिदं च सरस्थियगं ।। ८२
सत्थिय गेहस्सगो अर्िंदु बीयो अ तं भवे संतं ।
संते गुजारि दादिण थम सहिय तं हवई वित्तं ॥ ८३
नित्तगिरे वामदिसे जद हवई गुजारि ताव वंधूदं ।
जारि पिट दादिण पुर दु अद ठं तिषुर ॥ ८४
पिद्वी दादिण वामे हेग शुंनारि पर दु अरिंदा ।
त सास्य आवापं सव्ाण जणाण संतिकरं ॥ ८५
९ भित्ति। २ दवद फर मेसि ।
वास्तुसार - प्रथमप्रकरण ८५
दाहिण वाम इगेगं अरठिंद जुअलस्स म॑ंडवं पुरो ।
ओवरय मच्छि थमो तस्स य नाम हवह् सोमं ॥ ८8
पुरओ अरिंद तियर्गं तिदिसिं इक्क हवद् गुजारी ।
थभय पद समेयं सीधर नामं च तं गेहं ॥ ८७
गुजारि जुअक तिहु दिसि दुंद मुहे य शंम परिकलियं ।
मंडव जाय सहिया सिरिसिंगारं तयं विति ॥ ८८
तिनि अर्ठिंदा पुर तस्मे महु सेस पुछु च्च ।
तं नाम जुग्गसीधर बहुर्मगङ रिद्धि-भावासं ॥ ८९
हु अरिंद-म॑डवं तह जाछिय द्ग दादिणे दु गई ।
भि्तितरि थम जुभा उजं नाम धणनिरुय ॥ ९०
उजोअगेह पच्छ दाहिणए दुगड भित्ति अंतरए ।
जई हंति दो भम॑ती विलासना्मं हवई गेहं ॥ ९१
ति अद युहस्समे मडवयं सेसं विलापु व्च ।
तं गेहं च महतं इुणड् मड वसंताणं ॥ ९२
युहि ति अरविंद सर्मडव जाङ्य तिदिसेहि दु दु य गंजारी ।
मज्त्ि वलय गय भित्ती जाङिय य पयाववद्धणथं ॥ ९३
पयाववद्भणए जह थभय ता वह् जगम सुजसं ।
इअ सोटस गेहाई सव्वाई उत्तरथुहाई ॥ ९४
एयाई् चिय पव्या दाहिण पच्छिम यहेण बारेण ।
ना्मतरेण अन्ना तिनि मिखियाणि चडसड्ि ॥ ९५
संतणयुत्तरवारं तं चिय पुव्ययुहू संतदं भणियं ।
जम्मयुह बमाणं अवरयुहं कुं तहनेसु ॥ ९६
अग्गे अरिद तियगे इक्तिकं वाम दाहिणोषरयं । `
थभजुयं च दुसाल तस्स य नामं हयर् सरं ॥ ९७
वये य चर अलिंदा उभयदिसे इक इक ओधरथो ।
नामेण वासवं तं जुगञंतं जाव वस् धुवं ॥ ९८
युहि ति अरिंद् दु पच्छ दाहिण वामे अ हवई इकिकं ।
तं गिह नार्म वीयं हियच्छियं चरु वन्नाणं ॥ ९९
दो पच्छ दो पुरो अङिद तह दादहिणे हद इको ।
कालक्खं तं गेहं अकारि दंडं कुणः नूणं ॥ १०० ॥
द उर - फेर - विरचित
अर्द् तिनि वयणे जुअरं जुभलं च वामदादिणए ।
एगं पिद्टिदिसाए बुद्री संबुद्धि बहणयं ॥ १०१
दु अद चउदिसेहि सुव्यय नामं च सव्वसिद्धिकरं ।
पुरम तिनि अर्दा तिदिसि दुगं तं च पासायं ।॥ १०२
उरि अरिदा पुरमो पिष्टि तिगं तं गि दुवेदक्पं ।
इह घ्राई गेदा अद्रवि नियनामसरिपप्सा ॥ १०२
विमलाई संदराई ईसाई अरंकियाइ पमयाई ।
पम्मोय सिरिभवाई चूडामणि फरसमाई य 1 १०४
एमाहथासु सन्वे सोरस सोरुस हर्वंति गिह तत्तो ।
दकिकाओ चड चड दिसिभेअ-अरिंदमेएिं ॥ १०५
तिथलोयसदराई चरसि गिहाई हंति रायाणो ।
ते पुण अवद संप मिच्छाण च रज्ञमावेण ॥ १०६
.॥
पुबधदिसे अत्थाणं असीय रसोई दाहिणि सयणं ।
नेर नीदारिईं मोयणटि पच्छिमे भणियं ॥ ६५
वायव्वे सव्बायुरँ कोसुत्तर धम्मठाणु ईसाणे !
पुव्वाइविनिदेसो ्रूटगिहदारविक्खाश्भो ॥ ६६
पु्बेणं विजयवारं जमवारं दाहिणेर्णं नायव्वं ।
अवरेण मयरवारं कुवेरवारतरे पासे ॥ ६७
नामसमं फलमेर्य वारं न कयावि दाहिणि कुजा ।
कारणंवसाउ जद हद चउदिसि भागटू कायव्वा ॥ ६८
खहवारु अंसमञ्जञे चहं दिसेहिं पि अदह्भागाओ ।
च तिय १ टुन्नि छ २ पण तिय ३ तिय पण ४ पुव्वाइ सुकम्मेणं ६१
वारा गिहपवेसं सोवाण करिज् सिद्धिमगोणं 1
पयठाणं सूरसुहं जख्छ्ुम रसोद् आसन्नं ।॥ ७०
९ पुत्रे सीददुवार \ २ मम्भीई 1 ३ सव्वाउह ! ४ विक्लाण 1 ५ पुव्वाह॥
६ दारिणाद । ७ वार उरईचीष् । < मसि! ९जडई होड कारणेण ताड चडदिकि
अद्ध माग कायव्या! ६० चरुं पि दिसाखु उद्धमागासु ।
वास्तुसार - प्रथमप्रकरणं ८७
सर्दम॒हाई गेहौ काथव्वा सिष्पि-हट व्बुहा ।
गिहवाराउ कमुच्चा दद्रा पुरओ मञ्कसमा ॥ ७१
पव्चुन्नय॑ अस्थहरं जमुर्थयं मंदिरं धणसमिरई ।
अवसन्नं विटिकरं उन्तसन्नयं होड उव्वसियं ॥ ७२
मूलाओ अरररिभं कीरदई पच्छा कमे कमे कुजा ।
मूलं गणियविसुं वेह सव्बत्थ विज्ञा ॥ ७३
तख्वेह १ कोणवेहं २ ताट्ुयवेहं ३ कवाट्वेह ४ च. ` -
तह थंम ५ तुखवेहं ६ दुवारवेहं च ७ सत्तमयं ॥ ७४
समविसम भूमिकुभिय जखुपूरं परगिहस्स तख्वेहं ।
करुणसमं जह् दरणं न होई तां कूणवेहं ` ठु ॥ ७५
इकखणे नीचं पीठं तं सुणह ताय वेहं ।
वारस्पुबरिमपट्रे गब्भे पीटं च सिरवेहं ॥ ७६
गेहस्स मज्खि भाएु थभेगं तं मुणेह् उरसं ।
अह अनलो विनटाई हविज्ञ जा थंभवे्हः ^ तं ॥ ७७
[९ + क + +
हिम उवरमि खणे ` हीणाहिय पीट तं तुखबेहं । - ` ` . `
पीठं * पीटठस्स समं हवे जद तत्थ नहु दोसं ॥ ७८ .
कुब-थंसु-दुमं कोणय कीले विद्धे दुवारवेहो य ।
गेहुच्चविउण भूमी तं न विरुद बुहा विति ॥ ७९
तख्वेहि ऊुद्ररोया हवति उस्वेय कोणवेहमि ।
तादटयवेहें भयं कुरुक्खयं थंभवेहेण ॥ ८०
„~ १ सगडयुहा बरगेहा। २ तदय । २३ पुछं । ४ दाहिण ऽ्चधरं।
५ अवसब्यं । ६ उव्वसियं उन्तराउच्चं । ७ आरंभो। ८ सव्वं । ९ वेदो! १० वेहो 1
११ वेद्यो अ! १२ वेहो सो । १३ दिम उवरि खणाणं । १४ पीठा समसंखासो
वंति जर तत्थ नह दोसो । १५ दूमक्रूव-थम 1 शद वेहेण 1 0
<८८
टकुर- कैर -विरचित
कावालु तुखबेहे धणनासो दों रोरभावो य
दय वेदफलं नाडं सुदं गेहं खकायग्धं ॥ ८१
वेहेगेण य करहुं कमेण हाणि च जलय ध्वे हंति ।
ति भूयाण निवासो चहुं क्खयं पचि सन्वरियं ॥ ८२
॥ इति वेधः ॥
अद्र सड भाया पडिमारु व्व करिवि भूमि तओ ।
सिरि हियद नाहि सि्णे थमं वल्नेह जक्तेणं ॥ ८३
वारं बारस्स समं अह वारं वारमन्छ्ि कायव्वं ।
अह वजिऊण वारं कीरईइ वारं तहां च ॥ ८४
रुणं द्रूणस्स समं आइ आरं च कीरुए कीटं ।
थमे थमं ऊुजा अह् वेह वजि कायव्वा ॥ ८५
आल्यसिरंमि कीलो थंमो वारुबरि वार थंसुवरे ।
वारिः वार समखणि वरिमा थभा महा असुहा ॥ ८६
थंमहीणं न कायव्वं पासायं मंई-मंदिरं ।
चरुण-कक्खंतरेऽवस्सं देयं थमं पयत्तओ ॥ ८७
छुमीसिरंमि सिरं ष्टं अद्रंस भदगा्रौरं ।
रूबगपयवंैदियं थंमेरिसगि्हि'* न कायत ॥ ८८
खणमन्छ्े कायव्वं कीलल्य भैऽखमुक्ल समरं ।
अंतर र्ती म॑चं करि खण तह य पीटठसमं ॥ ८९
गिहमञ्ज्ि अंगणे वा तिकोणयं पंचकोणयं जत्य ।
तत्य वसंतस्स पुणो न होद् ख॒ह-रिदि कर्यावि ॥ ९
#
१ हवई 1 २ करेव्व । २ इगवेहेणं य कठ्दो 1 छदो! प् तिहु भूञआण,
निवासो चडर्हिं खओ पंचहि मारी । द सिदिणो। ७ ५ ८ खण ।
१० मर् ! १९ चद \ १२ भदगायार । ९३ सहि \ १७ गेहे थमा न कायव्या ।
१५ गजोख 1 १६ जुई । १७ छत्ता 1
वास्तुसारं - प्रथमप्रकैरण ८९
मूरगिहे पच्छिमदिसि' जो करद् तिन्नि वार ओवरएु ।
सो तं गिह न भुंजइ अह् भँजद दुक्खिभो हवद् ॥ ९१ ,.
कमङेगि ज॑ दुवारो अहवा कमलेहि वजि होई ।
हिद्ार उवरि पिहृखो न ठइ थिर रच्छि तम्मि गिहे ॥ ९२
वर्याकारं कूणेहिः संकुरं अहव एग ठु ति दरणं ।
दाहिण-बीमय दीह न वासियव्वेरिसं गें ॥ ९३
सयमेव जे करिवाडा पिहियति य उग्बडंति ते अबुहा । `
चित्त-कल्साद-सोहा-सविसेसा मूख्वारि सुहा ॥ ९४
छत्तितरि भित्तितरि मग्गंतरि दोस जेन ते. दोसा ।
साल-आओवरय-कुखी-पिदटि-दुवारेहिं बहु दोसा ॥ ९५
जोदणि नट्ारंभं भारह्-रामायणं च निवजुद्धं ।
रिसिचरिय-देवचरियं इअ चित्तं गेदि ` नहु जुत्तं ॥ ९६
फलिहतर कुुमबह्टी सरस्सदं नवनिहाणजुअर्च्छी ।
कलसं बद्ाबणयं सुमिणावलियाइ सुह चित्त ॥ ९७
पुरिखु व्व गिहस्संगं हीणं अहियं न पावए् सोहं ।
तम्हा सुदं कीरइ जेण गिह हवइ़ रिदिकरं ॥ ९८
वज्जि जिणु्री रवि दैसर दिट्टि विन्दु वामो य |
सव्बत्थ अखुह् चंडी व्ही पुण सव्वहा चयह् ॥ ९९
अरिहंतदिद्टि. दाहिण. हर पुष्टी वामप सुकष्ाणं |
विवरीए् बहू दुक्खं परं न मग्गतरे दोसं ` ॥ १००
पटमत जाम. वज्िय धयादइ दु-तिपह्रसंभवा छाया ।
दुहदायी नायव्वां तओ य अंत्तेण विज्ञा ॥ १०१
ˆ ` ९१ सुहि। रवार ठन्नि वारा ओवर! २ दवद! ४ढादइ। ५ वाम।
:६ “दारि 1. ७-गेहधु। -< पिद्धी। २९ विण्डु वामथुभा। १० वंभाणै डदि
यह । „९१ दोसो! १२ हेडः! १३ पयत्तेण ।
९० ट्र फैर- विरचित
सम का विसम खणा सव्वपयारेखु इय विह डला । ` `
पुच्छुचरेण प्व जमाबरा मूर कायव्वा ॥ १०२ `
हृर-घाणय-सगड-मई-अरदट्रजंताणि कंटद तह य॑ ।
परचुवरि खीरतरू एयाण य कटु वज्िजञा 1 १०३
विजठरि केलि दाडिम जंभीरी दो हङिद अंविखिया ।
वव्चूहि वोरि माद कणयमया तहवि नो कुजा ॥ १०४
एयाणं जश्य॑ जडा पीडवसाओ पविस्सई अहवा ।
छाया वा ज॑मि गिह कुख्नासो हवड सत्येव ॥ १०५
संसक्त भग्ग दङा मसाण खग निर्य खीर चिरदीहा । -
निव वहेडय रुक्खा नह कटिजंति गिददेऊ ॥ १०६
पाहाणमयं थमं पीटं पट्टं च चाररत्रं! `;
एए गेहिविरुढय सुदावहा धस्मठणेखु ॥ १०७
पाटाणमषए कटं कटरुमए पाहणस्स माद्र ।
पासाए् य गिह वा वच्जियव्वा पयत्तेणं 1 १०८
पासाय-करूुव-वावी-मसाण-मठ-रायमंदिराणं च ।
पाहाण-इट्र-कद्ा सरिसममनत्ता वि वलिञ्वा 1 १०९
सुगिह्जखो उवरिमओ खिविज नियमञ्द्ि नन्नगेदरस }
पच्छा कहवि न चिप्प् इय भणियं पुव्वसत्थैमि ॥ ११०
दैसाणङ कोणे नयरे गामे न कीरएु हं ।
संतरोयाण अयुं अंतिमजादैण रिदिकरं ॥ १११
देव-गुर-वण्डि-गोषण-म॒हे चरणे न कीरए सयणं ।
उत्तर सिरं न कुजा न नग्गदेहा न अष्टपया ॥ ११२
यु पु पाठमेदो यथा -'सव्वेवि भारवश्च सूलमिदे पमिखुच्ति कीरति 1
पीढ पुण एगसुत्ते उवस्यशजारिअलिदेषु, ॥ १४५ ॥
, १ जशवि ! २ पाडिचसा, पाडोखा ! २े सुक ! ७ बारुडश्वाणं ! ५ विकर ।
समुह । ,
॥
वास्वसार ~ परथमप्रकरण ९१
घुत्तामच्चासन्ने परवत्थुदले चरप्पहे न गिह ।
गिह-देवर्पुष्विह्टं मूरदुवारं न चाङिजा ॥ ११३
गो-वसह-सगडठाणं दाहिणएु वामए तुरंगाणं ।
गेहस्सं वारभूमी संरम्गा सार याणं ॥ ११४
गेहाड वाम दाहिण अणिम भूमी गहिज जद कलं |
पच्छा क्व न छिजद् इय भणियं पर्मनाणीहिं ॥ ११५
॥ इति ्रीचन्द्राङ्ज-टद्कर-फेरू-विरचिते वास्तुसारे
गृहखक्षणप्रकरणं प्रथम समाघ्रम् ॥
नगर
९ गिहवादिरभूमिए। २ साखुप ठाणं । ३ पुव्वनाणीरहि 1 .
[ द्वितीयं विस्वपरीक्षाप्रकरणम् ।] ` '
हूय गिहकक्खणमावं भणिय भणामित्य विवपरिमाणं 1“
गुणब्दोसरक्णाईं सुदासुदं जेण नेदं ॥ १ '
छनत्तत्तयउत्तारं भार-कवोलखउ सवण-नासाओ ।
सहयं जिणचरणगे नवग्गहा जक्ख-जक्लिणिया ॥ २ ,
विवपरिवारमन्घ्े सेरस्स य वण्णसंकरं न सुह ।
पम्ंगुरुप्पमाणं न सुंदरं हव कडयावि ॥ ३
अन्चुन्नजाणु-केधे तिरिए केसंत अंचर्ते यं ।
सुत्तेगं चररंसं पजंकासण सुहं विवं ॥ ४
नव तार हवद्र रूवं रूबर्स य वारसंगुखो तालो ।
अंगुर अद्ृहियसय उदं चास्षीण छप्पन्नं ॥ ५
मारं १ नासा २ वयणं ३ गीव ४ हियय ५ नाहि ६ गुञ्ज ७ जंघाइं<।
जाणु ९ य पिडि १० य चरणा ११ इक्तारस ठाण नायव्वा ॥ ६
चठ ४ पंच ५वेयष्रामा ३
रवि १२ दिणयर १२ सूर १२९ तह य जिण २४ वेया ४।
जिण २९ वेय ४ भायसंखा कमेण इय उड्रूेण ॥ ७
भारं १ नासा २ वयण ३ गीव ४ हियय ५ नाहि ६ गुज््ञ जाणू य८।
आसीणविवमाणं पुव्वविही अंक संखाई ॥ ८
१ जाणिज्ना1 >वासरीण।
† सद्वितपुस्तके पाान्तरस्पेण उद्धृत, पाट"
भार नासावयणं थण्ठुचच नाहि गज्छ उख य 1
जाम जंघा चरणा इय दद ठाणाणि जाणिस्ा ॥ ६॥
चउ पच वेय तेरस चडउद्स दिणनाह तह य जिण वैया ! =
जिण चेया भायसखा कमेण इय उहरूचेण ॥ ७ ॥ द
घास्तुसार - दितीयप्रकरण ९
मुहकमल्ु चउदसंगुर कन्नंतरि वित्थरे दह स्गीवा ।
छन्तीस उरपएसो सोह कडि सोर तणुपिडं ॥ ९
कन्न॒ द्द् सोर वित्थरि चड उवरे तिनि हिष्ट खि खणं ।
नकु ति वित्थरि दुदए सिरिवच्छो दु दहं तिय पि ॥ १०
[ एतदतन्तरंभुद्रितपुके निन्चकिसिता गाथा जिका उपरभ्यन्ते-
नकसिहागन्भाओ एर्गतरि चक्खु चडरदीहत्ते ।
दिषटुदई इछ डोरई दुभाद् मदद छदीहै ॥ १
नकुं ति वित्थरि दुदए पिंडे नासग्गि इक अद्धु सहा ।
पण भाय अहर दीहे वित्थरि एगंगुल जाण ॥ २
पण उदई चर विस्थरि सिखिच्छ वेमसुत्तम्ंमि ।
दिबद॑युट थणवद्ं वित्थरं उत्ति नाहेगं ॥ ३ |
सिरिवच्छ सिहिण कक्खंतर॑मि तह युसर पण सरट् ५५।८ कमे ।
मुणि ७ चड ४ रवि १२ टं ८ बेया कुहुणी मणिवंु जंघ जाणुपयं ॥ ११
[ अत्र पुनः मु° पु०° एतद्राथानन्तरं अघोगता अधिका गाथा विचन्ते-
थणसुत्त अदोभाए युय बारस अंस उवरि छदि कधं |
नादीउ किरइ बदु कधा केस अंताभो ॥ १
कर -उयर -अंतरेगं चड वित्थरि नद दीहि उनच्छ्ग ।
जरवहू दुदय ति वित्थरि शहुणी इच्छितरे तिन्नि॥ २
बभसुत्ताओ पिंडिय छ जीव दह कन्ु दु सिहण दु भां ।
दु चिबुक सत्त युजोषरि थयसंधी अद्र पयक्षारा ॥ ३
जाणुअ यहसुत्ताओ चउदस सोटस अढार पदसारं ।
समसुत्त जाव नाही पयकककण जाव छन्भार्य ॥ 9
पदसार गम्भ्रेहा पनरसभाषटहिं चरण अंगं ।
दीरहगुलीय सोरुस चउदसि भाए कणिद्धिया ॥ ५
मुद्रितपुस्तके पास्मेदो यथा-
कच दह तिनि वित्थरि अह्ाई हिदि शकु आधारे ।
केसत बडु समसि सोयं पुण नयणरेह समं ॥ १०
१ मुसल छ पण अह्र कमे।! २ चद्ुवेया। ३ कूहिणी ।
छ
उड्कर-फेरू-विरचित
करयल गज्ाउ कमे दीरहगुलि नदे पक्सिमिया ।
छ कणिद्धिय भणिया गीबुटए तिन्नि नायव्वा ॥ ६
मज्न्ि महर्थगुछिया पण दीहे पक्खिमिअ चउ चरो ।
ठु अंगुलि माय तियं नह इकिकं ति अंगु ॥ ७]
अंयुद्सहियकस्यल वदरं सत्तयुरस्स वित्थीरे ।
चरणं सोरस दीह तयदि. विल्यिन्न च उदषए ॥ १२ ॥ -
[ एतदवाथानन्तर मुद्रिते निम्नगंतेका गाथा अधिका लभ्यते-
शीव तह कनन अंतरि खणे य वित्थारि दिवह् उद् तिगं ।
अंचछिय अद्र चिर्थरि गदिय युद जाव दीदेण ॥ १
छन्भाय अहरदीहे चक्खुपण दीह अपिर ।
तित्नि सिहिण चड नाही नासा उर नाहि खुत्तेगं† ॥ १३
केसंत सिहा गदिय प॑चट् कमेण अंगुरं जाण ।
परसुडरेचक्ं करचरण विह्रसियं निच ॥ १९
[ सद्रितपुखके एतद्गाथानन्तर निन्नोदृता गाथा अधिका रम्यन्ते-
नकं सिखिच्छ नादी समगम्मे भसु जाणेह ।
तत्तो अ सयलमाणं परिगर्मिपस्स नायव्वं ॥ १
सिंदासणु विवराभो दिवहूयो दीदि विर्थरे अद्धो ।
पिंडेण पाड धडिओ स्वग नव अव सत्त जुम ॥ २
उभयदिति अक्ख-जक्खिणि केसरि गय चमर मज्ज चकथरी ।
चउदस वारस दस तिय छ भाय कमि इअ भवे दीद ॥ ३
चक्धरी गरूंका तस्साहे धम्मचक् उभयदितं ।
दरिणजञं रमणीयं गदियमन्छमि निणचिर्डं ॥ £
चउ कण दुनि छद् वारस हस्र दुनि अह कणण ¦
अड अक्परद्धीए एयं सीहासणस्सुदयं ॥ ५
गदिय-सम-बसुमाया तत्तो इगतीस चमरधारी य ]
तोरणसिर दुबारस्र इय उदयं पक्खवायाण ॥ &
सोल माए स्वं धुछियसमये छरि वरालीय ।
दख वित्यरि बावीसं सोरस पिंडेण पखवायं ॥ ७
१ विच्थारो। {ख पु नास्ती गाथा।
वास्तसार -दवितीयप्रकरणं
छत्तदधं दसभायं पंकयनाङेग तेर मारुधरा ।
दो माए धुंुलिए तट वसधर्वीणधरा ॥ ८
तिरुयमञ्खमि धट दुभाय थयुखिय छि मगण्युहा ।
इ उभयदिसे चुरसी दीह उउलस्स जाणेह ॥ ९
चडउवीसि भाई छत्तो धारस तस्युदइ अट्टं संखधरो ।
छरहि वेणुपत्तवष्टी एवं उउलदए पनास ।॥ १०
मारधर सोकसंसे गईद अद्भारसंमि ताणुबरे ।
हरिणिदा उभयदिसं तभो अ दुदुहिअ संखी य ।॥ ११
छत्तत्तय वित्थारं वीसंगुल निग्गमेण दह भायं ।
भामंडल विस्थारं बावीस अट पदसारं ॥ १२
विबद्ध उररुपिंडं छत्तसमं गेहवह नायव्चं |
थणसुत्तसमा दद्धि चामरधारीण कायच्वा ॥ १३
जई हंति पंच तिस्था इमेहि माए तेवि पुण इजा ।
उस्म॒ग्गियस्स जुअरं विबजुगं भूर विबेगं ॥ १४]
वरिससयाओ उड जं बिं उत्तसेहि संठवियं ।
विख्यं(यलौयु वि पूृडजईइ ते विवं निष्टं न ज ॥ १५
मुह-नक-नयण-नहि कडिर्भगे मूखनायगं चयह् ।
आह्रण-वत्थ-परिगर-चिन्हायुहमंगि पजन ॥ १६
धारदेवा$ई बिबं विख्य्यलौगं पुणवि कीरए सलं ।
कट्रु-रयण-सीरुमयं न पुणो सजं च कर्दूयावि ॥ १७
पाहाणलेवकद्रा दंतमया चित्तछिहिय जा पडिमा ।
अप्परिगर-माणाहिय न सुंदरा प्ूयमाण गिह ॥ १८
इकंरुखाद् पडिमा इक्ारस जाम गेहि पूष्ल्ना ।
उड़ पासादइ पुणो इय भणियं पुव्वसूरीहिं ॥ १९
नह-अंगुरीय-वाहा-नासा-पयभगिणुच्मेण फर ।
सत्तुभय-देस्भगं बंधण-करुखनास-दव्वखयं | २०
१ निप्फरं। र्नादी! २खेर)
द खष्ठर-फेरु-विरचिस
पयपीट-चिन्ह-परिगरमभगे जण-जाण-भिचहाणि कमे ।
छन्त-सिरिवच्छ-सबणे र्च्छी-सुह-वंघवाण खयं ॥ २१
पडिमा रउद जा सा कारावय हंति सिपि अहि्यगा ।
दुव्वण्णं द्व्ववरिणासा करिसोयरा ऊुणई् दुन्भिक्खं ॥ २२
वहुटुक् वक्नासा हस्संग खयंकरी य नायवा ।
नयणनासा कुनयणा अप्पमुहा भोगहाणिकरा ॥ २३
कडिहीणायरियहया खुय-वंधव हणद्र हीणजंघा य ।
हीणासण रिदिद्या धणक्खया हीणकर-चरणा ॥ २४
उत्ताणा अत्थदह्रा वंकगगीवा सदेसभगकरा ।
अहोखहया य सनिता विदेसगा वद नीञचुचा ॥ २५
विसमासण वाहिकरा रोरकरऽन्नायदव्वनिप्पन्ना ।
हीणाहीयंगपडिमा सपक्ख-परपक्खकटुकरा ॥ २६
उड़मुही घणनासा अप्ूया तिरियदिद्टि विन्नेया ।
अद्थङ्दिद्टिं अयुदहा वइ अहोदिष्धिं विग्घकरा ॥ २७
चेउसुव सुराण आयुह् हवत केसंत उषप्परे ज् ता ।
करण-करावण-यप्पणहाराणप्पाण देसहया ॥ २८
चउवीस जिण नवग्गह जोदणि चसद वीर वावच्रा 1
चउवीस जक्ख-जक्खिणि दह् दिहवड् सोढ विजसुरी ॥ २९
नव नाह सिद्ध चुरुसी हरि-हर-वंभिद्-दाणवाङणं ।
व्नक-नाम-भयुह वित्थरगेथाउ जाणिज़ा ॥ ३०
॥ इति परमजेन-ग्रीचन्द्राद्लन-ठ्ुर-फेरुविरचिते वास्तुसारे
विस्वपरीक्लाप्रकरणं द्वितीयं समास् ॥
अ
९ इुव्वङ । > चउभव, चउभेभ । ३ सोखस ।
[ तृतीयं प्रासादविधिप्रकरणम् 1]
भणिय गिहरुक्छणाद्रं बिबपरिक्खादं सयल्गुणदोसं ।
संपह् पासायविही संखेबेणं निसामेहं ॥ १
पटमं गड़ावसथं जरतं अह ककर भरियसं ।
कुंमनिबेसं अट्रं खरस्सिखा तयणु सुत्तविही ॥ २.
पासाया अद्ध तिह्ायपायं च पीट-उदञ य ।
तस्ति. निगमो हृदं उववीढु जहिच्छ माणं तु ॥ ३
अडथरं १ फुष्ियओ २ जाडयुहो ३ कण ४ तह य कयवारी ५।
गय १ अस्स २ सीह रनर 9 हंस ५ पच थर इय भवे पीठं ॥
सिरिविजउ १ महापउमो २ न॑ंदावत्तो य ३ ख्च्छितिलखओ ४ य ।
नरवेय ५ कमल्हंसो & कुंजर ७ पासाय सत्त जिणो ॥ ५
[ इतोऽग्े सुद्वितपुस्तके निश्नोद्धृता अधिका गाथा छभ्यन्ते-
बहुमेया पास्राया अस्संखा चिस्सकम्मणा भणिया ।
तत्तो थ केएराई पणवीस भणामि यिषा ॥ १॥
केसरिअ सत्रभदो सुनदणो नंदिसाट् नदीसो ।
तह मदिरु सिरिषच्छो अमिभन्युब हेमर्बतो अ ॥ २॥
हिमक्ड कदैासो पुहविजभो ईदनीड महनीखो ।
भूधर् अ रथणद्रूडो बहड्ज्ञो पडमरागो अ ॥३॥
चज्ेगो युउडजु अष्रावओ रायस गरुडो अ ।
सहो अ तह य मेरू एए पणवीस पासाया ॥ ४॥
पण अंडयाई सिहरे कमेण चउबुह्धि जा हवई मेरू। -
मेरूपासाय अंडयसंखा इगहिय स्थं जाण ॥ ५॥
एएहि उवजंती पासाया विविह सिहरमाणाओ ।
नव सहस्सं छ सय सत्तर वित्थरगंथायो ते नेया ॥ ६ ॥
चउरंसंमि उ खित्ते अद्धा दु बुद्धि जाव बावीस्ा |
भायविरारं एवं सवै वि देवभवणेघ्ु ॥ ७॥
१ (५ । > गड्विवरं । ३ जलठेतं। ७ ककरंतं । ५ कुण । ६ हौड ।
९८ ख्ुर-फेर-विरचित
चकूणा चमदा सव्वे पासाय होति नियमेण ।
करूणस्सुभयदिसेहि दलद्रं जा होति मदां ॥ ६
पडिरह १ वोिजरया २ नंदी ३ सुकमेण ति पण सत्त दल |
प्वियं करणिक्कै अवस्स भद्स्स दण्ट दिते ॥ ७
दो भाय दरूणओ हद् कमेण पाडण जा भवे नंदी ।
पार्य], एग १, दुसद्कं २, पवियं करणियं भदं ॥ ८
मदद दस भायं तस्साओ मू नासियं एगं । ,
पउणाति तिय सवातिय २) ३) ३ दें कमेण नायव्वं॥ ९
छरणं पडिरह् य रदं भद मुहभद मूट्ंगादं ।
नदी करणिक पव तिल्य तवंगाद भूसणयं ॥ १०
1 इति विस्तरं ॥ ।
खुर १ ऊुमर कठसदे कद्व छि मच्ची जंघा य६ छन्नि७ उरजंषा ८।
भरणि ९ सिरवट्धि १० छज्य ११ द्राङ् १२ पार १३ तेर थरा ॥ ११
१9 इग तिय दिवु (क
२ [| [र| प्णस्हाङइग दु दिव दिवढो य ।
५२२] ग दिग गा
पणवीसं तेर थरमाणं ॥ १२
| ९ | पासायस्त पमाणं गणिज सहभित्ति ऊंभगथराओ ।
तस्स य दस भागाओ दो दो भिचीहि रस ६ गन्भे ॥ १३
ङ्ग दु ति चउ पण हत्थे पासादइ खुराड जा पहृथरो ।
नव सत्त पण ति एगं अंगुरज्तं कमेणुदयं ॥ १४
इच्वादई ख-वाणंते ५० पडिदत्ये चद्र्संगुल विहीणा ।
श्य उद्यमाण भणियं अओ य उदं भवे सिरं ॥ १५
ह 1 पडिदोति १ उच्नि। २दो भाय हव चरणो! ३ करणिकं। कमेण
प्येपि पडिरहाईख 1 ५ तिखुकमि। ६ पार 1 छण
वास्व॒लार-ठतीयश्रकरण ` ` = ` द.
पाङ दृण भूमजु नागर सतिहार दिष् सप्पाओ ।
दूवड सिरो दिवड़ो सिरिवच्छो परणं दूणो य ॥ १६
छज्ररड उवरि तिहु दिसि रिया जुयविब उवरि उरसिहरा ।
करणें चारि क्रुडा दाहिण -वामगि दो तिर्या ॥ १७
उरसिदहर कूडमन्छे सुप्रररेदाय उवरि चारि ख्या ।
अर्वैरि क्रूणेहि रिसी आवल्सारो य तस्सुवरे ॥ १८
† पडिरह बिकन्नमञ्छे आमटसारस्स वित्थरदरुदए ।
गीव॑डयचंदिकीमरसारिय परणु सवा इगिमो ॥ १९
आमटसारय मञ्छ्े चंदणखह्रासु सेयपट्ूुया ।
तस्पुवरि कणयपुरिसो घयपूर तओ य वरकर्सो ॥ २०
पाहणकद्टि्टमओ जारि पासार तारिसो कर्सो ।
जहसत्ति पद्रठ पच्छा कणयमअ र्यणजडिओ वाँ ॥ २१
[ एतद्वाथानन्तरं सुद्धितपुस्तकरे निश्नगतं गाथाद्सयमधिकं विद्यते- .
छा जाव कं [भाय] इगवीस करिवि तत्तो अ।
नव आद् जाब तेरस दीहुदये हवई सडणासो ॥ १
उदयद्धि विहियपिंडो पासायनिराड तिक च तिङ्ड य ।
तस्मुवरि हवई सीहो मंडपकलसोद यस्स समा ॥ २]
सुहयं इगदारुमयं पासायं करूस-दंड-मकडियं ।
सुहकट सुदिरटं कीरं सीसम खयरंजणं महूवं ॥ २२
नीरतरदर विभत्ती भद विणा चरउरसं च पासायं ।
पसायारं सिहर करंति जे ते न नंदति ॥ २३
१ दुणु पाञणु।! २दाविड) ३पङण। ४ अंतर। ५ चंडिक्का।
सवादक्िकि 1 ७अ] < खुदिह।
† पटिरद विकच्नमञ्खे आमरकसारस्स वित्थरो होड ।
तस्सद्धेण य उदम तं मञ्छे ठाण चत्तारि ॥
गीवंडय चंडिका आमरखुसारीय कमेण तव्भागा ।
पाङण सवाड इगेगो आमरुसारस्स एस विही ॥
-इति पाठान्तरं मुद्वितपुस्तक्रे ¦ -
दे पण
धुव गन्दीय भान मन्दिर अ फेर -विरचित
अद्यु कमसो पायेयुर बुह्धि कणयपुरिसो य |
करई धुव पासाएु इग हत्या ख-वाणं ते (५०) ॥ २४
दइगहये पासाए दैडं पणंगुटं भवे पिंडं !
अर्दरुर बुह्धि कमे जा कर पन्नास कल्ुदए ॥ २५
निष्पन्ने वरसिहरे धयहीणसुराख्य॑मि अुरटिद ।
तेण धयं धुव कीरडइ दंडसमा सक्खञुक्खकरा ॥ २६
धास्रायाओ दुवारं हत्थप्पद सोटसंयुरं उदए ।
सैव पंचम वित्थारे अहवा पिहुखाड दृणयुदए ॥ २७
[अवर सुद्रितपुस्तरे पपा गाया अधिका विदते-
उदयद्वि विस्थरे यारे आयदोस विसुद्धए ।
अंगुरं सडुपद्रं बा हाणि वुद्धि न दूए ॥ १]
निह्ाडि वारउत्ते विवं साहेहि हिट पडिहारा !
वूणेहि अद्ध दिसिवद् जेघा-पडिरहद् पिक्डणयं ॥ २८
पासायतुरिय भागप्पमाणविवं सरउत्तमं भणियं ।
रा स्यण विदुम धाडमय जहिच्छमाण वरं ॥ २९
दस भाय कयदुवारं उदुवर उत्तरंग मन्घ्ेण ।
पटमंसे सिवदिद्री वीए सिवसत्ति जणेह् ॥ ३०
सयणासण सुर तदृए ख्च्छीनारायणं चर्थे य
वाराहं पचमए छदटंसे लेवचित्तस्स ॥ ३१
सासण सुर सत्तमए सत्तम सैत्तमि वीयरागरस ।
चंडिय भ्रव डमे नवमिदा छत्त - चमरधरा ॥ ३२
दसमे भाएु खनं जका गंधव्व-रक्खसा जेण 1
दिवा कमि ठविजइ् सयल्ुराणं च दद्र य ॥ ३३
१ पासायस्स।! २
| इच्येपद 1 ३जा हत्य चउक्रा हंति तिगढुग बुद्धि कमाड
पन्नासं 1 ४ सव! ५ ] वि
सत्तेसि ! ६ अडसि !
वास्तुसार- तीय प्रकरण १०९१
भागहर भणंतेगे सत्तम सत्त॑मिं दिष्टि अर्दता ।
गिहदेवा पुणेवं कीरद जह होड वुद्िकरं ॥ २४
गन्भगिहर्द पणंसा जक्खा पटमंसि देवया बीए ।
जिण-किन्द-रवी तद्ए वैभु चरत्थे सिवं पणगेशै। ३५
` नहु गन्मे ठाविजद् ठिगं गन्भे चद नो कटवि ।
तिख्अद्धं तिमर" ईसणे किं पि आसरिं ॥ ३६
भित्तिसंरम्गधिवं उत्तिमपुरिसं च सव्वहा असहं ।
चित्तमयं नागाद्रं हवंति एए सहावेणं ॥ ३७ ॥
जगई पासायंतरि रस ६ गुर्णं पच्छा नवग्गुणा पुर ।
दाहिण-वामे तिडणा इय मणियं खित्तम॑ज्ञायं ॥ ३८
पासायर्कमियग्गे गूढक्खयमंडवं तर छे ।
पुण र॑गर्मडवं तह. तोरण - ँबलणमंडवयं ॥ ३९
दाहिण-वामदिसेहिं सोहासंडवं गरक््खजुय साख ।
गीयं नहविणोयं गंघव्वा जत्थ पञ्ुणंति ॥ ४०
पासायसमं विरणं दिवड्यँ ` पडण दूण वित्थारे» ।
सोवाण तिचि ` उदए चरकी मंडवा होंति ॥ ४१
कुमी थम भरण सिरयपद्टं इग पंच पडण सप्पायं ।
इग इय नव माग कमे संडव पिहुखंडं अद्द्ए ॥ ४२
पासायञअट्रसंसे पिडं सकडिय-कलरस-थंमस्त ।
द्समंसि वारसाहा सपडिग्बह कलु दृणुदए ॥ ४३
पटटस्स आयहिषटं छज्लयदिटं च सव्वसुत्तेगं ।
उदुंबरसम ऊुंभिय थंभसमा थस जागेह ।॥ ४४
१ सत्तसि। २ अरिहंता। ३ देवां! ४ भशिदद्। ५ तलसित।
दआसरिओ । ७ समाखेण । ८ णुणा। ९ मञ्चं । १० कमल अग्ने । ११ पुण ।
-१२.सवखाण । . १२ दिउड्यं । १४८ वित्थारे! १५ ति उद्प चडद्ए पण ।
१६ चट्धाड अद्धुदप) १७ कटु दिवडदप् ।
१०२ उद्र- कैर -विरचित
जलनौख्यार फरिसं करंतरे च जवा कमेणुचरं ।
जगदईय भित्ति उदएु छजयै सम चउदिसेहिं पि ॥ ४५
अग्गे दाहिण-वामे अट्ृट्ु-जिणिद्-गेह चरवीसं ।
मूर सैलागारै दमं पकीरए जगड मन्घधमि ॥ ४६
रिसहाई जिणपंती पासायाओ य वामियदिसाओ ।
ठाविज पिद्िमगगे सब्वेहि जिणारृए् एवं ॥ ४७
चउवीसतित्थमन्जञे जं एगं मूखनायगं हवद् ।
पतीद् तस्स ठाणे सरसस् ठवसु निन्भ॑तं ॥ ४८
चउतीस बाम-दाहिण नव पष्ठी" अद पुरड देहुरिथ ।
पौसाय सूर एगं वावन्नजिणा्यं एवं ॥ ४९
पणवीसं पणवीसं दाहिण-वामेु पिट इकारं ।
दह् अग्गे नायव्वं इय वादत्तरि जिणिदाटं ॥ ५०
अंगविभूसणसहियं पासायं सिहरबद्-कटमयं ।
नहु गेहे पूदज्द न धरिजइ कितु ्जत्त वरं ॥ ५१
जत्त कए पुणु पच्छा ठ्विज रहूसार अहव सुरमवणे ।
जेण पुणो 18 जिणजत्त वर संघो ॥ ५२
गिहदेवारं कीरइ द् विमाण पुष्फयं नाम ।
उववीट पीटफरिसं जहतत चउरंस तस्युवरे, ।॥ ५३
चउ थंभ चउ दुवारं चड तोरण चड दिसेहि छजउडं ।
पंच कणवीर सिहरं & ५ दुवारेग सिहरं वा ॥ ५४
अट् भित्ति-ख्ज ओवम सुराख्यं आयुध कायव्वं ।
सम चउरंसं गन्मे तेस्सारसवायओ उदृएु ॥ ५५
९ नाचियाड 1 २ छद । 8 सिरो । ४ सीददुवारस्स द्ादिणदिसाओ ।
मडि 1 ६ देदर्य। ७ मू पासाय 1
ए॥
८ जन्तु । ९ तस्खुवरि। १० पग डु
११ तत्तो अ सवायभो उद्ण्ु। ५ ५
वास्तुसार - तृतीयं प्रकरण १०३
गन्भाड छल ओ हृद सवाड सतिहा दिवु वित्थारे ।
वित्थारार सबाओ उदएण य निर्गमे अद्धो ॥ ५६
छल-उड-थंम-तोरणजुय उवरे मंडओवमं सिहर ।
आलट्यमजञ्खे पडिमा छजयमञ्छ॑मि जख्वद्रं ॥ ५७
गिहदेवाख्यसिहरे धयदंडं नो करि कष्रयावि ।
आमरसारयं करसं कीर इथ भणिय स्येह ॥ ५८ `
, सिरिधंधकटस-कुरसंमवेण चंदाञुएण फैरेण ।
कृन्नाणपुरटिएण य निरप््खिरं पुव्वसत्थाद्रं ॥ ५९
{सपरोबगारहेड नयण-मुणि-राम-चंद (१२७२) वरिसम्मि ।
विजयदसमीडह् रद्रयं गिहपडिमारक्खणाईणं ॥ &°
इति परमजैनश्रीचन्द्राइजठकुरफेरूबिरचिते वास्तुसारे
प्रसादविधिप्रकरणं ततीय समाप्तं ॥
॥ एर्व वास्तु प्रथरणं चय गाथा २०५॥ `
===
~
[1
९ दवद छु । २ करिज्ञइ कयावि ! २ आभल्सारं । `
1 सुद्धितपुस्तकै इय गाथा पूर्व छिखिता, पश्चाद् उपरितसगाथा वियत `
' " ` उ्छ्कर के रचिता
खरतरगच्छयुगम्रधानचतुःपदिका ।
नमो जिनाय । |
सयट सुरासुर वंदिय पाय, वीरनाह पणमवि जगताय ।
घुमरेविणु सिरि सरस देवि, जगवरचरिड भणि संखेवि ॥ १
ख॒हमसामि गणहर पय॒ः । ॥
सिरि जगपवर नाम वर मंत, सुमरहुं अणुदिणु मत्तिय ।
लीखदर तरिवि भवोवहि जेम, कमि कमि पावहु सिदिसुह् ॥ धूवकं
वद्धमाणजिणपद्धि पसिद्ध, केवनाणीगुणिहि समिद! |
पंचसु गणहर जुगवर पटमरु, नमह सुहंमसामि गुरु अमस ॥ २
मजा अह्र पंच सय तेण, इछि रयणि पडिवोहिय जेण ।
खरारपासि छिड संजमभार, सरहु सरह सो जंबुकुमार ॥ ३
पभवस्ि सिजंभउ सगुरु, जसोमहु सूरीसरु पवर ।
सिरि संभूयविजउ मुणितिल्ड, पणमहु मदवाहु गुणनिर्ड ॥ ४
भदवाह सूरीसरपासि, चउदस पुव्व पिय गुणरासि ।
भजिड जेण मयणसडवाड, जय घु शूकिमहु सुणिराउ ॥ ५
दूसमकाि तुक जिणकष्यु, अज महागिरि गुरु माहय्यु ।
अज घुहत्थि शुणहु धरि भाउ, जिणि पडिबोषटिड संपद् राड ॥ ६
संति्रि कय संघट् संति, चउदिसि पसरिय जसु वरक्रि्ति ।
तासु पट्टि हरिभहु खणिढु, मोहतिमिस्मर हरण दिणिदु ॥ ७
संडिरुस्रि तद् अज समुह, अज्र मंगु जणकंद्रवचंदु ।
अञ्न धम्य धर पयडिय धम्मु, मदगुत्तु दंसिय सिवसम्सु ॥ ८
बयरसामि पन्माविय तित्यु, अज रक्खिड वोहिय जणस्यु ।
अज नदि यारु वंद नरु, अज नागहत्थीसर सरहु ॥ ९
रेवयसामि सरि खंडि, जिणि उम्पूखिय मबटुह्सह ।
हेमवु ज्ञाय वहु मति, तहु जेम भवसायरु ज््तति ॥ १०
ॐ
3.0 व्या 49१ १११ ४
नागज्ोयसूरि गोविद, भूडइदिन्न रोहि सणिद् ।
दुसमसूरि उम्मासय सामि, तह जिणभदसूरि पणमामि ॥ ११.
सिरि हरिभदस्रि सखणिनाहुः देवभदसूरि षर जुगवाहु । ,
नेमिचंद च॑दुजलरकित्ति, उल्ञोयणसुरि कंचणदित्ति ॥ १२
पयडिय सूरिमंतमाहप्पु, रूविञ्श्चाणि निज्ियकदप्यु ।
कुटुजल जस भूसिय भवणु, स्ह वदमाणसुरि रयणु ॥ १३
अणद्िटपुरि दह अस्थाणि, जिणसरसूरि सिद्धंतु बखाणि ।
चउरासी आदरिय जिणेवि, ड जसु वसहिमग्गु पयडवि ॥ १8
जिणि विरईू्य कषा संवेग -रंगसार् तह सत्थ अणेग ।
नियदेसण रंजिय नरराय, तसु जिणचंदसुरि सेवहू पाय ॥ ५
वर नव अंग वित्ति उद्धरणु, थभणि पास पयड फुडकरणु ।
अभयदेवसुरि मुणिवरराउ, दिसि दिसि पसरिय जु जसवाड ॥ १६
नंदि न्हवणु वि रहु सपद,
ताररास् जुवद मणि सिट ।
निसि जिणह्रि जिणि वारिय अविहि
थुणुहु सु जिणव्टहसुरि सुबिहि ॥ १७
जोदणिचक्ष उजेणिय जेण, वोहिरउ जिणि नियञ्चाणवटेण ।
सासणदेवि कदि जुगपवरु, सो जिणदत्त॒ जय गुरपवरु ॥ १८
सह॒जरूवि निज्िय अमरिद; जिणि पडिबोहिय सावयविद् ।
पच महव्वय दुद्र धरणु, नदर जिणचंद् सुरिमुणिरयणु ॥ १९
अजयमेरि नरवद्पन्चस्खि, करि विवाड बुहियणजणसकिख।
जिणि पउमप्यहु र्ठ जयपत्तु, जिणवद्रसूरि जय सुचरित्त॒ ॥ २०
नयरि नयरि जिणमंदिर ठविय, तोरण दंड करस धज सहिय ।
तेवीसा सड दिकिय साहु, जिणसरसूरि जयड गणनाहु ॥ २९
२७
१०८ उड्करफेरुविरचित ज्योतिपसार ग्रन्थान्ते छिखितानि कानिचित् पदानि
उत्तरायां महिपीनाम योगिनी योगनामिनी ।
ददाभ्यां च द्वितीयायां उदयं ऊुरुते सदा ॥ ३
एकादख्यां तृतीयायां मेपरूढा तु योगिनी ।
कुमारी नामविन्नेया आग्नेयी ददयते यथा ॥ °
श्वानष्छिगता देवी चतुधीं दरादद्यी तथा 1
नैया दिदमाख्य सिहनारायणी सदा ॥ ५
वाराही योगिनी नाम सिटाखूढा सखुदर्थरा
पंचम्यां चयोद्छ्यां च दक्षिणे उदयं सदा ॥ दै
वारुण्यां दिकामाखदय ब्राद्यणी चृपगामिनी 1
चतुर्दरयां तु पयां च उदयं कुरते सदा ॥ ७
चरित्वा तु खरण्ष्टिं चाशुडी चण्डरूपिणी ।
सप्तम्यां पर्णिमायां च वायव्ये उदयं सदा ॥ ८
महालश्मी महादेवी हईरान्यां घरपसंखिता।
काके रूढा सदा देवी अमावास्याटमीदिने ॥ ९
एवं लु योगिनीचकर ज्ञायते यस्तु मानवः ।
विजयं लभेत् संग्रामे युद्धेषु रणसंकटे ॥
यूते वा विवदारे चा विवादे जायते छुभम् ॥
श्वानङ्ङकटनारानां मेषेण महिमादिषु 1
विजयं जायते तस्य यस्य ष्ठे तु योगिनी ॥
अथ सन्छखयोगिन्वां संग्रामेषु रणेषु च ।
गम्यते युद्धते पुंसां न सिद्धिर्जायते कचित् ॥
॥ यो गिनी चक्रम् ॥
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(अलकण), १ ए०्व्णलप् प्राह्ण ग वकवम कताः पर [प्न
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1 + तप , एमन, प्रणवण ८नाल्ुल, एतै भात् ओप दभ 11274
वि, एितथालः --1\5 47577?
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० पट एषपृल क थग्वीरव्थूणपत एलस्ला कौट कोठ म [ण्ठ ॐत
£ प्रल्लकोत्ा ०६ वकार ल्व 9 कलोष्य लोठते तवत्ल्त्, षा
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दपा कादता श्तोत्टूलयलत प्राकता प्टवलह्ुवछला एल दलह
कपप्राहटु लण्याः ला गननयालोल्छ फलद्ललोपड १८८ पलत
पाल | छ वप्राः (प्ण एवाह लय फलण्लनृाऽ वल तल्णशषटुला
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0] -{. 770, 3, 1784767 1961
१.)
६--ध्रीभुवनेश्वरीमहास्तोत्रम्--पुथ्वीधराचायेविरचित, कविपद्मनाभकृत
भाष्यसहित, सम्पादक श्रीगोपालनारायण बहुरा एम.ए. उपस्षञ्चालक
राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर ।
क्. “मूल स्तोत्र कौ प्रवोधिनी टीका ग्रौर पाद-टिप्पसियों मे जो अनेकानेक
पाठान्तर दयि गये है, उनसे इस प्रकाशन की उपयोगिता तथा महत्व बढ़
गया है),
२६ जुन, १६६१ महारगजकरुमार डा° रघुवीर्रसिहं
एम.ए. एल एल बी. डी. लिट्. एम पी.
सीताम
ख. “दस स्तोत्र में भुवनेदवरी के स्वरूप, ध्यान श्रौर मंत्रों का सम्यकरूपसे
विवेचन है । साथ दही भ्रन्य १२ स्तोघ्रोंके हारा भुवनेश्वरी के माहात्म्य की
पर्याप्त सामग्री एकत्र को गई है । यथासंभव उपासनासम्बन्धी करई ज्ञातव्य
विषय दिए गए दहं । प्रारंभ में श्रास्ताविक परिचिय' नाम से श्रीगोपालनारायण
बहरा ने विदत्तापू्णं भूमिका लिखी है । उससे इस स्तोत्र तथा इसके विषय को
समभने मे बड़ी सहायत्ता मिलती है ।
ता० २० श्रक्टूुवर, १६६१ --देनिक दिन्दुस्तान, नई दिल्छी
७--राजस्थानी साहित्य सग्रहू--
भाग १. सम्पादक श्रीनरोत्तमदास स्वामी, एमणए.
भाग २. सम्पादक श्वीपुरुषोत्तमलाल मेनारिया, एम.ए., साहित्य-रलन ।
1 साहित्य श्रौर भाषा की दृष्टिसेही नहीं, इतिहास-सम्बन्धी भी बहुत
[ 12 1
अधिक सामश्री उक्त वार्त-सार्हित्य मे प्राप्य है। तत्कालौन श्राचार-विचार
रहन-सहन, धामिक भावनायो श्नौरश्रव विद्वासौ श्रादि की ठीक-टीक जानकार
प्राप्त करने के लिये इम प्रकार के ग्य साहित्य का गहरा श्र्ययन सर्वथा
श्रनिवार्यं हो जाता है । पाद-टिप्पणियौ मे दिये गये पाठान्तरे श्रौर सराय
ही भ्रावक्यक शब्दार्थो से इम सस्करण का विदेय महत्व हौ गया है । इन दोनो
भागो मे दी गई भूमिकाये भी उपयोगी श्रौर विचार्रेरक है ।
ता० २६ जून, १६६१
८--स्व० पुरोहित हरिनारायणखजो विद्याभूपण-ग्रथसंग्रह-पुची-- सम्पादक
श्रीगोपालनारायण वहुरा, एम.ए श्र श्रीलकष्मीनारायण गोस्वामी दीक्षित ।
सवर्मयि पुरोहित हरिनारायणजौ स्वय ही एक सजीव सस्या ये } उन्होने
एकाकी जो काम किया, वह् श्रनैकानेक सस्थाप्री के मिल कर काम करते पर
भी उतनी पूर्णता श्रौर तत्परता से किया जाना कठिन ही होता । श्रत्त उनके
निजी पुस्तकालय के राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान को सौपे जाने से चस्तुत
एक वडी सास्छृतिक निधि कौ सुरक्षा हो गई है, जिसके लिये राजस्थान ही नही
मारत का समूचा दिक्षित समाज पुरोहितजी के सपुत्र श्रीरमगोपालजी का
सदैव शरनुगृहीत रदेग। । श्रत पेते महत्व के पुस्तक-सग्रह की यह पुस्तक-सूची
श्रवदय ही विद्रानो, सोधको श्रादि सव ही के लिये बहुत हौ उपयोगी हीने
वाली है । प्रतिष्ठान का यह् प्रकाशन सग्रहणीय दै
ता० ३६ चन, १६६१
&--सुरजभ्रकाश्च भाग १--कविया करणीदानजोकृत, सम्पादक श्रीसीत्ताराम
लालस 1
साहित्य-प्रेमियो के साय ही इतिष्टासकारो के लिथे कविया करणीदानकृत
“सूरप्रकास" का विदोप महत्त्व है 1 मारवाड के इतिहास के प्रमुख श्राधारः
ग्रयकेरूप्मे दरस प्रय का श्रध्ययन करिया जातां है। श्रत उसको प्रकादित
करने का श्रायोजन कर् प्रतिष्ठान तै एक वडो कमी को पूराकियादह।
ता० २६ दुन, १६६९१ महाराजक्रुमार डोँ° रथुबौ रसिहं
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